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आइए, हर गड्ढे को उसके बाप का नाम दें

आइए, हर गड्ढे को उसके बाप का नाम दें
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कटाक्ष l धर्मपाल महेंद्र जैनहम जिम्मेदार नागरिक हैं. हम सिर्फ सड़क के गड्ढे ही सहन नहीं करते, अर्थव्यवस्था के गड्ढों को सहते हैं, रोजमर्रा के भ्रष्टाचार के गड्ढों को सहते हैं. गड्ढों का विरोध कर हम असहिष्णु नहीं बन सकते. आइए हर गड्ढे को उसके बाप का नाम दें.कल हैदराबाद घूमते हुए मैं एक गड्ढे में गिर गया. लोगों ने खींचकर निकाला, तो मैं वन मानुष लग रहा था. लोग मुझ पर हंस रहे थे, मैं लोक निर्माण मंत्री पर हंस रहा था. टीवी चैनल वालों ने लाइव रिकॉर्ड करते हुए पूछा, आप गड्ढे में गिरे हैं, फिर भी हंस रहे हैं?‘पूरा देश गड्ढे में गिरा है, और हम सब हंस रहे हैं.’रिपोर्टर दर्शकों से मुखातिब हो गया और बोला- क्या आपको लगता है कि देश गड्ढे में गिर रहा है?‘हां-हां’, समवेत स्वर गूंजा.‘देश को गड्ढे में कौन ढकेल रहा है?’‘नेता लोग और कौन!’‘क्या आपने किसी नेता को गड्ढा खोदते देखा है?’‘नहीं, मैंने उन्हें कब्र खोदते देखा है.’‘किसकी कब्र?’‘देश की कब्र.’इस बार भीड़ ठट्ठा मार कर हंसी.गड्ढे में गिरने पर टीवी वाले इंटरव्यू लेते हैं. यदि यह तथ्य मुझे पहले मालूम होता तो मैं बहुत पहले गड्ढे में गिर जाता. एक दर्शक तख्ती बना लाया था, उसने उस पर गड्ढे का नाम लिख दिया- विकास मंत्री रामाराव गड्ढा. उसने दर्शकों से अपील की कि वे डंडे के आसपास पत्थर जमा दें ताकि यह तख्ती टिक जाए और इसके फोटो लेकर अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दें. लोगों ने गड्ढे और तख्ती के साथ धड़ाधड़ सेल्फियां लीं. अल्प समय में ट्विटर और फेसबुक पर रामाराव गड्ढा छा गया. छह महीनों से गड्ढे की फाइल ऊपर-नीचे कर रहे मंत्रालय वालों को उस रात नींद नहीं आई. रातों-रात गड्ढा भरवा दिया.गड्ढों का नामकरण अब आंदोलन का रूप ले सकता है इसलिए मैं दिल्ली की सड़कों के गड्ढों के कुछ नाम सुझा रहा हूं. सक्रिय सड़क पर बड़ा गड्ढा दिखे तो नाम हो ‘प्रधानमंत्री गड्ढा’. राजधानी की किसी उपेक्षित सड़क पर गड्ढा हो तो ‘राष्ट्रपति गड्ढा’. जिस सड़क का कोई माई-बाप न हो उस पर गड्ढा हो जाए तो ‘सीएम गड्ढा’. सड़कों पर बड़े गड्ढों को लेकर भारत सरकार को शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है. भारत से भी बड़े गड्ढे अमेरिका में हैं. वाशिंगटन डीसी के गड्ढे का नाम ‘ट्रम्प गड्ढा’ और न्यूयॉर्क के गड्ढे का नाम ‘क्लिंटन गड्ढा’ रखा तो ये गड्ढे दुनिया भर में चर्चित हो जाएंगे और रातोंरात ठीक भी हो जाएंगे.स्मार्ट शहर योजना में आम शहर तो स्मार्ट नहीं हुए, पर आम नागरिक जरूर स्मार्ट हो गए हैं. नागरिकों को छोटी-छोटी बातें समझना चाहिए, गड्ढा सड़क पर नहीं होगा तो क्या विधानसभा में होगा.पिछले साल हमारे एमजी रोड पर एक बड़ा गड्ढा हो गया. हमने पार्षद से कहा, ‘महात्मा गांधी रोड पर बहुत खराब गड्ढा है, कुछ कीजिए.’ पार्षद ने एग्जिक्यूटिव इंजीनियर (ईई) को समस्या बताई तो उन्होंने पलट कर पूछा, ‘नेताजी, चुनावों की घोषणा हो गई क्या? हमें तो पता ही नहीं चला!’गड्ढों की भराई और चुनाव में आप कोई संबंध ढूंढ़ पाएं तो जरूर बताएं. मैं तो इतना ही सोच पाता हूं कि कोई कद्दावर राजनेता चुनाव प्रचार करते हुए गड्ढे में गिर गया तो राजनीति का मुंह काला हो जाएगा. राजनेता पक्ष का हो या विपक्ष का, गड्ढा निर्दलीय है, उसके लिए तो सब बराबर हैं, जो चाहे वो अंदर गिर जाए. प्रशासन गड्ढों को बड़े बजट से ठीक कराता है, जब कोई विदेशी हस्ती की कार उस सड़क से गुजरने वाली हो. प्रधानमंत्री गुजरने वाले हों तो गड्ढा गारे से भरवाना ठीक है, पर वहीं से इवांका ट्रम्प गुजरने वाली हों तो मुख्यमंत्री खुद सीमेंट भरवाते हैं. तब गड्ढे का सौंदर्यीकरण देश का सौंदर्यीकरण होता है.मैं जिस गड्ढे में गिरकर व्यंग्य बन गया था, उसकी कथा सुनें. वह नवनिर्मित सड़क थी. टीवी रिपोर्टों के अनुसार मुख्यमंत्री ने इसका पिछले महीने ही लोकार्पण किया था. मौसम सूखा रहने की पूरी संभावना थी कि मूसलाधार बारिश हो गई. गड्ढा कोई खबर नहीं था, गड्ढे में गिरते ही रिपोर्टरों के जरिए मुझे टीवी एंकर अर्णब ने लाइव कर दिया. उनकी दहाड़ से न्यूज-ब्रेक तो हुई, कई टीवी ब्रेक होते-होते बचे. भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते ने ठेकेदार को धर-पकड़ा. ठेकेदार ने बताया कि इंजीनियरों की जीभ बाजार माप से लंबी थी, वे जरूरत से ज्यादा चाटते गए और डामर कम होता गया. ईई की पड़ताल शुरू हुई तो वे लोक निर्माण मंत्री के चरणों में योगा करते पाए गए.हम जिम्मेदार नागरिक हैं. हम सिर्फ सड़क के गड्ढे ही सहन नहीं करते, अर्थव्यवस्था के गड्ढों को सहते हैं, रोजमर्रा के भ्रष्टाचार के गड्ढों को सहते हैं. गड्ढों का विरोध कर हम असहिष्णु नहीं बन सकते. आइए हर गड्ढे को उसके बाप का नाम दें, फिर उसे रोशन करें. दुष्यंत कुमार सही हो जाएंगे-कैसे आकाश में सुराख हो नहीं सकताएक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो!जन्म : 1952, रानापुर, जिला- झाबुआ, भारत. शिक्षा : भौतिकी; हिन्दी एवं अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर. प्रकाशन : तीन सौ से अधिक कविताएं व हास्य-व्यंग्य प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. ‘सर क्यों दांत फाड़ रहा है?’ व्यंग्य संकलन प्रकाशित.

Updated : 2 Oct 2018 7:09 AM GMT
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