जयपुर। जयपुर के तिलक नगर स्थित महर्षि भृगु सदन में आयोजित त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन के अंतिम दिन ध्रुवपद की गंभीर और ध्यानमय ध्वनि ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। डागर वंश की बीसवीं पीढ़ी के प्रतिनिधि उस्ताद नफीसुद्दीन डागर और उस्ताद अनीसुद्दीन डागर ने राग यमन की चौताल बंदिश से ऐसा वातावरण रचा, जिसमें साधना, स्वर और लय का अद्वितीय संगम दिखाई दिया।
29 से 31 मार्च तक कला संगम भगिनी समाज फाउंडेशन द्वारा आयोजित तीसरे राष्ट्रीय अधिवेशन के समापन दिवस को ध्रुवपद गायिकी को समर्पित किया। मंच पर डागर परंपरा की विरासत सजीव हुई, जब डागर बंधुओं ने राग यमन की चौताल में प्रसिद्ध बंदिश “अधर लगाई रस प्यारी, बांसुरी बजाई” से प्रस्तुति का आरंभ किया। इसके बाद उन्होंने शिव स्तुति शिव शंकर आदि देव, शिव शंभू भोलानाथ की रचना प्रस्तुत करते हुए सामवेद का ध्यान दर्शकों व श्रोताओं का करवाया।
प्रस्तुति के दौरान पखावज पर डॉ. प्रवीण आर्य की सशक्त संगति और तानपुरे पर रहमान शेख व अब्दुल करीम शेख का स्थिर नाद वातावरण को और गहन बनाता रहा। ध्रुवपद की परंपरा के अनुरूप नोम-तोम आलाप से राग का विस्तार, फिर लय के उभार के साथ जोड व बंदिश में बोल-बाँट और बोल-तान की संयत प्रस्तुति ने श्रोताओं को ध्रुवपद की शास्त्रीय गरिमा का साक्षात्कार कराया।
इस प्रस्तुति की एक विशेष बात वह तानपुरे रहे, जिससे संगत की जा रही थी। यह वही तानपुरे थे जिसे प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित भीमसेन जोशी ने डागर बंधुओं को उनकी गायिकी से प्रसन्न होकर भेंट किया था। इस ऐतिहासिक तानपुरे की उपस्थिति ने कार्यक्रम को भावनात्मक ऊंचाई भी प्रदान की।
डागर बंधुओं की गायिकी में मींड और गमक की गहराई, स्वर-साधना की स्पष्टता और लयकारी का अनुशासन साफ झलकता रहा। चौताल की बंदिश में शब्द और स्वर का संतुलन ध्रुवपद की मूल आत्मा को प्रकट करता दिखाई दिया। समापन तक सभागार में एक ध्यानमय शांति और गंभीरता बनी रही, जो ध्रुवपद की विशिष्ट पहचान है।
क्या है? ध्रुवपद गायिकी
ध्रुवपद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन, गंभीर और ध्यानमय परंपरा है, जिसकी साधना-धारा स्वामी हरिदास से लेकर तानसेन तक निरंतर प्रवाहित रही। इसकी शुरुआत नोम-तोम आलाप से होती है, जहाँ बिना ताल के राग का विस्तार किया जाता है। इसके बाद जोर और झाला में लय का क्रमशः उभार आता है।
ध्रुवपद की बंदिश परंपरागत रूप से स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग चार खंडों में बंटी होती है। चौताल और धमार जैसे तालों में, मुख्यतः पखावज की संगति के साथ प्रस्तुति दी जाती है, जबकि तानपुरा स्थिर नाद का आधार देता है। बोल-बाँट, बोल-तान, मींड और गमक इसके प्रमुख अंग हैं। विषयवस्तु में भक्ति, दर्शन और प्रकृति के भाव प्रमुख रहते हैं। चार बानियों गौहर, खंडार, नौहार और डागर में विकसित यह परंपरा आज भी अपनी शास्त्रीय गरिमा के साथ जीवित है।