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तैरकर पढ़ाने जाते हैं मलिक

तैरकर पढ़ाने जाते हैं मलिक
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अनुकरणीय ¦ मीनाक्षी पोद्दारकेरल के अब्दुल मलिक एक ऐसे अध्यापक हैं, जो संसाधनों की कमी से निराश नहीं हुए बल्कि अपने हौसलों से दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बने.


केरल के मलप्पुरम जिले के एक मुस्लिम लोवर पब्लिक स्कूल में अध्यापक अब्दुल मलिक शिक्षा जगत में एक अनुकरणीय व्यक्तित्व हैं. संसाधनों की कमी से निराश न होते हुए वह अपने हौसलों से दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बने. स्कूल तक पहुंचने के लिए वह नदी तैरकर जाते हैं, इसीलिए कि उचित संसाधन का अभाव है. अब्दुल का घर स्कूल से 12 किलोमीटर की दूरी पर है, जिसके लिए उन्हें 3 बसें बदलनी पड़ती थीं और लगभग तीन घंटे का समय लगता है. लिहाजा वह अकसर स्कूल देर से पहुंचते थे.समय भी बचा और पैसा भीअपने एक सहकर्मी बापुत्ती की सलाह पर उन्होंने तैरकर स्कूल जाना शुरू किया. 100 मीटर चौड़ी कडालुंदी नदी को पार करने में उन्हें 3 मिनट का समय लगता है, और उनके घर से नदी 10 मिनट की दूरी पर है. नदी को तैर कर पार करने की वजह से उनका लगभग 2 घंटे का समय बचता है, साथ में 30 रु पये प्रतिदिन बचा लेते हैं. मलिक अपने कपड़ों और अन्य सामान को एक प्लास्टिक के बैग में डाल देते हैं. फिर एक ट्यूब के सहारे बड़ी सहजता से हाथ में पकड़े अन्य सामान के साथ नदी को तैर कर पार करते हैं. फिर किनारे पहुंचकर वे अपने साथ लाए हुए सूखे कपड़े पहन लेते हैं. जब मलिक स्कूल पहुंचते हैं तो और बच्चे मुस्कराकर स्वागत करते हैं तो उनका मन उनके प्रति प्यार और समर्पण से भर जाता है. अब्दुल मलिक ने अपनी 19 साल की ड्यूटी में कभी स्कूल का नागा नहीं किया. वो 41 साल के हैं और चार बच्चों के पिता भी हैं.खुद पर भरोसामलिक कहते हैं कि, अपने पहले वर्ष में तो मैंने बस से ही यात्रा की, मगर अपने एक सहयोगी की सलाह मानकर मैंने नदी को तैरकर ही आना-जाना प्रारंभ किया. ये मुझे आसान लगा. अगर मैं बस से स्कूल जाता हूं तो मुझे 12 किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब तीन घंटे लग जाते हैं लेकिन नदी को तैर कर पार करना आसान है और मैं समय पर स्कूल पहुंच जाता हूं. शुरू में घरवाले थोड़ा डरे, मगर मुझे स्वयं पर भरोसा था.उत्सुकता को बदला अभ्यास मेंजब मलिक तैरकर नदी पार करते थे तो बच्चे उन्हें उत्सुकता से देखते थे. ऐसे में उन्होंने उनकी उत्सुकता को अभ्यास में बदलने का फैसला किया. पहले एक-दो बच्चों ने तैरना शुरू किया, फिर धीरे-धीरे कई बच्चों ने तैराकी सीखने में अपनी रुचि दिखाई. अब कई बच्चे अच्छे तैराक हो गए हैं और वो तैरकर ही स्कूल जाते हैं. इतना ही नहीं, मलिक स्कूल में भी तैराकी के लिए वर्कशॉप का आयोजन करते हैं. उनके छात्र उन्हें बहुत सम्मान देते हैं. वे कहते हैं कि अब्दुल सर ने उन्हें सेहतमंद रहना भी सिखाया है. मलिक पर्यावरण प्रेमी भी हैं. वह नदी की सफाई का भी ध्यान रखते हैं. बच्चों के साथ मिलकर नदी से प्लास्टिक, कचरा और नदी की सतह पर तैरती गंदगी को साफकरते हैं. लोगों को भी ऐसा करने का संदेश देते हैं.स्थानीय नेताओं का खींचा ध्यानमलिक ने स्थानीय नेताओं का ध्यान भी अपनी और खींचा. उन्हें तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता सम्मानित भी कर चुकी हैं. इस मामले में स्थानीय पंचायत का कहना है कि इस नदी पर पहले ही तीन पुल हैं. जिस रास्ते से अब्दुल जाते हैं, वहां से ज्यादा आवाजाही नहीं है... ऐसे में पुल का निर्माण अभी संभव नहीं है.बहरहाल, अब्दुल 2029 में नौकरी से रिटायर होंगे. तब उनकी नौकरी 35 साल की हो चुकी होगी और वह करीब 700 किलोमीटर की दूरी तैर कर पार कर चुके होंगे.

Updated : 11 Oct 2018 2:49 PM GMT
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