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पीएम को सहयोग के लिए मुख्यमंत्रियों का एहसानमंद होना चाहिए

पीएम को सहयोग के लिए मुख्यमंत्रियों का एहसानमंद होना चाहिए
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संजय रोकड़े

भारत में कोरोनाको हराने के लिए हर नागरिक ने वही किया जो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाईदामोदर दास मोदी ने समय-समय पर सुझाया। हुजूर ने कहा ताली-थाली बजाओ, तो ताली-थाली बजाई गई। दीये जलाओ तो दीये जलाएगए। और तीसरे इवेंट में उन्होने आसमान से फूल बरसाने का प्लान दिया, उसमें भी सबने पूरा सहयोग किया। हालांकि सब ये अच्छे से जानते थे कि यह पीएम कीप्रतीकात्मक पहल है। मोदी का पीआर इवेंट है, बावजूद इसकेउनके इस इवेंट को सबके सब सफल बनाने में जुट गए। हुजूर की इन प्रतीकात्मक पहलों काकिसी ने भी विरोध नहीं किया।

ऐसा नही है किउनका विरोध नही किया जा सकता था,लेकिन सबने उनका साथ दिया। आज जनता से लेकर हरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनके हर पीआर इवेंट को सफल बनाया जबकि वे सब जानते थेकि एक समय के बाद मोदी इसका राजनीतिक लाभ उठाने में पीछे नही हटेंगे। बावजूद इसके सबने एकजुटता दिखाई। इस एकजुटजाऔर हर कहे को मान्य करने के लिए आखिर क्यूं न नरेन्द्र मोदी को अपने मुख्यमंत्रियों का एहसानमंदहोना चाहिए!

ये बात किसी से छुपी नहीं है कि कोरोना को लेकर किए गए अनेक फैसलों सेपीएम ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को कई दफा दूर ही रखा है, जबकि उनको चाहिए था कि इस बीमारी के खिलाफ लड़ीजाने वाली लड़ाई में पारदर्शिता बरत कर हर राज्य को उतनी ही तवज्जो देते जितनीअपने लोगों को। जो भी निर्णय लेते, उसमें राज्यसरकारों को शामिल करते लेकिन ऐसा नही किया, कई मौकों पर हमने देखा भी।

देश का पीएम होनेके नाते मोदी को चाहिए था कि इस बीमारी को हराने में जो भी इंसान उनके साथ कंधे सेकंधा मिलाकर चल रहा था, उन सबको उनकेअधिकार क्षेत्र का पावर देकर इस लड़ाई का विकेन्द्रीकरण करते लेकिन ऐसा न करकेन्द्रीयकरण पर ही जोर दिया। दुर्भाग्यवश सारे फैसलेप्रधानमंत्री कार्यालय से ही होते रहे। और आज जो स्थिति निर्मित हुई है, सामने जो संकट खड़ा हुआ है, यह उसी का परिणाम कह सकते है। हुजूर ने देश को जोन मेंबांटने के समय भी मुख्यमंत्रियों को कोई तवज्जो नही दी। जबकि पीएम को चाहिए था किजोन का बंटवारा करते समय मुख्यमंत्रियों से विशेष रूप से सलाह लेते और उन सबकीसलाह को तरजीह भी दी जाती।

दरअसल, सच तो यह है कि देश में जो जोन बनाए गए, वह केंद्र सरकार के द्वारा नहीं, स्टेट लेवल पर डिसाइड होने चाहिए थे। हर जिलेके लिए महामारी से निबटने की अलग-अलग योजना तैयार होनी चाहिए थी। बीमारी कीगंभीरता को समझते हुए राज्य स्तरीय कार्रवाई योजना को अमल में लाना चाहिए था। संकटका पता लगाने और उसे संभालने के लिए राज्य, एनडीएमए के आपदा प्रतिक्रिया कोष का उपयोग किया जा सकता था।हर प्रदेश का जिला आपातकालीन केंद्रों से सुसज्जित है।

इन सबका सदुपयोगकरके जिला मजिस्ट्रेट को आकस्मिक कमांडर बनाया जा सकता था ताकि मानिटरिंग बेहतर होसकती। राज्य स्वास्थ्य विभाग और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत एक निजी सीमितकंपनी व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, मास्क और जैविकसूट का स्टॉक बनाए रखती लेकिन इस तरह के आवश्यक मसलों को सिरे से नकार दिया।

असल में ऐसे समयमें पीएम को हठधर्मिता को दरकिनार कर सबको साथ लेना चाहिए था, पर वे यह समझदारी दिखा नहीं सके। अब तमाम प्रदेशों के सीएम यह कहते हुएदेखे जा सकते है कि केंद्र ने जो रेड जोन बनाए हैं, बहुत जगह पर वह ग्रीन जोन है। और बहुत सी जगह पर जो ग्रीनजोन बनाए गए है, वह रेड जोन मेंहै। जोन का बंटवारा लोकल स्तर पर डिसाइड होना चाहिए था लेकिन नही हुआ। ये स्थितिमोदी द्वारा फैसलों को केंद्रीकृत करने से पैदा हुई है।

