Top
Home > Magazine > कांग्रेस के ‘अच्छे दिन’ आने के आसार

कांग्रेस के ‘अच्छे दिन’ आने के आसार

कांग्रेस के ‘अच्छे दिन’ आने के आसार
X

रेतीले धोरों के राज्य में ‘वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं’ जैसे नारों के साथ मुख्यमंत्री राजे के विरोध का जो ‘विनाशकारी बवंडर’ दिख रहा है, उसकी वजह से यहां विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अभी से निर्णायक बढ़त बनाते हुए दिखाई दे रही है. एक रिपोर्ट... जयपुर से ¦ मनोज कुमाररांजस्थान में 7 सितंबर को होने जा रहे विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी पूरे चरम पर है. यहां की जनता सत्ता के सिंहासन पर किसको बैठाएगी, इसका पता तो 11 दिसंबर को मतगणना होने के बाद ही चल पाएगा लेकिन राजस्थान के चुनावी इतिहास के विश्लेषण व वर्तमान राजनीतिक हालात को देखते हुए यहां कांग्रेस के ‘अच्छे दिन’ आने के आसार मजबूती से बन रहे हैं.1993 से लेकर अब तक हुए 200 सीटों वाले राजस्थान विधानसभा के 5 चुनावों के परिणाम यह बता रहे हैं कि यहां की जनता परिवर्तन में विश्वास रखती है. 1993 में भाजपा ने कांग्रेस से मात्र 0.33 प्रतिशत मत अधिक लेकर सरकार बना ली, तो अगले चुनाव (1998) में अशोक गहलोत के करिश्माई नेतृत्व में कांग्रेस ने भाजपा से 11.72 प्रतिशत मत अधिक लेकर 153 सीटों का अपार बहुमत हासिल कर लिया, लेकिन फिर 2003 में कांग्रेस को महज 56 सीटों पर समेट दिया. 2003 के विधानसभा चुनाव में नई दिल्ली से ‘अवतरित’ हुई धौलपुर की महारानी वसुंधरा राजे की अगुवाई में भाजपा ने कांग्रेस से 3.55 प्रतिशत मत अधिक लेकर सत्ता सिंहासन पर 120 सीटों के साथ कब्जा जमा लिया. इसके बाद 2008 के विधानसभा चुनाव में फिर मतदाताओं ने वसुंधरा राजे को नकार कर पुन: कांग्रेस को राज सौंप दिया. कांग्रेस भाजपा से 2.55 प्रतिशत मत अधिक लेकर 96 सीटों के साथ गठबंधन बनाने में सफल रही. पिछले विधानसभा चुनाव (2013) में जनता ने कांग्रेस से राज छीनकर भाजपा को खुले दिल से आशीर्वाद दिया. भाजपा, कांग्रेस से 12.10 प्रतिशत मत अधिक लेकर रिकार्ड 163 सीटों के साथ मजबूती से सत्ता से लौट आई.राजस्थान में सत्ता परिवर्तन की इस परंपरा को देखते हुए भाजपा के नेता ‘भयभीत’ हैं. राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे बार-बार जनता से अपील कर रहे हैं कि एक बार भाजपा-एक बार कांगे्रस को आशीर्वाद देने की अपनी ‘आदत’ में सुधार करना चाहिए. राजे पर तो यह ‘परिवर्तन फोबिया’ इस कदर हावी है कि वो जनता को यह कहते हुए ‘धमकी’ तक देने से नहीं चूक रही हैं कि यदि जनता बार-बार सत्ता परिवर्तन करने के अपने स्वभाव से बाज नहीं आई तो आने वाली कोई भी सरकार काम नहीं करेगी.यहां चुनाव में लगभग एक माह का ही समय बचा है, किंतु सत्ता परिवर्तन न करने के राजे या शाह की धमकी/ अपील का कोई असर मतदाताओं पर होता अभी तक नहीं दिख रहा है. वर्तमान में राजस्थान का जो राजनीतिक परिवेश दिख रहा है, उसमें भाजपा की विदाई लगभग तय-सी मालूम पड़ रही है. भाजपा के बड़े से बड़े नेता की सभाओं में भीड़ की कमी, भाजपा कार्यकर्ताओं के खुलेआम वसुंधरा सरकार के खिलाफ मुखर होने के बढ़ते मामले, रैलियों/ रोड शो में बार-बार काले झंडे दिखाकर आक्रोश व्यक्त करने की एक के बाद एक हो रही घटनाओं से भाजपा के अंदरखाने में कमल के ‘मुरझाने’ का शक समय के साथ-साथ यकीन में बदलता जा रहा है.यदि 11 दिसंबर को कांग्रेस के पक्ष में जनादेश आता है तो उसके पीछे वसुंधरा राजे व उनकी सरकार की कार्यशैली ही प्रमुखता से जिम्मेदार होगी न कि मतदाताओं का बार-बार सत्ता परिवर्तन करने का स्वभाव. राजस्थान के कोने-कोने में बुलंद हो रहे ‘वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं’ व ‘कमल का फूल, हमारी भूल’ जैसे नारे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री राजे से जनता किस हद तक नाराज है. अहम प्रश्न यह है कि 2013 में जिस जनता ने ऐतिहासिक बहुमत के साथ वसुंधरा राजे को बड़ी आशा व विश्वास के साथ मुख्यमंत्री बनाया था, आखिर 5 साल में ऐसा क्या हुआ कि वही जनता राजे की ‘खैर’ नहीं होने की बात कहकर भाजपा को धूल चटाने को बेकरार है. वास्तव में मुख्यमंत्री