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सॉरी ज्योति! हम तुम्हें जोखिम भरी 1200 किमी की साइकिल यात्रा करने से नहीं रोक पाए

सॉरी ज्योति! हम तुम्हें जोखिम भरी 1200 किमी की साइकिल यात्रा करने से नहीं रोक पाए
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विनायक राजहंस

कोरोना महामारी के चलते देशव्यापी लॉकडाउन के बीच अपने पिता को साइकिल पर बैठाकर हरियाणा केगुरुग्राम से 1200 किमी दूर बिहार के दरभंगा पहुंचने वाली ज्योति इस समय सोशल मीडिया की सनसनी बनी हुई है। देश ही नहीं विदेशों में भी लोग उसके हौसले को सलाम कर रहे हैं। मजदूरों के पलायनपर सवाल उठाने वाले न्यूज़ चैनल भी ज्योति की कहानी को हौसले की गाथा बताते नहीं थकरहे हैं।

लेकिन, इस गौरवपूर्ण माहौल के शोर में असल सवाल तो कहीं पीछे छूटा जा रहा है। कोई भी यह नहीं पूछ रहा है कि आखिर 15 साल की बच्ची को साइकिल पर 12 सौ किमी तक अपने बीमार पिता को क्यों ढोना पड़ा? रास्ते में हजारों लोग मिले होंगे। अधिकारी से लेकर पुलिसकर्मी तक से मिली होगी। आखिर क्यों किसी ने उसकी मदद नहीं की? सरकार ने उसके लिए बस या ट्रेन का इंतजाम क्यों नहीं किया? सड़कों के किनारे लंगर बांटते किसी समाजसेवी की नजर क्यों नहीं गई इस बच्ची पर? किसी नेता को उसकी साइकिल और उस पर बैठे उसके पिता क्यों नहीं दिखे?

दावे तो कर रही हैं सरकारें कि सड़क से किसी को जाने नहीं दिया जाएगा, सभी को साधन से ही भेजा जाएगा, पैदल या ट्रक से कोई प्रवासी सफर नहीं करेगा, फिर किसी ने उससे यह क्यों नहीं कहा कि इतना लंबा रास्ता तुम कैसे तय करोगी? आओ तुम्हें किसी बस पर बैठा देते हैं।

आज चारों ओर ज्योति का यशोगान हो रहा है। जबसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप ने ज्योति की कहानी को अपने ट्वीटर अकाउंट से शेयर किया है, तबसे उसकी चर्चा भारत में तेजी से होने लगी। इससे पहले किसी ने उसके साहस को नहीं पहचाना। इवांका ने अपने ट्वीट में लिखा था कि 15 साल की ज्योति कुमारी अपने घायल पिता को साइकिल से सात दिनों में 1,200 किमी दूरी तय करके अपने गांव ले गई। यह भारतीयों की सहनशीलता और उनके अगाध प्रेम के भावना का परिचायक है और साइकलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

उसके बाद तमाम चैनल, अखबार, वेबसाइट और सोशल मीडिया पर उसकी ही चर्चा है। ज्योति के इस साहसिक कदम को देखते हुए भारतीय साइकिलिंग फेडरेशन ने उसे ट्रायल के लिए दिल्ली बुलाया है। हालांकि ज्योति जवाब दिया है कि ‘मुझे साइकिल में रेस लगाने के लिए फोन आया, मैंने कहा कि मैं अभी तो रेस नहीं लगा सकती हूं क्योंकि मेरे पैर और हाथ सब दर्द कर रहे हैं।’ फिलहाल फेडरेशन ने उसे एक महीने बाद ट्रायल के लिए आने को कहा है।

जानना जरूरी है कि दरभंगा जिला के सिंहवाड़ा प्रखंड के सिरहुल्ली गांव निवासी मोहन पासवानगुरुग्राम में रहकर ऑटो चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण किया करते थे। एक दिन वे दुर्घटना के शिकार हो गए। पिता की देखभाल के लिए ज्योति वहां चली गई। इसी बीच देशव्यापी बंदी हो गई। आर्थिक तंगी को देखते हुए ज्योति ने साइकिल से अपने पिता को सुरक्षित घरतक पहुंचाने की ठानी। उसके अपने पिता को एक पुरानी साइकिल के कैरियर पर एक बैग के साथ बिठाया और 8 दिनों की लंबी और कष्टदायी यात्रा के बाद अपने गांवसिरहुल्ली पहुंच गई। बस इतनी सी कहानी है ज्योति की।

वास्तव में यह साहस और प्रेम की अद्भुत कहानी है। उसके जज्बे, हौसले और बुलंद इरादों की तारीफ तो होनी ही चाहिए। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ज्योति को एक लाख रुपये की मदद देने का ऐलान किया है तो यह मानवीय संवेदना का ही उदाहरण है। भारतीय साइकिलिंग फेडरेशन ने भी वही किया, जो उसे करना चाहिए। प्रतिभा का आदर होना ही चाहिए। लेकिन, जो पहले हो जाना चाहिए था, वही नहीं हुआ। अगर प्रशासन चाहता तो उसे किसी साधन से घर भेज सकता था। सत्तारूढ़ पार्टी ही नहीं, विपक्षी पार्टी का ही कोई उसकी मदद कर सकता था। पर अफसोस! ऐसा नहीं हुआ।

अब हर तरफ उसकी तारीफ है, यह सवाल कहीं नहीं है कि आखिरउसे इतनी दूरी तय करके साइकिल से घर क्यों आना पड़ा? क्या यह प्रशासनिकविफलता नहीं है? और क्या ज्योति की साइकिल यात्रा को ‘हौसले की गाथा’ बताकर प्रशासनिकविफलता छिपाने की साजिश नहीं की जा रही?

इवांका की तारीफ पर खुश हुआ जाए या व्यवस्था की खामियों पर आँसू बहाया जाए! कहना न होगा, ज्योति की कहानी में करुणा तो है ही, प्रशासनिक उदासीनता का भाव ज्यादा है। सरकार के साथ एक देश, एक इंसान के तौर पर यह हमारे लिए सामूहिक विफलता का परिणाम भी है। सत्ता ही नहीं, पूरा समाज इसके लिए जिम्मेदार है। सॉरी ज्योति! हम तुम्हें जोखिम भरी 1200 किमी की यात्रा करने से नहीं रोक पाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं, इससे उदय सर्वोदय का सहमत अथवा असहमत होना जरूरी नहीं है)

Updated : 23 May 2020 9:27 AM GMT
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