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चुभन

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राम नगीना मौर्यमनीषा ने तो फोन पर बताया था कि उसे जरूरी कंसाइनमेंट भोजना है; वह आज नहीं आ सकती, पर ये तो उस अजनबी आदमी के साथ सिनेमा देखकर हाल से बाहर निकल रही है. कौन हो सकता है ये आदमी... मनीषा का पति या फिर उसका बॉस? यही सोचते हुए उसने मनीषा को देने के लिए खरीदे गए बर्थ-डे गिफ्ट पैकेट की ओर अनमने ढंग से देखा, फिर कुछ सोचते हुए हौले से मुस्कुरा दिया... मैजेंटा कलर की कुर्ती तो उसकी पत्नी सुमित्रा पर खूब फबेगी.वो बिसातखाने की दुकान पर दुकानदार से एक रेजर और शेविंग क्रीम खरीदने के वास्ते मोल-भाव करने में व्यस्त था.‘ये आज ही आए हैं सर, देखिए न! कितने क्यूट हैं?’ कहते हुए दुकानदार ने उसके सामने आईने के तीन-चार पैकेट भी रख दिए. दुकानदार को लगे कि वो आईना खरीदने में भी इंटरेस्टेड है, इसलिए उसने एक आईने में मुंह बिचकाते हुए, तरह-तरह से अपनी शक्ल बिगाड़ते हुए खुद को देखा. हालांकि वो सिर्फ समय बिताने के वास्ते ये कवायदें कर रहा था. आईने में अनमने देखते हुए उसने महसूस किया कि कोई उसकी इन हरकतों को पीछे से घूर कर देख भी रहा है. उसने पलट कर देखा तो अंदाजा सही निकला. उसके ठीक पीछे एक अजनबी आदमी चेहरे पर हल्की दाढ़ी रखे और आंखों पर काला चश्मा चढ़ाए वेल सूटेड-बूटेड खड़ा था. उनकी नजरें जैसे ही दो-चार हुर्इं, वे दोनों अचकचा-से गए.‘क्या आपके पास सुनहले फ्रेम वाला आईना मिलेगा?’ पीछे खड़े अजनबी आदमी ने उसकी तरफ से अपनी निगाहें हटाते हुए दुकानदार से सुनहले फ्रेम वाले एक आईने के बारे में जानकारी मांगी.इस बीच शेविंग क्रीम के पैकेट को उलटते-पलटते, उसका खुदरा मूल्य, एक्स्पायरी डेट आदि देखते हुए उसने अजनबी की ओर कनखियों देखा.‘जी, लेकिन सुनहले फे्रम का आईना मिलना थोड़ा मुश्किल है. फिर भी आप देख लीजिए, मैं आपको और भी अच्छे डिजाइन, फे्रम, रंगों के आईने दिखा सकता हूं. शायद आपको पसंद आ जाए?’ दुकानदार ने याचना भरी मुद्रा में कहा.‘नहीं, मुझे तो सुनहले फ्रेम का ही आईना चाहिए. मैं पिछले स्टोर से देख कर आ रहा हूं, वहां भी नहीं मिला.’ ये कहते हुए अजनबी ने अन्य डिजाइन, फ्रेम, रंग का आईना खरीदने के बारे में अपनी अनिच्छा व्यक्त की.‘कोई बात नहीं, आप देख तो लीजिए. हो सकता है आपको पसंद ही आ जाए?’ यह कहते वो दुकानदार अंदर जाने को उद्यत हुआ.‘मुझे जरा जल्दी निकलना है, आप इस रेजर और शेविंग क्रीम के पैसे बता दीजिए.’ अजनबी आदमी और दुकानदार की इस संक्षिप्त बातचीत के बाद दुकानदार को अंदर जाते देख उसने टोका.‘जी! इस रेजर, शेविंग क्रीम के एक सौ तेइस रुपये हुए, पर क्या आपको ये आईना नहीं खरीदना?’ दुकानदार ने उससे तनिक निराशा भरे स्वर में पूछा.‘फिर कभी फुर्सत में देख लूंगा. अभी तो आप सिर्फ रेजर और शेविंग क्रीम के ही पैसे ले लीजिए.’‘जी! अच्छा.’