कविमोहन और दिल्ली की गलियां

हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका ममता कालिया को उनके उपन्यास ‘दुक्खम-सुक्खम’ के लिए हाल ही में केके बिरला फाउंडेशन की ओर से 27वां ‘व्यास सम्मान’ प्रदान किया गया. मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के मथुरा की पृष्ठभूमि पर आधारित इस उपन्यास में एक संयुक्त परिवार के आधुनिकीकरण की गाथा बुनी गई है. इसमें दिखाया गया है कि एक परिवार में दादा-दादी और नाना-नानी जैसे बुजुर्गों का होना कितना आवश्यक है. उपन्यास के विभिन्न किरदारों के बीच चलने वाले वैचारिक द्वंद्व को लेखिका द्वारा बखूबी प्रस्तुत किया गया है. ममता कालिया को ‘उदय सर्वोदय’ परिवार की ओर से ‘व्यास सम्मान’ मिलने की बधाई देते हुए यहां इसी उपन्यास का एक अंश प्रस्तुत किया जा रहा है:
साहित्यममता ¦ कालिया
दिल्ली के घर भी क्या घर. कोठरियां बनाम कमरे और कमरे बनाम बरामदे. एक तरफ़ दीवार में जड़ी हुई आलमारियां, दूसरी तरफ़ सड़क की ओर खुलनेवाली कतारबद्ध खिड़कियां. खिड़कियों की नीचाई और सड़क पर चलते आदमियों की ऊंचाई में अद्भुत तालमेल, कुछ ऐसा कि बेसाख्ता अंदरवालों की आंख बाहर और बाहरवालों की आंख अंदर टिकी रहे. न न पर्दे कैसे लगाए जा सकते हैं, घर में हवा का एकमात्र रास्ता हैं ये खिड़कियां, हवा और मनोरंजन का. जिन्होंने पर्दे लगा रखे हैं, वे भी सरके ही रहते हैं. भला हो विद्युत-व्यवस्था का, खिड़की-दरवाज़े, दिन-रात खुले रखने पड़ते हैं, चोरी और गर्मी, इन दोनों आशंकाओं की भिड़ंत में गर्मी हर बार जीतती है.
दिल्ली-एक नगर. नगर में कितने नगर-रूपनगर, कमलानगर, प्रेमनगर, शक्तिनगर, मौरिसनगर, किदवईनगर, विनयनगर, संतनगर, देवनगर, लक्ष्मीबाई नगर. मज़ा यह कि कोई चाहे कितनी भी दूर रहता हो, बसों में धक्के-मुक्के खाता अपने दफ्तर पहुंचता हो, उसे मुग़ालता यही रहता है कि वह दिल्ली में रहता है. जब गांव-कस्बे से उसके रिश्तेदार मेहमान बनकर आते हैं वह उन्हें प्रदर्शनी दिखाता है, लाल किला और बुद्धजयंती पार्क घुमाता है, और एक के बाद एक टूटते दस-दस के नोट देखते हुए दिन गिनता है कि मेहमान कब जाएं और वह वापस अपनी पटरी पर फिर बैठ जाए-दफ्तर से घर, घर से दफ्तर. सच पूछो तो दिल्ली का मतलब है दस-पांच नेताओं की दिल्ली. दिल्ली की असली मलाई बस वही चाट रहे हैं, बाकी सारे घास काट रहे हैं.
कवि ने अपने इकलौते कमरे का इकलौता दरवाज़ा बंद किया और ताला डालने की रस्म पूरी की. यह ताला किसी भी चाभी से खोला जा सकता है. है तो किसी उम्दा कम्पनी का पर जब से कवि ने होश संभाला इसे घर में इस्तेमाल होते देखा. घिस-घिसकर चिकना लोहे का बट्टा जैसा हो गया है. जीजी ने यह ताला और इस जैसी कई कंडम चीज़ें उसे भेंट कर दीं जब वह मथुरा से चला. ताला बदलने का इरादा रोज़ करता है कवि, पर ताला खÞरीदने की बात उसे हास्यास्पद लगती है. पहले उसे कुछ ऐसा सामान खÞरीदना होगा जो ताले का औचित्य साबित कर सके.
कवि रोज़ रात दस बजे के बाद घर लौटता है. तब वह इतना थका होता है कि कई बार बिना कपड़े बदले, बिना चादर झाड़े, बिना बत्ती बुझाए तुरंत सो जाता है. कमरे की बदरंग दीवारें, घिसी चादर, तिड़के प्लेट-प्याले और टूटा स्टोव उसे सिर्फ तब नज़र आते हैं जब कोई दोस्त अचानक छुट्टी के रोज़ चला आता है. काम के बाद वह कॉफी-हाउस चला जाता है. वहां शोर का एक अंश बनना उसे अच्छा लगता है, सिगरेट पीना भी और कभी-कभार कॉफी. इन तीनों चीज़ों की तासीर ऐसी है कि इनके रहते भूख महसूस नहीं होती, न अकेलापन, न उदासी.
वह इन तीनों में से दो से हमेशा घबराता आया है. वह न अकेलापन बर्दाश्त कर सकता है न उदासी. कई बार सुबह चार-पांच बजे के बीच मकान-मालकिन की नवजात लड़की के रोने से उसकी नींद टूटी है और फिर देर तक उसे नींद नहीं आई है. अपनी बेबी-मुन्नी याद आने लगी हैं. कवि अपने आसपास के घरों की प्रारंभिक आवाज़ें सुनता है-दूधवालों की साइकिलों की खड़खड़ाहट, महरियों की खटखट, किसी-न-किसी घर या मंदिर से अखंडपाठ की रटंत, बूढ़ों के गलों की खर्राहट. हर आवाज़ के साथ आराम एक असंभव प्रक्रि या बन जाता. कहीं पड़ोस की युवा गृहणी का बिंदी पुंछा चेहरा दिख जाता तो गज़ब अकेलापन, उदासी और संत्रास उसे दबोच लेते. ऐसे मौकों पर इंदु की याद इतने ज़ोर से आती कि उसे लगता वह भागता हुआ मथुरा लौट जाए. इसीलिए कवि को ऐसे दिन पसंद हैं जब वह सुबह आठ बजे उठे और उठते ही कॉलेज जाने की हड़बड़ी हो जाए.
