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चीन को कई मोर्चों पर समुचित जवाब देने की जरूरत

चीन को कई मोर्चों पर समुचित जवाब देने की जरूरत
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अवधेश कुमार

एक ओर चीन गलवानघाटी में पूर्व स्थिति बहाल करने पर बनी सहमति व्यक्त कर रहा है और दूसरी ओर वहां सेलेकर डेप्सांग तक में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है। इसमें हैरत की कोई बातनहीं। चीन की सोच और उसकी पूरी रणनीति को समझने वाले जानते हैं कि उसके लिए किसीसमझौते का अर्थ केवल अपनी विस्तारवादी राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करना है। इसलिएयह मूल प्रश्न आज भी उसी तरह कायम है कि चीन से निपटा कैसे जाए?

1949 में कम्युनिस्ट क्रांति के साथ ही चीन की माओवादीसाम्राज्यवादी कम्युनिज्म ने सभी पड़ोसी देशों के लिए समस्याएं पैदा करनी शुरु करदी थी। 1962 के युद्ध के बाद से यह प्रश्न लगातार हम पर हथौड़ों की तरह प्रहार करता रहा है।तंग शिआओ पिंग ने राजीव गांधी के साथ जिस नीति की शुरुआत की, उसका मूल यही था कि सीमा विवाद को अगली पीढ़ीके लिए छोड़कर हमें आपसी सहयोग को आगे बढ़ाना चाहिए। उसके बाद से शांति, विश्वास स्थापनातथा सीमा व्यवहार के समझौते होते गए। किंतु चीन ने कभी भारतीय भूमि पर न अपना दावाछोड़ा, न सीमा विवाद कोसुलझाने की कोशिश की और न भारत को कमजोर और दबावमें रखने की नीति बदली।

जो असभ्य औरबर्बर खूनी जंग इस समय गलवान घाटी में हुआ है, वैसे आगे कहीं कभी भी हो सकता है। चीन के राष्ट्पति शी जिनपिंग स्वयं को जीवन भर का शासक बनाने के बादमाओ से आगे निकल जाने की कल्पना में चीन को विश्व पर दबदबा रखने वाली सबसे बड़ीआर्थिक और सामरिक महाशक्ति बनाने की योजना पर आगे बढ़ रहे हैं। भारत से तनाव के बीचहुए अपने तीन भाषणों में उन्होंने सेना से सीमा तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिएयुद्ध की तैयारी की बात की है। चीन के विरुद्ध दूरगामी रणनीति बनाने और उस पर आगेबढ़ने के पहले शी के इस निजी औरराजनीतिक लक्ष्यों को गहराई से समझना होगा। हमारा 43 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पर उसका कब्जा है। 14 नवंबर 1962 को समूची भूमिको वापस लेने का संसद का प्रस्ताव केवल कागजों पर तो नहीं रहना चाहिए।

प्रधानमंत्रीनरेन्द्र मोदी कहा है कि संप्रभुता की रक्षा के लिए भारत प्रतिबद्ध है, हम जबसे उनकोरोकने-टोकने लगे हैं तबसे उनकी परेशानियां बढ़ी हैं, लेकिन सैन्य लामबंदी जिसमें मिसाइल रक्षाप्रणाली तक शामिल है आदि की तैनाती का क्रम जारी है। भारत ने सेना को वास्तविकनियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिकों से अपने स्तर पर निपटने की खुली छूट दे दी है। खुली छूट का अर्थ है चीनी सैनिकों से जैसेचाहें निपटें। इसमें हथियार न चलाने की प्रतिबद्धता खत्म। यह बहुत बड़ा नीतिगतपरिवर्तन है। थल सेना, वायुसेना और नौसेना हाईअलर्ट पर रहेंगे।

