भाजपा के ‘कल्याण’ बन रहे धर्मपाल

लखनऊ से  राजीव

धर्मपाल सिंह आज उत्तर प्रदेश के लोधी-किसानों के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर चुके हैं. यही नहीं, उनकी समाज की दूसरी बिरादरियों में भी गहरी पैठ है इसलिए लोग उन्हें कल्याण सिंह के विकल्प के रूप में देख रहे हैं. पिछले दिनों आरक्षण को लेकर आपत्तिजनक बयान देकर राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने पिछड़े वर्ग का अगुवा बनने का जो दांव फेंका, उसके पीछे के सियासी निहितार्थ जगजाहिर हो गए. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे इस बुजुर्ग भाजपा नेता ने यह बयान तब दिया, जब भाजपा योगी सरकार में मंत्रिमंडल फेरबदल की योजना बना रही थी. सबको समझते देर नहीं लगी कि कल्याण क्या चाहते हैं? असल में इनके पौत्र योगी सरकार में बेसिक शिक्षा के राज्यमंत्री हैं. उनके सियासी करियर के लिए इस बुजुर्ग दादा की चिंता किसी से छुपी न रह सकी, जब कल्याण ने कहा कि अपना हक तो लेकर रहेंगे.

दरअसल, कल्याण का पिछड़ों के लिए हक मांगना महज दिखावा था, वास्तव में वे अपने पौत्र को कैबिनेट का दर्जा दिलाना चाहते हैं. इसके बहाने उनकी मंशा उत्तर प्रदेश के लोधी-किसानों का नेता अपने बाद अपनी पीढ़ी को बनाए रखने की रही है. वे चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश का लोधी वोटर ‘बाबूजी’ के घर तक ही सीमित रहे, कोई और किसानों का नेता न बन पाए. यही वजह है कि गाहे-बगाहे वह भाजपा पर दबाव बनाने के लिए ऐसे विवादित बयान देते रहे हैं. इससे आगे भी बढ़कर उन्होंने अपने पुत्र और पौत्र की सियासत के लिए भाजपा पर दबाव बनाया है, ताकि लोधी-राजपूत-किसानों की सियासत उनके घर से बाहर न निकल सके.

 

यहां यह भी गौरतलब है कि केशव प्रसाद मौर्य से पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के लिए बरेली आंवला के विधायक धर्मपाल सिंह का नाम लगभग फाइनल हो गया था. इसके पीछे दो वजहें थीं, एक तो भाजपा कल्याण सिंह के मजबूत विकल्प के लिए लोधी-किसानों के नेता के तौर पर धर्मपाल सिंह को आगे करना चाहती थी, दूसरी धर्मपाल संघ से निकले पार्टी के पुराने और वफादार नेता रहे हैं, लेकिन ऐन मौके पर उनका नाम कट गया. सियासी गलियारे में चर्चा ही रही कि इसके पीछे ‘बाबूजी’ का ही था. पार्टी में भी हमेशा यह चर्चा रही कि जितना संभव हो सका, धर्मपाल की काट इसी खेमे से की गई. हालांकि धर्मपाल ने कभी इस बारे में अपना मुंह नहीं खोला और अपने समर्थकों को भी इस मुद्दे पर सदैव चुप कराते रहे. वह ‘बाबूजी’ को वैसा ही सम्मान देते आए हैं. उदारता और सहजता उनके स्वभाव के गुर हैं, और इसी की वजह से वह आज उत्तर प्रदेश के लोधी-किसानों के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर चुके हैं.

