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चम्पारण सत्याग्रह ने बदली देश की राजनीति

चम्पारण सत्याग्रह ने बदली देश की राजनीति
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ताकि सनद रहे ¦ अरविंद मोहनगांधीजी के अस्त्र अहिंसा का प्रयोग वही कर सकता है, जो निर्भय हो, निस्वार्थ हो. गांधी ने चम्पारण में अपने उदाहरण से ये दोनों बातें स्थापित कीं... और फिर तो देर न लगी. जिस चम्पारण में और बिहार या देश में लोग लाल टोपी वाले को देखकर डर जाते थे, उसी चम्पारण के लोगों के लिए ब्रिटिश हुकूमत का खौफ खत्म हो गया.


गांधी के चम्पारण सत्याग्रह को याद करना क्यों जरूरी है? यह एक बड़ा सवाल है और इसे ठीक से समझा गया हो या मैंने समझ लिया हो, यह दावा करना मुश्किल है. पर इसे समझना जरूरी है, उसके बगैर हमारा नुकसान हो रहा है और हम जितनी जल्दी इसे समझेंगे, नुकसान कम करेंगे और खुद को तथा दुनिया को सही पटरी पर लाने में सफल होंगे. चम्पारण सत्याग्रह ऊपर से देखने में एक किसान समस्या का निपटान था. कई बार ज्यादा बारीकी से गौर करने पर यह सांस्कृतिक और राजनैतिक सवाल भी लगता है-बल्कि सांस्कृतिक अपमान, औरतोें की बदहाली, दलितों समेत कमजोर लोगों की दुर्गति के सवाल पर तो अभी तक ज्यादा लिखा-पढ़ा भी नहीं गया है. फिर यह राजनैतिक आंदोलन तो था ही- कई लोग राष्ट्रीय आंदोलन और गांधी के राजनैतिक जीवन में चम्पारण सत्याग्रह की भूमिका को महत्वपूर्ण मानकर ही इसको आज इतना महत्व दे रहे हैं.बड़े लक्ष्य के साथ चला आंदोलनगांधी के कथनों और लेखनों को देखने के बाद ये बातें टुकड़े-टुकड़े में तो सही लगती हैं, पर गांधी ने इसे परिभाषित करने की कोशिश नहीं की. कुछ समय बाद दक्षिण अफ्रीका के अपने जीवन के बारे में और फिर अपनी आत्मकथा लिखते हुए वे चम्पारण को बहुत स्नेह से याद करते हैं, पर आंदोलन क्या था या किन बडेÞ लक्ष्यों को लेकर चला, उस तरह की व्याख्या या समीक्षा की कोशिश उन्होंने नहीं की है. सन 42 में जब लुई फिशर ने उनसे कई दिन तक चला लंबा इंटरव्यू लिया तब उन्होंने इतना ही कहा कि चम्पारण के लोगों के कष्ट देखने के बाद मुझे पहली बार लगा कि अंग्रेजों को भारत से निकाले बगैर काम नहीं चलेगा. चम्पारण के दस्तावेज और ब्यौरे देखने पर तो आपको गांधी किसानों से यही कहते दिखेंगे कि मुझसे कुछ भी मिलने वाला नहीं है. जो कुछ मिलेगा वह गोरे अधिकारियों और निलहों से ही मिलेगा, इसलिए उनके खिलाफ हिंसक होने की जरूरत तो नहीं ही है, दुर्भावना भी न रखें. गांधी के पहले चम्पारण के किसानों ने लड़ाई लड़ी थी, निलहों को जान से भी मारा था. पर गांधी ने जरा भी हिंसा नहीं होने दी और जहां कहीं हिंसक टकराव की आशंका लगी, निलहों या किसानों की तरफ की कोई भी गतिविधि हिंसा की तरफ बढ़ती लगी तो बहुत तत्परता से शीतल फाहा सा रखकर हिंसा को टाल दिया.इसलिए गांधीवादी जमात और खासकर राजेंद्र प्रसाद जैसे उनके चम्पारण के सहयोगी भी जब तब के किस्से लिखते हैं तो वे इसे सत्याग्रह, क्र ांति, आंदोलन की जगह ‘झगड़ा-चम्पारण का झगड़ा’ ही करार देते हैं. गांधी ने भी हर किसान आदोलन की तरह न जमींदारों के खिलाफ नारे लगवाए, न सभा की, न भाषण दिए, न कर्ज देने वाले महाजनों के दस्तावेज फड़वाए. उन्होंने न अखबारों को बुलाकर बयान दिए, न कोर्ट-कचहरी का सहारा लिया. न चंदा वसूला न छाती पीटा. उन्होंने सिर्फ सच्चाई को, जो नील के किसानों की मुश्किलों से लेकर लगभग हर चम्पारणवासी के जीवन में अनेक परेशानियों को हजारों गवाहियो के माध्यम से इस तरह से सारी दुनिया के सामने रख दिया जिससे इंकार करना खुद निलहों को मुश्किल हो गया. .