हम लद्दाख केआसमान पर वायुसेना के हेलिकॉप्टरों और लड़ाकू विमानों तक को उड़ान भरते तथा गश्तकरते देख सकते हैं। लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक फैली 3488 किमी लंबी एलएसी पर, जिसमें गलवान घाटी के अलावा दौलत बेग ओल्डी, चुशूल और डेपसांग इलाके शामिल हैं, उनमें अपनेसैनिकों की तैनाती की संख्या बढ़ा दी है। नौसेना ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनीसतर्कता बढ़ा दी है जहां चीनी नौसेना की नियमित तौर पर गतिविधियां होती हैं।

इस तरह सैन्यस्तर पर युद्ध की अवस्था से पहले की स्थिति कायम कर दी गई है। इससे चीन को सीधासंदेश गया है। किंतु आक्रोश जितना हो मुकाबला करने के लिए शांति और संतुलन के साथदूरगामी स्थायी नीति की आवश्यकता है। सैन्य लामबंदी तत्काल आवश्यक इसलिए है ताकिचीन को लगे कि भारत अब जैसे को तैसा सैन्य व्यवहार के लिए पूरी तरह तैयार है। चीनद्वारा गलवान घाटी पर लगातार अपना दावा करने के बाद भारत ने साफ कर दिया था किआपको पीछे जाना ही होगा। तो यह समस्या का समाधान नहीं है। सैन्य मोर्चा के साथहमें चीन संबंधी अपनी पूरी नीति को नए सिरे से निर्धारित करने की जरूरत है। तो और क्या किया जाए?

जैसे हम जम्मू-कश्मीरवाले पाकिस्तानी भाग को पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं, उसी तरह अक्साई चिन को चीन अधिकृत लद्दाख कहना शुरू करें। इससे एक अलग भाव पैदा होता है तथा संदेशजाएगा कि भारत इसे वापस लेने की कार्रवाई आज नहीं तो कल करेगा। चीन कभी हमारा पड़ोसी नहीं था। हमारा पड़ोसी तिब्बतथा। 1951 में चीन ने उसेहड़प लिया। 1959 में तिब्बती धर्मगुरु तथा वहां के शासक दलाई लामा को भारत में शरण लेनी पड़ी।

सवाल है कि हमनेदलाई लामा और तिब्बतियों को शरण क्यों दिया? भारत खुलकर तिब्बत की आजादी का समर्थन करे।अमेरिका, यूरोप और एशियामें भी जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देश तिब्बत पर चीन की नीति के विरुद्ध हैं, दलाई लामा कोदेशों ने उच्चतम पुरस्कार दिए हैं, तिब्बत के पक्ष में संसदों में प्रस्ताव तक पारित हुए हैं।किंतु यह मसला भारत का है और इसे ही मुखर होना होगा। भारत चीन सीमा नाम की कोई चीजनहीं है, भारत तिब्बत सीमाहै। तो इसका यही नामकरण कर दिया जाए। धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार कोमान्यता दी जाए तथा भारत अन्य देशोंको भी इसके लिए तैयार करे। दलाई लामा की हैसियत बढ़ाए। बौद्धों के तीन धर्मगुरुओंमें से दो भारत में हैं और हम पता नहीं क्यों इनका लाभ नहीं उठाते।

मोदी ने बौद्धकूटनीति में बौद्ध धर्म मानने वाले देशों से संबंधों को भावनात्मक स्तर पर लाने का जो प्रयास किया, वह सही था और उसे विस्तार और सुदृढ़ करने की जरूरत है। इसके साथ भारत ताइवान को स्वतंत्र देश कीमान्यता दे। साथ ही चीन द्वारा हड़पे गए पूर्वी तुर्कीस्तान, दक्षिणी मंगोलियाकी आजादी का समर्थन करे, हांगकांग और मकाउ के लोगों के संघर्ष में साथ होने का ऐलानकिया जाए। यह सब चीन की दुखती नस है। इनके नागरिकों को हम अपने यहां आने के लिएवीजा का प्रावधान खत्म करें।