धर्मपाल सिंह की खासियत यह है कि समाज की दूसरी बिरादरियों में वह अपनी पहचान खेती-किसानों के पैरोकार कृषक नेता के तौर पर बना चुके हैं. नेतृत्व का गुर और संगठनात्मक क्षमता के साथ संघ और भाजपा की रीति-नीति को वह भली-भांति समझते और निभाते हैं. भाजपा में सामूहिक नेतृत्व का भाव वह बखूबी समझते हैं. यही काम कल्याण सिंह ने नहीं किया. भाजपा में रहते हुए भी उन्होंने लोधी समाज को सियासी दायरे तक सीमित रखा. राष्ट्रीय क्रांति पार्टी की स्थापना का यही कारण था, जबकि धर्मपाल सिंह सूझ-बूझ से लोधी समाज को किसान यानी अन्नदाता को बड़े कैनवास पर ले जाने में कामयाब रहे. उन्होंने हमेशा किसानों की पैरवी की. उनकी यही विशेषता है कि भाजपा नेता के इतर उन्होंने अपनी पहचान किसान नेता के तौर पर बनाई. यही वजह रही कि उन्हें बरेली में आयोजित किसान स्वाभिमान रैली का संयोजक भी बनाया गया. उनकी इसी पहचान ने उनको कल्याण सिंह से अलग किया और संभवत: संघ और भाजपा नेतृत्व को उनका यही गुर पसंद आया. नतीजतन, उनका नाम मुख्यमंत्री के लिए भी मजबूती से चला.

राजनीतिक विश्लेषक पंकज भारद्वाज के शब्दों में, धर्मपाल ऐसे सियासी नेता हैं, जो अपनी छवि का ढोल नहीं पीटते और न ही अपने पीछे खड़ी भीड़ का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने को करना जानते हैं. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वह एकनिष्ठ यानी भाजपा के प्रति पूरी तरह निष्ठावान हैं. उन्होंने कभी यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह किसी एक बिरादरी या समाज का नेतृत्व करते हैं. अपनी विधानसभा आंवला में चाहे वह विधायक रहे या पूर्व विधायक, उसी आत्मीयता से ब्राह्मणों से भी मिले, छत्रियों से भी और बाकी पिछड़ी बिरादरियों से भी. उन्होंने यादवों को सिर्फ सपा के परंपरागत वोट बैंक के तौर पर भी कभी नहीं समझा. वोट मिले या नहीं, लेकिन उन्होंने किसी को ये नहीं महसूस होने दिया कि वह उनके साथ खड़े नहीं हैं. अनुसूचित जाति के लोगों की मदद को खड़े उनको रात को भी देखा गया, जब नेता घर से भी नहीं निकलते हैं. ऐसा इसलिए शायद सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में बांधे रखने के संघी संस्कार उनमें गहरे तक हैं.

भाजपा ने कल्याण के विकल्प के तौर पर धर्मपाल सिंह को प्रपोज किया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि वह कल्याण के विकल्प नहीं, बल्कि भाजपा के ‘कल्याण’ बन सकते हैं, क्योंकि धर्मपाल सिंह का सूत्र वाक्य है- हम लोधी, ब्राह्मण, ठाकुर, कश्यप, मौर्य, शाक्य, कुर्मी, गुर्जर आदि-आदि बाद में हैं, पहले तो किसान हैं. जो काम हमारे पूर्वजों ने किया, वही हम सबको आपस में एक सूत्र में पिरोता है. हालांकि कल्याण सिंह के बयान पर भाजपा ने गंभीरता नहीं दिखाई और धर्मपाल सिंह ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. वैसे भी जिस तरह कल्याण सिंह को राज्यपाल बनाकर राजस्थान भेजा गया, उससे उत्तर प्रदेश में उनकी मनमानी पर ही अंकुश लगाया गया था. अब इसी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए धर्मपाल सिंह का कद बढ़ाया जा सकता है.

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‘‘धर्मपाल ऐसे सियासी नेता हैं, जो अपनी छवि का ढोल नहीं पीटते और न ही अपने पीछे खड़ी भीड़ का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने को करना जानते हैं.’’
-पंकज भारद्वाज, राजनीतिक विश्लेषक

‘‘हम लोधी, ब्राह्मण, ठाकुर, कश्यप, मौर्य, शाक्य, कुर्मी, गुर्जर आदि-आदि बाद में हैं, पहले तो किसान हैं. जो काम हमारे पूर्वजों ने किया, वही हम सबको आपस में एक सूत्र में पिरोता है.’’
-धर्मपाल सिंह, जल संसाधन मंत्री, यूपी सरकार
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