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मुख्यमंत्री बनने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहे कुशवाहा

मुख्यमंत्री बनने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहे कुशवाहा
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बिहार में बड़ी राजनीतिक ताकत बनने की चाह में अपने जीवन में कई बड़े दांव लगाने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने हाल ही में एनडीए का साथ छोड़ दिया है। उनकी चाहत बिहार का मुख्यमंत्री बनना है। लेकिन, तमाम प्रयासों के बावजूद उनका यह सपना पूरा होता नहीं दिख रहा है। राजद में तेजस्वी के रहते या एनडीए में नीतीश के रहते यह संभव भी नहीं है। सवाल है कि कुशवाहा का अगला कदम अब क्या होगा? फिलहाल तो अब उनका पूरा ध्यान संगठन विस्तार पर होगा।‘माय’ समीकरण अब 69 गणित तक पहुंचालोकसभा का चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं है और देशभर में राजनीतिक समीकरण बहुत तेजी से बदल रहे हैं। दुश्मनी और दोस्ती की नई परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं और आस्था और विश्वास के नए केंद्र उभर रहे हैं। ऐसे में मोदी सरकार में मंत्री रहे उपेंद्र कुशवाहा का एनडीए से हटना एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनने का रास्ता तलाश करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।पूर्व केंद्रीय मंत्री जयनारायण निषाद का निधनबिहार की राजनीति में साल 2003 में उपेंद्र कुशवाहा उस समय एक बड़ा नाम बनकर उभरे, जब नीतीश कुमार ने उन्हें बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया और इस तरह मुख्यमंत्री के बाद सबसे ताकतवर कुर्सी कुशवाहा के पास आ गई। कुशवाहा ने भी नीतीश के प्रति अपनी आस्था को पूरी श्रद्धा से साबित किया और पूरे राज्य में उनके पक्ष में हवा बनाई। नीतीश के साथ अपने संबंधों का जिक्र करते हुए कुशवाहा उन अच्छे दिनों को याद करते हैं, तो उन बुरे दिनों को भी भूले नहीं हैं, जब 2005 में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने उपेंद्र कुशवाहा का बंगला खाली कराने के लिए उनकी गैरमौजूदगी में उनके घर का सामान तक बाहर फिंकवा दिया।यह राजनीति के खेल में कुशवाहा के लिए पहला सबक था। यहां से उन्होंने अपनी खोई राजनीतिक जमीन फिर से हासिल करने की जद्दोजहद शुरू की। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बिहार की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए अपनी चुनावी ताकत का स्पष्ट संकेत दिया। बिहार की जातीय राजनीति की जमीन पर कुशवाहा की जड़ें जमने लगीं, तो उसकी आहट नीतीश कुमार तक भी जा पहुंची और उन्होंने कुशवाहा की एक सार्वजनिक सभा में पहुंचकर उन्हें गले लगाकर सब शिकायतें दूर करने का भरोसा दिया। लेकिन यह संबंध भी ज्यादा नहीं चला। उन्होंने उसी समय समता पार्टी का मोह छोड़ दिया और राष्ट्रीय समता पार्टी बना ली। यहां से उन्होंने अपनी खोई राजनीतिक जमीन फिर से हासिल करने की जद्दोजहद शुरू की। देखना दिलचस्प होगा कि वे राजद से कितनी सीटें पाने में सफल होते हैं।

Updated : 24 Dec 2018 10:21 AM GMT
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