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आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता का

आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता का
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शैलेंद्र मौर्याऐसे तो किसी समाज का लेखन विविधतापूर्ण से पटा पड़ा है। इसी तरह आदिवासी लेखन भी इससे परे नहीं है। आदिवासी लेखन भी विविधताओं से अटा पड़ा है। आदिवासी लेखन में एक खास बात यह है कि यह आदिवासी समाज समूह में विश्वास रखता है जिससे आत्म पर निर्भर नहीं है। साफ है कि अधिकांश आदिवासी समुदायों में निजता की भावना नहीं आई है। यहां सब कुछ सामूहिक है। परंपरा, संस्कृति, इतिहास यहां तक कि शोषण और उसका प्रतिरोध भी सामूहिक है। निश्चिततौर पर किसी भी समूह की बात आत्मकथा में सामने नहीं आ सकता इसके लिए और विधा ज्यादा कारगर है। आदिवासी समाज में भी समाज में बदलाव के साथ यहां भी तेजी से बदलाव आया है। लेकिन आजादी के पहले और बाद दोनों में समस्याएं में परिवर्तन आया है। दोनों जगह प्रताड़ित होती रही हैं आदिवासी समाज। यहां तक कि आजादी के बाद ज्यादा प्रताड़ना सहना पड़ रहा है। आजादी के पहले कई तरह की समस्याएं थीं जिसमें प्रतिबंध, महाजनी, पुलिस प्रशासन की ज्यादती जैसी समस्याएं थी तो स्वतंत्रता के बाद यह अलग तरह की समस्या आ गई जिनमें आदिवासियों को अपने अस्तित्व पर भी खतरा है। उन्हें अपने स्वयं जल, जंगल और जमीन से बेदखल होना पड़ रहा है। विस्थापन उनके मूल समस्या है। निश्चिततौर पर आदिवासियों की खुद की संपन्न सांस्कृतिक पहचान खत्म होती जा रही है। आदिवासियों के अस्तित्व की रक्षा पर प्रश्नचिह्न है। यहां पर द्वंद है। आदिवासी समाज अपनी अपनी पहचान को बनाते हैं तो उनका अस्तित्व खत्म होता नजर आता है और अगर अस्तित्व बचाते हैं तो सांस्कृतिक पहचान विनष्ट होता नजर आ रहा है।आज का आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता का विमर्श है। आदिवासी साहित्य अपनी रचनात्मक ऊर्जा आदिवासी विद्रोहों की परंपरा से लेता है। इसलिए आंदोलनों की भाषा और भूगोल महत्वपूर्ण रहा है। गैर आदिवासी जब जब हस्तक्षेप किया है तब तब आदिवासियों ने इसका विद्रोह किया है। लेकिन इसको पूर्ण लेखन में जगह शायद नहीं मिली। आदिवासियों का विद्रोह ज्यादातर मौखिक ही रहा कोई व्यापक रूप नहीं ले सका। ऐसा नहीं है कि आदिवासी समाज की समस्या को उजागर करने में कभी भी गैर आदिवासी लेखन पीछे नहीं रहे हैं। बल्कि गैर आदिवासी लेखक दोनों समाज की तुलना सटिक स्तर पर की है। लेखन भी आर्थिक बदलाव से प्रभावित होता है। 1991 का कालखंड भारतीय अर्थव्यवस्था का विशेष रहा है जिस समय उदारवाद को अपनाया गया। खास बात यह है कि इस दौर को समकालीन आदिवासी लेखन भी शुरुआत माना जाता है। नई आर्थिक नीति से आदिवासी उत्पीड़न बढ़ गई। आदिवासी अपने जल, जंगल, जमीन से बेदखल होने शुरू हो गए। खासतौर पर दिकूओं द्वारा किए जा रहे अतिक्रमण से भरा पड़ा है। इस तरह से इस दौर में राष्ट्रीय स्तर पर रचनात्कमक ऊर्जा आदिवासी साहित्य का विकास हुआ। इसमें आदिवासी के अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा के लिए जो आवाज बुलंद हुई वह आदिवासी साहित्य है। यह दौर ही आदिवासी साहित्य की अवधारणा के निर्माण का है। आदिवासी साहित्य अस्मिता की खोज, दिकुओं द्वारा किए जा रहे शोषण के विभिन्न रूपों के उद्घाटन तथा आदिवासी अस्मिता व अस्तित्व के संकटों और उसके खिलाफ हो रहे प्रतिरोध का साहित्य है।

