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बंगाल ने जो किया, वो ज़रूरी था !!

पांच राज्यों के ये चुनाव अहम् थे लेकिन बंगाल का चुनाव ऐतिहासिक महत्व का हो गया था। अत्यंत धूर्तता से ममता को चक्रव्यूह में घेरा गया था पर निजी कौशल और जनता के अभिक्रम से दीदी ने उसे भेद दिया।

बंगाल ने जो किया, वो ज़रूरी था !!
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मनोहर नायक

देश पर गिद्ध अभी मंडरा रहे हैं... पर बंगाल बड़ी राहत है ! सबसे कड़ी और गहरी चोट वहीं पड़ी, जहाँ पड़नी चाहिए थी। सत्ता और उसकी ताक़त से गर्रायी हुई पार्टी को बंगाल ने तिलमिला दिया। बंगाल में पिटे, पराजित, धराशायी हैं मोदी - शाह.... बंगाल ने लोकप्रियता और चाणक्यपने का सारा भूत उतार दिया... सारी जोड़-तोड़, तिकड़म, सरकारी तामझाम, दुरुपयोग, भोंपू मीडिया का अनर्गल प्रचार सब मुंह पर दे मारा.... भदेस, फूहड़पन का भद्र बंगलोक ने सीधा-सपाट, दो टूक जवाब दिया। यह जनादेश अहंकार, मूढ़ता, विवेकहीनता और लम्पटई को भी समझदारी भरा संदेश है तानाशाही, फ़ासीवादी मंसूबों के गाल पर यह करारा तमाचा है... यहाँ साम्प्रदायिकता को झन्नाटेदार झापड़ रसीद हुआ है। पांच राज्यों के ये चुनाव अहम् थे, लेकिन बंगाल का चुनाव ऐतिहासिक महत्व का हो गया था। अत्यंत धूर्तता से ममता को चक्रव्यूह में घेरा गया था, पर निजी कौशल और जनता के अभिक्रम से दीदी ने उसे भेद दिया। दीदी व्हीलचेयर पर क्या आयीं कि भाजपा पददलित कर दी गयी |

बंगाल के इस परिणाम ने जैसे लोकतंत्र की लौ को तेज़ किया... भरोसा दिया कि ' न उनकी हार नयी है, न अपनी जीत नयी '। बंगाल की जीत से मोदी और विकराल व भयावह हो जाते। संघ का एजेंडा भरपूर क्रूरता से लागू होना शुरू होता। बंगाल का क़िला उनके लिये फ़तह करना जरूरी था, क्योंकि हिंदुत्व की प्रयोगशाला के लिये नया प्रदेश मिलता, नयी शक्ति, मजबूती और नयी उड़ान मिलती। मोदी को एक और सुरख़ाब का पर मिलता, वे और बुलंदी पर होते और देश में साम्प्रदायिक तबाही का एक अंतहीन सिलसिला शुरू होता। नागरिकता संबंधी सभी विवादित क़ानूनों पर काम शुरू हो जाता। दमन - चक्र निर्बाध चलता और उसके निशाने पर किसान, मज़दूर, अल्पसंख्यक होते। बंगाल ने इससे अभी बचा लिया है लेकिन विवेक इनको व्यापता नहीं, सबक ये सीखते नहीं, शर्म इनको आती नहीं। ये संघ पोषित अपने विभाजनकारी, लोकतंत्र- संविधान और जन-विरोधी षड़यंत्रों को पूरा करने में अहर्निश लगे रहते हैं। बंगाल जीतने के लक्ष्य के लिये महामारी, बेहाली, मौतें कुछ भी इनके आड़े नहीं आयीं। मोदी तो संक्रमण के ' सुपर स्प्रेडर' बने रहे, शाह ने भी जी भरकर कोरोना प्रोटोकॉल की धज्जियाँ उड़ाईं। भक्तों के प्रभुओं ने हर दूसरे व्यक्ति को संक्रमित करने में अपना सर्वाधिक योगदान दिया। भीषण महामारी और घनघोर चुनाव प्रचार के बीच उनकी चिंताओं में दिल्ली बनी रही, जिसकी जनता दो सरकारों की अंधेरगर्दी, ग़ैरज़िम्मेदारी और अमानवीय सुलूक से त्रस्त, कोरोना से ग्रस्त हो काल कवलित होती रही। राष्ट्रीय राजधानी एक ऐसा श्मशान बन चुकी है, जिस पर दोनों में से किसी सरकार का दावा नहीं पर भाजपा सरकार दिल्ली पर राजनीतिक दावा मानती है, इसलिए चोर रास्ते से क़ानून बनाकर दिल्ली सरकार को उसने अपंग कर दिया। दिल्ली सरकार को उपराज्यपाल का एक दफ़्तर बना देना, ठीक ही कहा गया। यह भी मोदी- शाह का अपना साम्राज्य बढ़ाने का तरीक़ा है कि जहाँ तोड़-फोड़, ख़रीद -फ़रोख़्त से अपनी सरकार न बनती हो वहाँ इस तरह अपना राज क़ायम करो, जैसा अभी दिल्ली में किया और पहले जम्मू-कश्मीर को तोड़कर किया था। बंगाल जीतकर ये दिल्ली से विधानसभा छीनने का कारनामा भी कर सकते थे। बंगाल ने फ़िलवक़्त यह किया है कि ऐसी तमाम आशंकाओं को पीछे धकेला है।