कहने का तात्पर्ययह कि चीन के संदर्भ में समूची विदेश नीतिमें आमूल परिवर्तन किया जाए एवं सघन कूटनीति हो। चीन की सीमा 14 देशों से लगतीहै और अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा में इसने 23 देशों के साथ सीमा विवाद पैदा कर लिया है।जापान के साथ तो उसका समुद्री सीमा विवाद काफी तीखा हो चुका है। दक्षिणी चीन सागरपर दावों के कारण इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ताइवान और ब्रुनेई से उसका तनाव है। भारत आगे बढ़कर इन सारेदेशों को साथ ले एवं चीन को घेरने के लिए आगे बढ़े।

चीन दुनिया काअकेला देश है, जिसका आज कोईमित्र और विश्वसनीय साथी नहीं है। इसके विपरीत भारत के मित्र एवं सामरिक साझेदारदेशों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। हिन्द महासागर और प्रशांत क्षेत्र केज्यादातर देशों के साथ हमारा रक्षा सहयोग समझौता हो चुका है और वे सब चीन सेसशंकित हैं। चीन के खिलाफ घेरेबंदी के लिए इस पर तेजी से आगे बढ़ने की जरूरत है। आखिर हम हिन्द प्रशांत क्षेत्र में जापान, ऑस्ट्रेलिया औरअमेरिका के साथ मालाबार सैन्य अभ्यास क्यों करते हैं? इसका लाभ तो उठाएं।

इसके साथ आता हैचीन को आर्थिक रुप से धक्का देने का प्रश्न। भारत से चीन को व्यापार में करीब 50 अरब डॉलर का लाभपिछले वर्ष हुआ है। इस समय चीनी सामग्रियों के बहिष्कार का माहौल है। बेशक, औषधियों के लिएकच्चा माल से लेकर ऐसी अनेक सामग्रियों के लिए हम उस पर निर्भर हैं, इसलिए एकबारगी सबपर शुल्क बढ़ाना या आयात रोक देना राष्ट्रीय हित में नहीं होगा। हमारे यहां अनेकस्टार्टअप में उसने निवेश किया हुआ है जिसका रास्ता तलाशना है। किंतु अन्य अनेकसामग्रियां हैं जिनको रोका जा सकता है।

जहां तकइलेक्ट्रोनिक सामग्रियों तथा नई संचार तकनीक का प्रश्न है हम स्वयं इसमें सक्षमहोने की कोशिश करें। ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे इन मामलों में अग्रणी देशों का सहयोगलेकर 5 जी के हयुवाईकंपनी को रोक सकते हैं। कोरोना वायरस में संदिग्ध भूमिका के कारण चीन के साथआर्थिक संबंध कमजोर करने का भाव पूरी दुनिया में है। अमेरिका के बाद कई देश उसकीसामग्रियों पर शुल्क बढ़ाने से लेकर दण्डात्मक कार्रवाई करने पर विचार कर रहे हैं।अनेक देशों की कंपनियों ने वहां से बोरिया-बिस्तर समेटने का ऐलान किया है जिसकालाभ उठाते हुए भारत को इस भावना को आगे बढ़ाना चाहिए।

इस तरह कठोर, मुखर और दूरगामीरणनीतियों के साथ भारत आगे बढ़े तो चीन को समुचित जवाब मिलेगा एवं शी का दुनिया का सर्वोच्च महाशक्ति का शासक होनेतथा सभी पड़ोसियों को दबदबे में रखने का सपना ध्वस्त हो सकेगा। पूरे देश को लंबेसमय के लिए धैर्य के साथ एकजुट होकर तात्कालिक क्षति, परेशानियों को झेलते हुए विजय और लक्ष्यप्राप्ति के संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा। क्या हम इसके लिए तैयार हैं?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकारऔर स्तंभकार हैं)

Updated : 27 Jun 2020 8:17 AM GMT
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