पैसे चुकाने के बाद वो उस दुकान से बाहर आ गया. दुकान से बाहर निकलते हुए उसने महसूस किया कि उसके पीछे कोई आ रहा है. सड़क के उस पार जा कर उसने पीछे पलट कर देखा तो उसका शक सही निकला. बिसातखाने की दुकान में मिला वो अजनबी भी दुकान से बाहर निकल कर सड़क पर आ गया था. उसके हाथ में कोई आईना नहीं था. शायद उसे कोई आईना पसंद न आया हो या उसे आईना खरीदना ही न हो, उसे भी उसी की तरह टाइम-पास करना हो? आईने के बारे में पूछताछ सिर्फ बहाना हो? सड़क पर आगे बढ़ते हुए उसे लगा कि जैसे उस अजनबी की आंखें लगातार उसका पीछा कर रही हैं.फिर कुछ सोचते हुए वो सामने स्थित मॉल में दाखिल हो गया.‘वेलकम सर’ दरबान ने दरवाजा खोलते हुए अभिवादन किया.‘थैंक यू’ कहते हुए वो मॉल के अंदर घुस गया. हालांकि उसने एक बार पीछे पलट कर आश्वस्त भी होना चाहा. उसे अपने पीछे आता वो अजनबी अब नहीं दिखा.‘मे आई हेल्प यू सर...?’ एक दुकान के सामने खड़े सेल्समैन ने उससे अनुरोध किया.‘नो, थैंक्स... मैं देख लूंगा.’ ये कह कर वो उस दुकान में घुस गया.‘मे आई हेल्प यू सर?’ दुकान में उसे अकेले घूमते देख कर उस दुकान के मालिक ने टोका.‘कोई पार्टी-वियर सूट या कोट-पैंट देखना था.’ उसने प्रत्युत्तपन्नमतिता से काम लिया.‘विकी, तुम जरा सर को कोई पार्टी-वियर सूट दिखाना.’ दुकान के मालिक ने थोड़ी दूर खड़े सेल्समैन को आदेश दिया.‘सर! हमारे यहां सूट पर हैवी डिस्काउंट चल रहा है. आप इधर ‘मेंस-सेक्शन’ में आइए. आपको अलग-अलग रंग एवं डिजाइन के सूट दिखाता हूं.’ सैल्समैन ने उसे मेंस सेक्शन में ले आकर सूट दिखाते हुए उनकी कीमत बताना शुरू किया. चूंकि उसे सूट खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, सिर्फ टाइम-पास करना था, सो वो जल्दी ही ऊबन महसूस करने लगा.‘बावजूद डिस्काउंट के, आपके यहां मेरे बजट में कोई सूट नजर नहीं आ रहा है.’ ये कहते हुए उसने सेल्समैन से पीछा छुड़ाना चाहा.‘कोई बात नहीं सर! अगले हफ्ते ‘ऑफ-सीजन डिस्काउंट’ आने वाला है. अगले हफ्ते आइए. क्या पता आपकी रेंज वाला कोई सूट मिल जाए?’‘ठीक है, फिर अगले हफ्ते ही आता हूं.’ कह कर वह आगे बढ़ गया.चलो जान छूटी. सेल्समैन द्वारा दी गई इस जानकारी से यक-ब-यक उसने राहत-सी महसूस की. उसे वहां से खिसकने का बहाना जो मिल गया था.मॉल में घूमते हुए अब वो ‘लेडीज-सेक्शन’ की ओर आ गया. डिस्प्ले में मैजेंटा कलर की एक कुर्ती पर उसकी निगाह अटक गई. पास जाकर प्राइस-टैग देखा तो खास महंगी नहीं लगी.ये कुर्ती मनीषा के बर्थ-डे गिफ्ट के लिए ठीक रहेगी. उसने मन-ही-मन सोचा.‘एक्सक्यूज मी! इसकी क्या प्राइस होगी? क्या इस पर भी कुछ डिस्काउंट है?’ उसने सेल्समैन का ध्यान उस कुर्ती की तरफ आकर्षित करते हुए उसका दाम पूछना चाहा.‘नहीं सर! इस पर तो आॅलरेडी ट्वेंटी-परसेंट का डिस्काउंट है. अब कोई गुंजाइश नहीं बचती.’ सेल्समैन ने कंधे उचकाते, मुंह तनिक टेढ़ा करते हुए असमर्थता व्यक्त की.‘मगर... आप दो कुर्तियां खरीदते हैं तो हम आपको थर्टी-परसेंट का डिस्काउंट दे सकते हैं.’ उसके चेहरे पर आई निराशा के भाव को भांपते हुए थोड़ी दूर खड़े दुकान के मालिक ने उसे सांत्वना देनी चाही.‘नो, थैंक्स. मुझे ये कुर्ती ही चाहिए. आप कृपया इसका बिल बनवा दीजिए और गिफ्ट-रैपर में पैक भी करवा दीजिए.’‘ओके सर.’कुर्ती का पेमेंट देने जब वो काउंटर पर आया तो उसे वहां एक कोने में काले चश्मे और हल्की दाढ़ी वाला वही अजनबी आदमी हाथ में एक टाई लिए सेल्समैन से मोल-भाव करता एक बार फिर दिखा.