बनते ही राजे ने अहंकार व मनमानेपन को अपनी कार्यशैली का मुख्य ‘हथियार’ बना लिया, जिसके फलस्वरूप 163 सीटों का भारी-भरकम बहुमत देने वाली जनता शनै:-शनै: भाजपा से दूर होती गई और स्थिति यह आ गई कि आज इस चुनाव से पहले ही भाजपा लड़ाई से बाहर होती नजर आने लगी.2013 के विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे बेरोजगार युवाओं को 15 लाख नौकरी देने, महंगाई कम करने, महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता देने, मास्टर-डॉक्टर की कमी दूर करने, सभी को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने, सड़कों को चमाचम कराने, कर्मचारियों की समस्याओं को दूर करने, राज्य के विभिन्न विभागों में कार्य कर रहे लगभग साढ़े तीन लाख संविदा कार्मिकों को नियमित करने जैसे अनेक लोकलुभावन वादे करके सरकार बनाने में सफल हुई थीं. इतना ही नहीं, उन्होंने किसानों की उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद का स्थायी तंत्र विकसित करने, गोवंश को राज्य धरोहर घोषित करने, कामधेनु विश्वविद्यालय, भगवान परशुराम विश्वविद्यालय, महिला विश्वविद्यालय व शिक्षक-प्रशिक्षण विश्वविद्यालय खोलने आदि का अपने घोषणा पत्र (सुराज संकल्प पत्र) में वादा किया था. सुराज संकल्प पत्र में राजे ने कहा था, ‘हमारी कथनी व करनी में कोई अंतर नहीं रहेगा, मैं स्वयं को इस घोषणा पत्र में वर्णित कार्यक्रमों एवं योजनाओं के प्रति समर्पित करते हुए आपको विश्वास दिलाती हूं कि हम आपको एक ऐसी शासन व्यवस्था देंगे जो कि आपकी अपनी होगी.’ लेकिन यदि राजे के 5 वर्षीय शासनकाल पर गौर करें तो उनकी कथनी व करनी में कहीं भी समानता नजर नहीं आती. अपने पूरे कार्यकाल में एक तो वो किए गए वादों को पूरा नहीं कर सकीं, दूसरे राजनीतिक प्रतिशोधवश उन्होंने पूर्ववर्ती गहलोत सरकार की ऐतिहासिक नि:शुल्क दवा योजना सहित अन्य कई जनहितैषी योजनाओं व अपेक्षाकृत पिछड़े पश्चिमी राजस्थान की तस्वीर-तकदीर बदलने वाले बाड़मेर रिफाइनरी जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को जिस तरह ठंडे बस्ते में डालने का काम किया, उससे जनता में भाजपा सरकार के प्रति नाराजगी और बढ़ गई.वसुंधरा सरकार की सबसे ज्यादा मार किसानों पर पड़ी. सुराज संकल्प पत्र 2013 के पेज-16 (बिंदु संख्या 43) पर वसुंधरा राजे ने वादा किया था कि कृषि क्षेत्र को सिर्फ लाभ का ही नहीं, अपितु सम्मानजनक पेशा बनाया जाएगा लेकिन सम्मान की बात तो दूर, इस राज में अन्नदाता सरकारी संवेदनहीनता से इस कदर प्रताड़ित हुए कि राजस्थान के इतिहास में पहली बार किसानों (लगभग 100 किसान) को आत्महत्या जैसे कदम उठाने को विवश होना पड़ा. सत्ता संभालते ही राजे के सिर पर सत्ता का अहंकार सत्तारूढ़ होने के तुरंत बाद से चढ़ने लगा. आमजन से तो क्या, अपनी ही पार्टी के लोगों से न मिलने का उनका पुराना स्वभाव इस कार्यकाल में भी जारी रहा. सुराज संकल्प पत्र व चुनावी सभाओं में किए गए वादों को याद कराने वाले लोगों के लिए राजे ने ‘वादा याद दिलाओ तो लाठी खाओ’ योजना लागू कर दी मतलब यह कि महिला, बेरोजगार, किसान, कर्मचारी, व्यापारी, श्रमिक आदि जिसने भी राजे को उनका वादा याद दिलाने का प्रयास किया, उस पर सीएम साहिबा ने जमकर लाठियां बरसार्इं. संवादहीनता, जिद व कुप्रबंधन का ऐसा माहौल राजे सरकार की ओर से राज्य में बनाया गया कि वर्षों से भाजपा की कट्टर समर्थक मानी जाने वाली राजपूत व रावणा राजपूत जातियां भी इस बार खुलेआम राजे को सबक सिखाने व कांग्रेस को जिताने का अभी से आह्वान कर रही हैं.कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ‘बुने जाल’ में इस कदर उलझ चुकी है, जहां से निकल पाना उसके लिए असंभव-सा लग रहा है. ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस की बल्ले-बल्ले हो रही है. कांग्रेस को थोड़ा-बहुत ‘खतरा’ तभी हो सकता है, जब बसपा व जाट नेता हनुमान बेनीवाल और भाजपा के बागी नेता घनश्याम तिवाड़ी गठबंधन करके मैदान में उतरें, लेकिन अभी इसकी संभावना बहुत क्षीण-सी लग रही है. ऐसे हालात में राजस्थान में तो कांग्रेस की ताजपोशी तय ही दिख रही है.

Updated : 17 Nov 2018 8:08 AM GMT
Tags:    
Next Story
Share it
Top