सच के लिए सामने आने का साहसगांधी ने सत्य को ठोस रूप में पकड़ने और प्रस्तुत करने तथा पूरी अहिंसा रखने के अलावा दूसरा काम यह किया कि किसी और का मुंह ताकने की जगह खुद के उदाहरण से अपने सहयोगियों और फिर चम्पारण के लोगों को सच के लिए सामने आने का साहस दिया. अगर उन्होंने एक गलत सरकारी आदेश को सीधे मानने से इंकार करके शासन को बैकफुट पर ला दिया तो महीने भर के अंदर हजारों किसानों ने लिखत-पढ़त में और दस्तखत/अंगूठे के निशान के साथ अपने सच और साहस को जगजाहिर करने में देर नहीं लगाई. निपट अकेले पहुंचे गांधी को सहयोग देने जुटी वकीलों की टोली को अपनी मोटी कमाई त्यागने, साहस दिखाने और गांधी की सादगी अपनाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. जब गांधी चम्पारण में अपने ऊपर मात्र दो आना खर्च करते थे तब ब्रजकिशोर बाबू, मजहरुल हक और राजेंद्र बाबू जैसे वकीलों की फीस दस हजार होती थी और मुकदमों की भरमार रहती थी. और ये सब गांधी की सादगी अपनाकर अफसोस करने की जगह खुद को धन्यभाग मानते थे.यह साहस उन्होंने अपने उदाहरण से पैदा किया. पहले ही दिन जब उनके जेल जाने की नौबत आई तो उन्होंने पहले दो सहयोगियों रामनवमी प्रसाद और धरणीधर प्रसाद से पूछ कि मै जेल गया तो आप क्या करेंगे? धरणी बाबू ने कहा कि हम तो आपकी मदद के लिए आए हैं. आप न होंगे तब हम अपनी वकालत में वापस चले जाएंगे. गांधी इस जवाब से नहीं चौंके पर ये दोनों जवाब देकर परेशान हुए. उन्हें लगा कि एक बाहरी आदमी हमारे लिए जेल जाने को तैयार है और हमें धंधे की सूझ रही है. फिर वे गांधी के पास गए और कहा कि आप जेल जाएंगे तो हम भी जेल जाएंगे. गांधी के मुंह से अनायास यह निकला कि तब तो हम जीत गए. यही हुआ. पर निर्भयता के लिए गांधी ने अपने उदाहरण के अलावा भी कुछ ‘कलाकारी’ की जिसमें अपने सहयोगियों के मन से गोरी चमड़ी का डर और उसकी ताकत हटाकर अपनी ताकत पर भरोसा करने के लिए चार्ल्स एंड्रूज को चम्पारण न रहने देना और अपने सहयोगी कृपलानी को बिना कसूर जेल भेजना शामिल था, जिससे कि लोगों के मन में शासन के गलत फैसले के प्रति नाराजगी हो और जेल का डर निकले. गांधी ने अगला काम रचनात्मक कार्यों के अपने सारे प्रयोग को पहली बार जमीन पर उतारने का किया.वैचारिक तैयारियों को जमीन पर उतारने की शुरु आतइस दौरान गांधी के अंदर वह चीज आ चुकी थी, जिसने न सिर्फ चम्पारण आंदोलन को खड़ा किया बल्किदुनिया की राजनीति और जीवन को नई दिशा दी. उन्होंने यह बदलाव दक्षिण अफ्रीका में कर लिया था-यह जरूर है कि वहां ज्यादातर प्रयोग फीनीक्स और टालस्टाय आश्रमों में हुए थे या सिर्फवहां रह रहे हिंदुस्तानी समाज के बीच. वैचारिक स्तर पर गांधी की राय इतनी साफ हो चुकी थी कि उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ की रचना भी कर ली थी. पर सारे प्रयोगों, सारी वैचारिक तैयारियों को भारतीय समाज पर, जमीन पर उतारने की शुरु आत चम्पारण से हुई. और चम्पारण बदला, बिहार बदला, मुल्क की राजनीति में नए दौर की शुरु आत हुई, विश्वव्यापी उपनिवेशवाद की विदाई का दौर शुरू