वो जितनी देर मॉल के अंदर था उस अजनबी को भूला हुआ था, लेकिन काउंटर पर उस अजनबी को दोबारा देख वो तनिक ठिठक गया. उसने गौर किया कि अजनबी की निगाह उसकी तरफ नहीं थी. शायद काउंटर की तरफ आता देख उस अजनबी ने अपनी नजरें फेर ली हों...? काउंटर के बगल में वो अजनबी इस तरह लापरवाही से खड़ा था जैसे उसने उसे देखा ही न हो?उसे कुछ देर और इंतजार करना था. मनीषा ने मॉल के मेन गेट के सामने ही मिलने को कहा था.अजनबी आदमी को लेकर उसके दिलो-दिमाग में अभी मंथन चल ही रहा था कि साइलेंट-मोड पर लगे और जेब में रखे उसके मोबाइल में हरकत हुई. उसने मोबाइल जेब से निकाल कर देखा तो स्क्रीन पर मनीषा का नाम उभरा, ‘हलो...?’‘...’‘हां, बोल रहा हूं.’‘...’‘थोड़ा तेज बोलो. यहां काफी शोर हो रहा है. किसी ऐड कंपनी ने अपना प्रोडक्ट लॉन्च करने के वास्ते क्यास्क लगा रखा है. आवाज बहुत लाउड है.’‘...’‘ठीक है. एक मिनट रुको. मैं यहां से थोड़ा हट कर बात करता हूं.’‘...’‘हां, अब बोलो?’‘...’‘क्यों नहीं आ सकोगी, क्या हुआ?’‘...’‘...लेकिन तुमने तो प्रॉमिस किया था कि तुम्हारे बर्थ-डे पर हम दोनों पिक्चर देखने चलेंगे? मैंने दो टिकटें भी खरीद ली हैं. इतने दिनों बाद तो प्रोग्राम बना था. पहले पिक्चर देखेंगे फिर रेस्त्रां में खाएंगे-पीएंगे भी?’‘...’‘नहीं-नहीं, मैं क्यों नाराज होने लगा. ऐसी कोई बात नहीं है. फिर काम तो सबसे पहले है. अगर बहुत जरूरी कंसाइनमेंट है तो... इट्स ओके?’ उसके चेहरे पर अचानक आई निराशा व क्षुब्धता का भाव साफ-साफ झलक रहा था. उसने लापरवाहीपूर्वक वापस अपना मोबाइल अपनी जेब के हवाले किया.मनीषा नहीं आ सकती. बता रही है कि उसके बॉस ने उसे कुछ अर्जेंट काम बता दिया है. कोई जरूरी कंसाइनमेंट है. तत्काल रिपोर्ट भोजना जरूरी है. अब उसे अकेले ही पिक्चर देखना होगा. खैर...अर...रे! ये क्या, यह अजनबी आदमी तो यहां हाल के बाहर सिनेमा देखने के लिए टिकट लेने वालों की लाइन में भी लगा है? वह जहां-जहां भी जा रहा है, यह अजनबी भी वहां-वहां दिख जा रहा है? अजब संजोग है? खैर... उसे इससे क्या? हो सकता है ये महज संजोग ही हो?यही सब सोचते-गुनते, किसी भी आशंका को परे धकेलते वो अंदर हाल में जाकर अपनी सीट पर बैठ गया.मध्यांतर में वह अजनबी आदमी उसे फिर दिखा, जो हाल के अंदर दोनों तरफ की सीटों पर उड़ती, मगर पारखी नजर डालते, जेब में हाथ डाले गैलरी में ऐसे टहल रहा था मानो किसी को ढूढ़ रहा हो.अब तक वह फिल्म की कहानी में उलझा था कि अचानक उस अजनबी को देख कर उसके मन में दूसरी उलझन शुरू हो गई. इस बीच हाल की लाइट बंद हो गई. फिल्म का दूसरा पार्ट शुरू हो गया था, पर अब उसका ध्यान पर्दे पर हो रही हलचल पर नहीं था. उस अजनबी आदमी की छवि उसके मन-मस्तिष्क को झकझोरे हुए थी. एक अजनबी का यूं बार-बार मिलना उसे बेचैन-परेशान किए जा रहा था.अचानक उसके दिमाग में एक अजीब-सा ख्याल आया. उसके बैग में शेविंग क्रीम, रेजर और पानी की बोतल तो है ही. क्यों न सीट पर बैठे-बैठे ही वो अपनी दाढ़ी-मूंछे साफ कर डाले? ताकि फिल्म देखने के बाद जब वो हाल से बाहर क्लीन शेव निकले और उस अजनबी आदमी से यदि फिर से सामना हो तो वह उसे भौचक्का ढूढ़ता ही रह जाए? अगर वह अजनबी उसका पीछा कर रहा होगा तो अवश्य ही भ्रम में पड़ जाएगा?