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आदिवासी समाज की यह खूबी रही है कि वे जमीन से गहरे जुड़े है उनमें बदलाव की एक गहरी तड़प है जो उनके साहित्य में साफ तौर पर झलकता है। यह तो तय है कि आदिवासी समाज से जुड़े होने के कारण एक नया क्षितिज और नया विस्तार देता है जो किसी भी समाज के लिए विशेष प्रभावकारी होता है। आदिवासी लेखको ने अपने साहित्य में औपनिवेशिक शोषण से मुक्ति का एक आह्वान और आदिवासी साहित्य का अपना सौंदर्यबोध है। ऐसा नहीं है कि गैर आदिवासी समाज ने आदिवासियों के साहित्य पर कार्य नहीं किया। दरअसल गैर आदिवासी समाज हमेशा से ही उत्पीड़क के रूप में आया है जो कड़वा यथार्थ है। आदिवासी इलाकों में पुलिस, ठेकेदारों, जमींदारों के रूप में आता रहा है यहां तक कि गैर आदिवासी समाज का उत्पीड़ित तबका भी आदिवासी समाज में प्रवेश करता है और वह भी उत्पीड़क बन जाता है। अब इसमें बदलाव आने लगा है अब दिकुओं ने भी कंधे से कंधा मिलकर शोषण विमुक्त समाज बनाने की ओर अग्रसर है। ऐसे ही साहित्य में भी आदिवासी समाज पहले अछुता रहा है। लेकिन समय में बदलाव आया और आज गैर आदिवासी साहित्यकारो ने भी इस पर कार्य किया है। इन साहित्यकारों ने भी आदिवासी समाज के जीवन दर्शन को बेहतर ढ़ंग से प्रस्तुत कर रहे हैं। जिसेमें आदिवासी समाज के जीवन मूल्य को दर्शाया गया है। आदिवासी समाज शुरू से ही रचनात्मक रहा है। उनकी साहित्यिक थाती उनके पुरखा साहित्य में साफ तौर पर झलकता है। यह पुरखा साहित्य आम लोगों के परे ही नहीं। आज जब खुद आदिवासी समाज लिखने की परंपरा से जुड़ गया है निश्चिततौर पर लेखन के माध्यम से आदिवासी साहित्यिकता का विस्तार हो रहा है। आदिवासियों की अपनी अपनी मातृभाषा है उन भाषाओं का अपनाकर ही उनकी जमीन से जुड़ी परंपरा और साहित्य को आगे बढ़ाया जा सका है। यहां भी द्वंद है। लेकिन साहित्य इसके लिए तैयार है। आदिवासी साहित्य आज औपनिवेशिक संरचना से लड़ने को तैयार है इसके लिए प्रयोग भी कर रहा है। आदिवासी रचनाकारों के सामने चुनौती भी है कि वे बेहतर रचना का सृजन लगातार कैसे करते रहें। क्योंकि लेखन का यही उच्च स्तर और निरंतरता बहु स्वीकार्य छवि प्रदान कर सकती है।बहरहाल आदिवासियों के सवाल को सहानुभूति और संवेदना के साथ समझने की कोशिश करने की जरूरत है। जिसके लिए उनके बीच जाने की जरूरत है। आज भी गैर आदिवासियों की आदिवासी संस्कृति के बारे में बेहतर जानकारी नहीं है। इस नितांत अलग दृष्टिकोण को पाटने की जरूरत है जो साहित्य और रचना, विमर्श के माध्यम से हो सकता है।

Updated : 22 Nov 2018 3:56 AM GMT
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