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प्रतिस्पर्धी मीडिया बाजार और संस्कृति संक्रमण का संकट

प्रतिस्पर्धी मीडिया बाजार और संस्कृति संक्रमण का संकट
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सुशील श्रीवास्तव

देश के कोने-कोनेसे यह प्रश्न उठ रहा है कि भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में भारतीय मीडिया ईमानदारी से अपनी भूमिकानिभाने की बजाए, वाणिज्यिक विकासकी प्रतिस्पर्धा में प्रथम आने की होड़ में देश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक प्रभुसत्ता को खुले मंचों पर बेचरही है।

भारतीयमीडिया-तंत्र में शामिल प्रत्येक छोटे-बड़े पत्रकार, कवि, लेखक, कलाकार आदि को यह स्मरण रखना चाहिए कि भारतीयमीडिया के वर्तमान विकसित स्वरूप की जड़ें यहाँ कीप्रिंट मीडिया में निहित हैं। आज भीसंपूर्ण मीडिया की रीढ़ प्रिंट मीडिया ही है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभकहा जाता है एवं क्रम से भारतीय लोकतंत्र की नीव मजबूत करने में प्रिंट मीडिया कामहत्वपूर्ण योगदान रहा है।

भारतीयइलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रारंभिक विकास काल (1985 से 1994) बहुत हद तक संक्रामकविकृतियों से सुरक्षित था। आज इस प्रतिस्पर्धी मीडिया बाजार में प्रिंट के मुकाबलेइलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बिक्री बहुत ज्यादा है, अतः कमाई भीज्यादा है और दूर-दराज के गाँवों में पिछड़ी जनता तक उसकी पहुँच भी है।

वहीं इलेक्ट्रनिकमीडिया के मुकाबले में प्रिंट मीडिया की हालत खस्ता है, क्योंकि प्राचीन आध्यात्मिक मूल्यों और वैदिक संस्कृति कीमर्यादाओं की परिधि से बाहर आ चुकी जनता अब अखबारों और पत्रिकाओं में भी वहीऔपनिवेशिक शाख ढ़ूंढ़ती है जो इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर प्रतिदिन परोसा जा रहा है।

मीडिया बाजार सेजुड़े पत्रकारों को अब ऐसे "ऐतिहासिक संघर्ष" का सामना करना पड़ रहा है,जो भविष्य में केवल सांस्कृतिक परिवर्तन की चलरही आँधी अथवा अनुभव बोध से संस्कृति संक्रमण के संकट का लेखा-जोखा प्रस्तुतकरेगा। यह संघर्ष सरल सिद्ध होगा अथवा कठिन, इसकी व्यावहारिक व्याख्या सम्पूर्ण भारतवर्ष में कौन-सासत्यनिष्ठ पत्रकार अथवा पत्रकारों का समूह करेगा, यह यक्ष प्रश्नहै?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार इनके निजी हैं। उदय सर्वोदय का इससे सहमत अथवा असहमत होनाआवश्यक नहीं है)

Updated : 26 May 2020 5:45 PM GMT
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