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इतना सीधा नहीं है बंगाल में हो रही हिंसा का मामला...

बंगाल की राजनीति में हिंसा सबसे कारगर हथियार है और टीएमसी की तरह बीजेपी भी उसी हथियार पर अपना हाथ साफ कर रही है।

इतना सीधा नहीं है बंगाल में हो रही हिंसा का मामला...
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कृष्ण कांत

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का मामला इतना सीधा नहीं है। सोशल मीडिया और कुछ खबरों को देखकर पहली नजर में ऐसा लगता है कि तृणमूल के लोग बीजेपी के लोगों पर हमला कर रहे हैं लेकिन ​ये सिर्फ एक पक्ष है।

चुनाव नतीजे के बाद राज्य में कम से कम 12 लोग मारे गए हैं। बीबीसी की खबर के मुताबिक, बीजेपी ने दावा किया है कि उनके छह कार्यकर्ता मारे गए। पुलिस ने 12 मौतों की पुष्टि की लेकिन यह नहीं बताया है कि मृतक किस पार्टी से जुड़े थे।

मीडिया ये खबर चला रहा है कि टीएमसी के कार्यकर्ता हिंसा कर रहे हैं, लेकिन वह ये नहीं पूछ रहा है कि मारे गए 12 लोगों में छह बीजेपी के हैं तो बाकी छह कार्यकर्ता किसके हैं? उन्हें किसने मारा? क्या बीजेपी भी इस हिंसा में बरा​बर की भागीदार नहीं है?

भाषा की खबर के मुताबिक, बर्धमान में मारे गए चार लोगों में तीन तृणमूल के हैं और एक बीजेपी का। इस बारे में पूछने पर बीजेपी ने कहा कि ये 'लोगों की प्रतिक्रिया' का नतीजा है। हुगली में भी एक तृणमूल कार्यकर्ता मारा गया और तीन घायल हैं।

जेपी नड्डा और कैलाश विजयवर्गीय के बयान को ही अंतिम सच मानकर बहस की जा रही है। इन्हीं नेताओं के बयान को हेडिंग बना दिया जा रहा है। अगर जेपी नड्डा का दावा सच है तो ममता बनर्जी का दावा सच क्यों नहीं है? इन दोनों में से जो भी दोषी है, क्या वह मीडिया को बताएगा कि वह हिंसा कर रहा है?

मीडिया न तो खुद खोजबीन कर रहा है, न किसी से सवाल पूछ रहा है, न अपने से कोई स्वतंत्र रूप से कोई दावा करने की स्थिति में है। ये सच है कि तृणमूल चुनाव जीती है और इस हिंसा के लिए उसकी पहली जिम्मेदारी बनती है, लेकिन ऐसा लगता है कि मीडिया बीजेपी के आरोप को ही अंतिम सच मानकर रिपोर्ट कर रहा है।

आरोप दोनों लगा रहे हैं तो दोनों से सवाल क्यों नहीं होना चाहिए? ये सब जानते हैं कि टीएमसी हिंसा का सहारा लेती है। उससे पहले वामपंथियों पर हिंसा का आरोप लगता था और उनकी हिंसा को टीएमसी की हिंसा ने मात दे दी। अब बीजेपी अपनी हिंसा से टीएमसी की हिंसा को जीतना चाहती है। बंगाल की राजनीति में हिंसा सबसे कारगर हथियार है और टीएमसी की तरह बीजेपी भी उसी हथियार पर अपना हाथ साफ कर रही है।

बाकी हिंसा और दंगा के मामले में बीजेपी का रिकॉर्ड जगजाहिर है। दिल्ली में क्या हुआ था, ये दुनिया देख चुकी है।

मुझे तो यह कोरोना की ​वि​भीषिका से ध्यान हटाने की साजिश लगती है ताकि लोग हिंसा और हत्या में उलझे रहें, ये कोई न पूछे कि साल भर में ऑक्सीजन प्लांट क्यों नहीं लगे?

(ये लेखक के अपने विचार हैं , इनसे 'उदय सर्वोदय' का सहमत होना या न होना आवश्यक नहीं है )

Updated : 2021-05-05T10:12:48+05:30
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