हमारे कवि मित्र मंगलेश डबराल कहा करते थे कि इन ज़ालिमों कौ दक्षिण ही रोकेगा। उनकी यह बात तमिलनाडु और केरल ने फिर सच की है। पांच चुनावों में देखा जाये तो भाजपा को कम ही हासिल हुआ। बंगाल में वह किस क़ीमत पर दूसरे नम्बर की पार्टी बनी है। संसदीय मूल्यों, परम्पराओं, आचार-संहिता, भाषायी शालीनता, सार्वजनिक शोभनीयता, मर्यादा, गरिमा और सहिष्णुता इनको तो हर चुनाव में मोदी - शाह और टोली धूसरित कर देती है, बंगाल में जीत के लिये तो हर हद वह फलांग गयी। अपने चुनावी उन्माद में उसने जनता को मौत के मुंह में झोंक दिया। आज वह पराजित ही नहीं पतित, गर्हित, नकारा और मानव-विरोधी होने के आरोपों से लथपथ है।

बंगाल, तमिलनाडु और केरल की जीत विपक्षी दलों के लिये बड़े सबक़ की तरह है। ममता बनर्जी में ग़ज़ब का जुझारूपन और ज़िद है, आत्मविश्वास उनमें कूट- कूट कर भरा है। नेताओं में तेज़ी से दुर्लभ होता जा रहा, जनता व कार्यकर्ताओं से जुड़े रहने का गुण, उनमें भरपूर है। जीत के लिये इच्छाशक्ति प्रबल है, उनकी राजनीतिक जिजीविषा अदम्य है। संकटों, मुसीबतों में घिरकर उनका लोहा फ़ौलाद हो जाता है। ममता की इन खूबियों का इस चुनाव में नज़ारा आम था। राजनीतिक दलों, नेताओं के लिये ममता की राजनीति में क़ाफ़ी कुछ सीखने को है। ममता पर अक्सर मूडी होने, सनक में काम करने का आरोप लगता है, गनीमत यह रही कि इस बार आमतौर पर सौम्यता का पल्लू उन्होंने छोड़ा नहीं।

स्टालिन के भी तेवर लड़ाकू रहे हैं। पारिवारिक से लेकर केंद्र द्वारा प्रस्तुत अड़ंगों से जूझते हुए उन्होंने द्रमुक में जान डाली और जनता में पैठ बनायी। केरल में पुराने चलन से सत्ता में यह कांग्रेस गठबंधन के आने की बारी थी। चार साल माकपा पार्टी और सरकार विवादों में भी रही पर जब बाढ़ और फिर कोरोना का कहर टूटा तब विजयन सरकार ने वह काम किया जो दुनिया भर में मिसाल बना। उसके गठबंधन को लगातार मिली दूसरी पारी उसी काम का सुफल है। इस ऐतिहासिक जीत में ' कैप्टन ' पेनरई विजयन की लोकप्रियता और उनकी सरकार के कल्याणकारी व विकास कार्यक्रमों का योगदान है। इन तीनों राज्यों की जीत ने एक बार फिर बताया कि जनता से जुड़े रहना, उसके लिये काम करना, बुनियादी मूल्यों पर अडिग रहना कामयाबी के लिये अनिवार्य है।

