खादी, फैशन और गांधीजी

बदलाव की संस्कृति  ¦ नित्यानंद तिवारी

फैशन अर्थात अपने को व्यक्त करने का तरीका. और यह तरीका अगर समाज के अधिकांश को पसंद आ जाये तो अनुकरणीय हो जाता है. फैशन हमें प्रदर्शित करने एवं इस प्रदर्शन का एक अलग प्रभाव उत्पन्न करने हेतु संचार का माध्यम भी है. फैशन किसी पहनावे तक सीमित नहीं है. भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शब्दों में ‘खादी केवल वस्त्र नहीं, बल्कि विचार है’ अर्थात हमारे व्यवहार, विचार, कर्म, धर्म इत्यादि हर क्षेत्र में फैशन है, परंतु दुर्भाग्यवश हम पहनावे तक ही इस शब्द को सीमित कर देते हैं और ‘मन मैला पर तन को सजाये’ की राह पकड़ लेते हैं. आज तमाम समूह गांधी जी के खादी को प्रोत्साहित करने के नाम पर वस्त्र व्यापार में संलग्न हैं. इनमें से शायद ही ऐसे कुछ लोग हैं जो गांधी जी के फैशन की अवधारणा से संलग्नता रखते हों. गांधी जी के खादी पर आधारित तमाम फैशन शो तक हो रहे हैं, पर उनकी विचार की संकल्पना आज भी अपनी जमीन तलाश रही है.

अगर हम खादी वस्त्र की बात करें तो खादी हाथ से बनने वाले वस्त्रों को कहते हैं. खादी के कपड़े सूती, रेशम या ऊन से बने हो सकते हैं. इनके लिये बनने वाला सूत चरखे की सहायता से बनाया जाता है. गांधीजी ने चरखे के साथ साथ ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ की बात भी करते थे. समूह की भावना, सहयोग की भावना, पवित्रता, असहिष्णुता जैसी अवधारणा के साथ चलता था गांधी जी का खादी. खादी वस्त्रों की विशेषता है कि ये शरीर को गर्मी में ठंडे और सर्दी में गरम रखते हैं. इससे न केवल शरीर को सुख मिलता है अपितु मन भी शांत रहता है.

खादी भारतीय विरासत का प्रतीक है. आजादी की लड़ाई में देश को संगठित करने में गांधी के खादी और चरखे का काफी महत्वपूर्ण  योगदान रहा है. चरखे का उपयोग देशवासियों में आत्मनिर्भरता लाने और गरीबी के खिलाफ लड़ाई के लिए था. इसके माध्यम से गांधी जी ने खादी के प्रयोग का समर्थन किया. गांधी जी का मानना था कि ‘तुम तब तक सुखी नहीं हो सकते हो, जब तक कि तुम्हारा समाज सुखी नहीं हो जाता.’ उन्होंने सुख की परिभाषा को व्यापक बना उसे जीवनशैली से जोड़ दिया. गांधी जी की यह विचारधारा हर युग में स्वीकार्य होगी और इससे कोई भी समाज लाभान्वित हुए बिना नहीं रह सकता. गांधी जी युग प्रवर्तक थे और केवल सत्य की बात करते थे. इसी क्रम में आता है उनका फैशन, जिसमें वे प्रत्येक व्यक्ति को स्वावलंबी बनाना चाहते थे.

प्रत्येक देशवासी को आत्मनिर्भर बनाने हेतु खादी को लेकर गांधी जी की सोच आज तथाकथित फैशन की दौड़ में पीछे छूट रही है. भारत परिधानों के लिए विदेशी कंपनियों पर काफी हद तक निर्भर सा होने लगा है परंतु उम्मीद अभी बाकी है क्योंकि गांधी जी का फैशन परिधान या दिखावा से कहीं अधिक हमारे हृदय में समाया हुआ है. बस आवश्यकता है उसे पहचानने की, देखने की और प्रदर्शित करने की. आज हमें खादी और चरखे के साथ सेल्फी लेने से ज्यादा इसकी मूल भावना को समझने एवं आत्मसात कर अपने जीवन में प्रयोग करने की है.

अपने जन्मदिन पर गांधी जी ईश्वर से प्रार्थना करते थे, चरखा चलाते थे और ज्यादातर समय मौन रहते थे. आज गांधी के विचारों पर समाज को आगे ले जाने की कोशिश करनी चाहिए. गांधी जी के विचार ही उनके फैशन की अवधारणा को व्याख्यायित करते हैं.

हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में सभी से खादी का एक ड्रेस खरीदने की अपील की है. बेहतर होता कि अगर इस अपील के साथ ही गांधी जी के विचारों, उनके फैशन को अपनाने की अपील पर भी जोर दिया जाता. मुझे नहीं लगता कि गांधी जी के आधे बदन के धोती से ज्यादा दुनिया का कोई भी परिधान चर्चा में रहा हो. कमाल की बात है न, न कोई डिजाइन, न कोई रंग. सिर्फ व्यक्तित्व की खुशबू ने गांधी जी के इस फकीर परिधान को सर्वोच्च स्थान दिला दिया.

आज तमाम संस्थाएं फैशन के लिए काम कर रही हैं, शो कर रही हैं, देशी विदेशी परिधानों को जनता तक पहुंचाने का काम कर रही हैं, अच्छा है. खादी वस्त्रों के प्रसार हेतु भी अनेकानेक आयोजन हो रहे हैं, बहुत ही अच्छा है. और अच्छा हो जाता अगर हम खादी के साथ ही साथ गांधी जी के वास्तविक फैशन अर्थात उनके उच्च विचारों का अधिकाधिक प्रदर्शन कर पाते और युवा पीढ़ी को इस वास्तविक फैशन से प्रभावित कर पाते.

(लेखक वी एल मीडिया सोलुशंस के प्रबंध निदेशक हैं)

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