कॉलेज के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि एक बार इसके परिसर में दाखिल हो जाओ, शेष जगत और जीवन की परेशानियां भुला दी जाती हैं. एक ओढ़ा हुआ व्यक्तित्व यहां इतना कामयाब होता है कि उतनी देर अपना असली व्यक्तित्व सामने ही नहीं आता. कवि अभी नया है इसलिए कोई उसके साथ ज्यादा आत्मीय नहीं हो पाया है. कक्षाओं के विद्यार्थी ज़रूर उसके पढ़ाने के ढंग से उसकी ओर खिंचे हैं. कॉमर्स, इकनॉमिक्स और एकाउंट्स की नीरस पढ़ाई से उकताकर वे जब इंग्लिश का पाठ्यक्र म देखते हैं वह उन्हें प्रिय लगता है. पढ़ाते हुए बीच-बीच में कविताओं के अंश उद्धृत करना कवि का शौक है. इससे व्याख्यान में ताज़गी बनी रहती है और विद्यार्थी एकाग्र रहते हैं.
दरियागंज में आवास की समस्त संभावनाएं टटोलने के बाद ही कविमोहन ने कूचापातीराम में यह आधा कमरा लेने की मजबूरी स्वीकार की. दरियागंज प्रकाशकों, मुद्रकों और कागज़ के थोक विक्र ेताओं का इलाक़ा है. किसी ज़माने में यहां पिछवाड़े की गलियों में जनता रहती थी. अब तो इसके चप्पे-चप्पे में व्यवसाय का जाल फैला हुआ है. यथार्थवादी लोगों ने यहां तलघर भी बना लिए हैं जो बिजली के भरोसे जगमगाते रहते हैं.
अपने विभाग के अब्दुल राशिद के साथ वह दरियागंज के सामने की गली का चक्कर भी लगा आया. चितली कबर यों तो देखने में ऐसी लगती थी जैसी शहर की कोई भी गली. इस लंबी और संकरी गली में रहना और कमाना साथ-साथ चलता था. छोटे दरवाज़ों वाले ऐसे मकान थे जो बड़े सहन में खुलते और कई मंजिला साफ़-सुथरा ढांचा नज़र आता. अब्दुल राशिद हर जगह कहते- बड़ी बी, इन्हें सिर छुपाने की जगह दरकार है. माशाअल्ला शादीशुदा हैं, बाल-बच्चे वाले हैं, जो किराया आप वाजिब ठहराएंगी, दे देंगे. मेरे साथ ही कॉमर्स कॉलेज में तालीम देते हैं. बड़ी बी कहलाई जानेवाली महिला कोई जर्जर, उम्रदराज़ ऐसी औरत होती जो हालात से हिली होती. वह कानों को हाथ लगाकर कहती- लाहौल बिला कूवत, बेटा देखते नहीं, क्या तो माहौल है दिल्ली का. कल को अगर किसी दंगाई ने आकर इन्हें कतल कर दिया तो मैं क़यामत के रोज़ किसे मुंह दिखाऊंगी. एक और बड़ी बी ने कहा- इनसे कहो, पुरानी दिल्ली के मोहल्लों में मकान तलाश करें. यहां तो आदमजात का भरोसा नहीं.
कविमोहन मन-ही-मन डर गया. उसने मकान के बाहर दुकानों में जरी और रेशम की ताराक़शी होते देखी और सोचा, यहां न रहना ही अच्छा है. मुल्क़ के हालात की सबसे ज्यादा तपिश यहीं पहुंची लगती है.
इसी तरह भटकते-भटकते वह चांदनी चौक पहुंच गया. यहां बाज़ार एकदम रौशन था. ऐसा लगता था कुल दिल्ली यहीं उमड़ आई है. एक खÞास बात उसने यह देखी कि कपड़ों की दुकानों के शोकेस में साड़ी के साथ फ्रॉक या स्कर्ट-ब्लाउज़ का मॉडल ज़रूर सजा था. एक तरफ़ अंग्रेज़ों को मुल्क़ से बाहर कर देने का संकल्प था तो दूसरी तरफ़ उनसे व्यापार की उम्मीद. दरीबा कलां की चकाचौंध बस देखते बनती थी. कविमोहन के मन में चाह हुई कि कुछ महीनों बाद वह यहां इंदु को साथ लाकर सोने की अंगूठी दिलाए. उसने आज तक इंदु को कोई उपहार नहीं दिया था. चांदनी चौक मुख्य बाज़ार था जिसके दायें-बायें मशहूर गलियां फूटती थीं. हर गली के नुक्कड़ पर खाने-पीने की कोई-न-कोई दुकान. चाट की दुकानों की भरमार थी. पानी के बताशे कई किस्म के मिलते, आटे के, सूजी के, हर्र के और सोंठ के गोलगप्पे. इसी तरह यहां आलू टिकिया सेंकने के अलग अंदाज़ थे. कविमोहन को यहां आकर बुआ की याद ने सताया. उसे ग्लानि हुई कि इतने महीनों में उसने सिर्फ एक बार बुआ को याद किया. घंटेवाले हलवाई से उसने एक सेर सोहनहलवा पैक करवाया और फतहपुरी की तरफ़ बढ़ गया.

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