कांग्रेस और माकपा की दुर्दशा तो वाकई, देखी न जाएगी। बंगाल में तो उन्हें सीटों के लाले पड़ गये हैं। माकपा के बारे में तो एक टिप्पणीकार ने लिखा कि 'वह अपने चौंतीस साल के शासन और अहंकार की सबसे लम्बी इंकम्बेंसी भुगत रही है। ' माकपा का अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का सिलसिला पुराना है। दिल्ली पर लाल सितारे को उसने ही नहीं चमकने दिया।

2009 में भी यूपीए से अलग होने का फ़ैसला तैश और सनक भरा था । एक मोटी समझ यह बनती है कि कांग्रेस के अच्छे दिन ही वाम के फलने- फूलने के भी दिन होते हैं। 2004 इसकी एक मिसाल है, जब संसद में सर्वाधिक वाम सांसद थे। आज कांग्रेस, माकपा व अन्य वामदल अनुपात में एक से जीर्ण- शीर्ण हैं। कांग्रेस का मामला तो सब कुछ गंवा कर भी होश में न आने का है। ऐसी सुस्त और लद्धड़ राजनीतिक पार्टी की कल्पना नहीं की जा सकती। चुनाव में अंतिम दिन तक उम्मीदवार चुनती है, पंद्रह दिन आला नेता ने कुछ रैलियां की और काम ख़त्म। सवा साल से कोई स्थायी अध्यक्ष ही नहीं । सब हारे, ठुकराये नेता पार्टी में सदाबहार हैं। वह बूढ़े ओर नये के झगड़ों से उबर ही नहीं पा रही। गांधी परिवार चाहिए कि नहीं, तय ही नहीं हो पा रहा... गांधी परिवार ख़ुद गुत्थी बना हुआ है। इन दुर्दिनों में नेता मिलकर काम करना नहीं सीख पाए। कांग्रेसी गाय कृशकाय है, पर सब उसे रोकने को तत्पर हैं। आधे शीर्ष नेता कोपभवन में हैं और आराम से हैं। विचारधारा, निष्ठा बेगानी, बेमानी चीज़ें हैं। नेता पाला बदलने, बिकने को हमेशा तैयार... ऐसी पार्टियों से मुक्त करना आसान होता है। यही ताड़ कर ही तो मोदी ने कांग्रेस -मुक्त होने का नारा बुलंद किया। दुर्भाग्य यह कि सुधार का मौक़ा बार- बार मिलने पर भी वह मोदी- मंडली की मनोकामना पूरी करने में लगी हुई है। कांग्रेस को अपनी मूल आस्थाओं की ओर लौटना होगा। जनेऊ दिखाने से आश्वस्तकारी छोटी- मोटी शंकाओं का भले निवारण हो जाये, दलीय और राष्ट्रीय मुश्किलों का समाधान नहीं होता। जहाँ तक राहुल गांधी का प्रश्न है, निजी तौर पर उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों पर दूसरों से ज़्यादा समझदारी दिखाई है। वे मोदी सरकार के सबसे ज्यादा अधिक कटु आलोचक रहे हैं। उनकी राजनीति अपेक्षया साफ़ - सुथरी, साहसिक रही है, समय- समय पर उन्होंने अनेक अवसरों पर गहरी संवेदना का परिचय दिया है, पर वे कांग्रेस को संकट से पार नहीं लगा पाये हैं। इसके लिए पार्टी में जान चाहिए। राहुल को चाहिए कि पार्टी अंतत: जो फ़ैसला करे, अभी वे उसे उसके द्वंद्वों से मुक्त करने, ज़मीनी नेताओं और जनता से जोड़ने में मदद करें। कांग्रेस का भविष्य लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवादी सिद्धांतों को अंगीकार किये बिना नहीं है। उसे फिर अपनी समावेशी पहचान बनानी होगी। कांग्रेस ही नहीं अपनी सल्तनत के सपनों में खोये सभी विपक्षी दलों के लिये भी यही सच है, वरना ये सुप्तप्राय दल ज़ल्दी ही लुप्तप्राय हो जाएंगे। ख़तरा अभी सिर्फ़ टला है ...वे फिर सक्रिय होंगे अपने ख़ौफ़नाक मंसूबों को लेकर.... सतत् जागरूकता, एकजुटता और संघर्ष के सिवा अब और कोई चारा नहीं ।

(ये लेखक के अपने विचार हैं, इनसे 'उदय सर्वोदय' का सहमत या न होना आवश्यक नहीं है )


Updated : 3 May 2021 2:02 PM GMT
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Shivani

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