हुआ. जबरदस्त बदलाव गांधी में भी हुआ, इससे भी ज्यादा उन बिहारी और सहयोगी नेताओं में हुआ जो गांधी के आंदोलन की रीढ़ बने और उन्होंने चम्पारण तथा गांधी को जितना दिया, गांधी और चम्पारण ने उससे कई गुना ज्यादा उन्हें दिया या जीवन बदलकर ले लिया. पर यह बात रेखांकित करनी जरूरी है कि यह काम उन्होंने अहिंसा से किया जो इसके पहले चम्पारण ही नहीं इतिहास में नहीं मिलता. इसीलिए अगर हम अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ दुनिया की सबसे बड़ी बगावत, 1857 को देखें तो उसका सबसे क्रूर अंत हुआ. वहां से चम्पारण तक आने में साठ साल लगे, जिसमें बार-बार छोटी हिंसक बगावतों और कांग्रेस जैसे संगठन के बनने जैसे कई स्तर के काम हुए. पर 1917 के चम्पारण के बाद मुल्क के अजाद होने और दुनिया से उपनिवेशवाद की विदाई का दौर शुरू होने में तीस साल ही लगे. इस नए अस्त्र का प्रयोग वही कर सकता है जो निर्भय हो, निस्वार्थ हो. गांधी ने चम्पारण में अपने उदाहरण से ये दोनों बातें स्थापित कीं.आंदोलन का बुनियादी लक्ष्य हासिलएक आलोचना यह की जाती है कि उस समय नील अपनी स्वाभाविक मौत मरने जा रहा था, क्योंकि तब तक कृत्रिम रंग बन गए थे और पौधे से बनने वाले नील की विदाई हो रही थी. तब सिर्फ विश्व युद्ध के चलते कुछ समय के लिए मांग एक बार फिर बनी थी और महात्मा गांधी ने उसी अवसर का लाभ लिया. अब सबको यह दिख रहा हो और खुद निलहे नील की खेती से मुंह मोड़ रहे हों तब गांधी को यह समझ न आ रहा हो, यह संभव नहीं था. चूंकि उन्होने इसी रणनीति से आंदोलन का बुनियादी लक्ष्य हासिल किया, समाज के सभी वर्गों का साथ ही नहीं लाखों लोगों की भागीदारी भी सुनिश्चित कर ली और नील की खेती के कष्ट दूर कराने के साथ अंग्रेजी हुकूमत और गोरी चमड़ी का डर दूर कराने, अपनी सादगी, अपने देसी तौर-तरीकों पर भरोसा जमाने और रचनात्मक कार्यों का विकल्प पेश करने का सफल प्रयोग भी कर लिया, इसलिए इस पर इस रणनीति पर शक शुबहा करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए.प्रयोगों की सफलता का गवाह- चम्पारणगांधी का चम्पारण प्रयोग कई मायनों में विशिष्ट है-सिर्फ हमारे राष्ट्रीय आंदोलन और ब्रिटिश उपनिवेशवाद की समाप्ति के पहले प्रयोग के रूप में ही नहीं. इसके इस रूप की चर्चा तो होती है, भले ही पूरी तफसील और गंभीरता का अभाव भी रहता हो. जैसा पहले कहा गया है, यहीं और इसी आंदोलन के दौरान गांधी ने रचनात्मक ही नहीं सभ्यतागत विकल्प के अपने प्रयोग की विधिवत शुरु आत की, जिसमें उनकी इच्छा अंग्रेजी शासन से ही नहीं निलहों से भी सहयोग लेने की थी जो पूरी नहीं हुई. उपयोगी होता कि इस मामले में ज्यादाबारीक शोध होते और प्रयोग की शुरु आत, उसके प्रारंभिक मूल्यांकन और विस्तार वगैरह की तब हुई चर्चाओं को सामने लाने का काम होता, बाद में हुए बदलावों और विस्तार पर शोध होता. खुद गांधी ने इस तरह के कामों को आगे बहुत महत्व दिया, विस्तार दिया और चम्पारण भी ऐसे प्रयोगों की सफलता का गवाह बना, पर उनको आगे बढ़ाने और पश्चिमी विकास मॉडल का विकल्प बनाने में गांधी के बाद के कांग्रेसी शासकों को कम रु चि रही. उसका क्या हश्र हुआ, कुछ काम अब तक कैसे चल रहे हैं और क्या होना चाहिए? यह अध्ययन और शोध भी होना चाहिए.

Updated : 11 Oct 2018 2:35 PM GMT
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