कुछ ऐसा ही सोच उसने सीट में थोड़ा अंदर धंसते हुए अपने बैग से शेविंग क्रीम, रेजर और पानी की बोतल निकाली और बगल वाली सीट, जो उस समय खाली थी, पर रखते बोतल से अंजुरी में पानी लेकर दाढ़ी-मूछों को गीला करते, हल्के हाथों अपनी दाढ़ी और मंूछों पर शेविंग क्रीम लगाई, तत्पश्चात रेजर की मदद से उसने आहिस्ता-आहिस्ता अपनी दाढ़ी-मूछें सफाचट कर डाली. ये काम उसने इतनी होशियारी से किया था कि उसके अगल-बगल बैठे किसी भी दर्शक को उसके इस क्रिया-कलाप की तनिक भी भनक नहीं लगने पाई.अब पिक्चर खत्म हो चुकी थी. इरादतन या फितरतन कह लीजिए ‘एग्जिट गेट’ से थोड़ा हट कर वह उस अजनबी आदमी के हाल से बाहर निकलने का इंतजार कर ही रहा था कि अगला दृश्य देख कर उसकी आंखें फटी की फटी रह गर्इं.मनीषा उसी अजनबी के साथ हाल से बाहर निकलती दिखी. वे दोनों उसके ठीक बगल से एक-दूसरे की कमर में हाथ डाले, हंसते-खिलखिलाते-बतियाते निकल गए. आश्चर्य कि उन्होंने उसकी तरफ देखा तक नहीं? शायद क्लीन शेव होने की वजह से ऐसा हुआ हो? अपनी सफाचट दाढ़ी-मंूछों पर एक बार फिर हाथ फेरते हुए उसने मन-ही-मन अंदाजा लगाया......लेकिन मनीषा ने तो फोन पर बताया था कि उसे जरूरी कंसाइनमेंट भोजना है; वह आज नहीं आ सकती, पर ये तो उस अजनबी आदमी के साथ सिनेमा देखकर हाल से बाहर निकल रही है. आखिर कौन हो सकता है ये अजनबी आदमी... मनीषा का पति या फिर उसका बॉस? या फिर कोई और...?इन्हीं विचारों में अंतर्गुम्फित उसने मनीषा को देने के लिए खरीदे गए बर्थ-डे गिफ्ट पैकेट की ओर अनमने ढंग से देखा, फिर कुछ सोचते हुए हौले से मुस्कुरा दिया......मैजेंटा कलर की कुर्ती तो उसकी पत्नी सुमित्रा पर खूब फबेगी और उसे यूं क्लीन शेव देखकर पत्नी को आश्चर्य भी होगा. सुमित्रा को तो अकसर ही शिकायत रहती है कि उस पर दाढ़ी-मंूछें अच्छी नहीं लगतीं. कभी-कभार चुभती भी हैं.जीवन परिचय : जन्म- 23 मार्च 1966; कुशीनगर, उत्तर प्रदेश. शिक्षा- परास्नातक (अर्थशास्त्र) प्रकाशन- देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सैकड़ों कहानियां, कविताएं, निबंध आदि प्रकाशित. कहानी संग्रह ‘आखिरी गेंद’ 2017 में प्रकाशित. पुरस्कार एवं सम्मान- राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश द्वारा 2016-17 में ‘साहित्य गौरव सम्मान’, हिन्दी भाषा के उन्नयन/ विकास/ समग्र लेखन/ साहित्यिक सेवाओं/ सम्पादन एवं ‘आखिरी गेंद’ के लिए ‘स्व. जामवती देवी स्मृति हिंदी भूषण श्री’ से अलंकृत, राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश द्वारा हिंदी भाषा गद्य की मौलिक कृति ‘आखिरी गेंद’ के लिए ‘डॉ. विद्यानिवास मिश्र’ पुरस्कार से विभूषित. सम्प्रति- राजकीय सेवारत (उत्तर प्रदेश सचिवालय, लखनऊ में संयुक्त सचिव के पद पर कार्यरत). संपर्क- 5/348, विराज खंड, गोमती नगर, लखनऊ, पिन कोड- 226010.

Updated : 2 Oct 2018 7:02 AM GMT
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