वास्तव में उनको एक सुलझेहुए पीएम के नाते राज्य सरकारों को, जिलाधिकारियों को अपने पार्टनर के तौर पर देखना चाहिए था और उन सबकी सलाह कोतवज्जो देते हुए अमल में लाना चहिए था। उनको कोरोना से लड़ने के लिए मजबूत सीएम, स्थानीय नेता, डीएम की जरूरत पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया और गलतियों को स्वीकार करने की बजायचुप्पी साध ली।

खुशी की बात तोयह है कि पीएम मोदी की इन गलतियों के बाद भी किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने अपनी श्रेष्ठताका घमंड नहीं दिखाया और न ही किसीप्रकार का विरोध किया। हां, कई मौकों परनाराजगी जरूर सामने आई। इस बात से सभी अवगत हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड़ ट्रंप कोवहां के राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने ऐसी कोई सुविधा नहीं दी। जब भी मौका मिला उनकी नीतियों का विरोधकरने सड़कों पर उतर आए। यहां ये कहें कि एक बार नहीं बल्कि कई बार ट्रंप को जलील होने जैसी स्थितिका सामना करना पड़ा तोअतिश्योक्ति नहीं होगा।

किसी राज्य कासीएम चाहता तो पीएम की हठधर्मिता का विरोध राजनीतिक स्तर पर कर सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया। भारत केहर नागरिक और विरोधी दल के नेताओं ने हर मौके पर मोदी का साथ दिया।

किसी एक भी राज्य के सीएम ने अमेरिका की तरह जाहिलाना हरकत नहीं की। जिस तरह से अमेरिका में बढ़ती हुई बेरोजगारी पर ट्रंप की नीतियों का विरोध-प्रर्दशन हुआ उसके चलते ट्रंप का जीना मुश्किल हो गया था। बता दें कि अमेरिका में कोरोना पर विजय पाने की ट्रंप की नीति का हर राज्य ने विरोध किया। इसी तरह का विरोध-प्रर्दशन भारत में भी मोदी की हठधर्मिता, स्वास्थ्य सुविधाओं की सहज सुलभता, प्रवासी मजदूरों की देख-रेख नहीं करने पर देश भर में हो सकता था।

यहां भी अमेरिकियों की तरह मोदी विरोधियों में आजादी का व्याप्त भाव है, बावजूद इसके कोई हरकत सामने नहीं आई। गर भारत में भी राज्यों के मुख्यमंत्री मोदी के सामने अमेरिका जैसे हालात निर्मित कर जगह-जगह विरोध प्रर्दशन की राजनीति करते तो फिर क्या स्थिति बनती।

अमेरिका में तोकई राज्यों में बड़े बिजनेसमैन, सिनेमा हॉल और पब व्यवसाय के संचालकों ने ट्रंप को यहां तकधमकी दी कि वे स्टे एट होम के खिलाफ कोर्ट जाने का मन बना रहे हैं। कैलिफोर्नियामें एक वीकेंड में थोड़ी छूट मिलने पर हजारों लोग समुद्र तट पर पहुंच गए थे, जिसके बाद रोक लगाने में अच्छी-खासी मशक्कत करनी पड़ी थी।इससे पहले मिशिगन में लोग घरों से निकलकर सड़क पर प्रदर्शन कर चुके थे। फिर ऐसे प्रदर्शन मिनेसोटा औरवर्जीनिया राज्यों में भी हुए। हालांकि इस तरह कीविचित्र घटनाएं भारत में मोदी के लोगों द्वारा ही ताली-थाली और दीये के समय सामनेआई।

मैं इस मौके परअमेरिका की एक महिला प्रदर्शनकारी का विशेषरूप से जिक्र करना चाहूँगा। ये महिला एकटीवी चैनल पर कहती है कि मेरे शरीर पर मेरा हक है। सरकार यह तय नहीं करेगी कि मैंकहां जाऊंगी और क्या करूंगी। यहां इस घटना का जिक्र करने का संदर्भ यही है कि वहांआम नागरिक भी अपनी बात को रखने में पीछे नहीं हटा।

असल में लिबर्टी के अपने किस्म के अर्थ हैं। अमेरिकियों के लिए जो है, वह भारतवासियों के लिए भी हो सकते थे। भारत में पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों की मंडली भी अच्छी-खासी है, लेकिन उन सबने भी गंभीरता का ही परिचय दिया। सबने मोदी का साथ दिया। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि मोदी के कहे अनुसार देश की आबादी के जिस हिस्से ने उन्हें वोट नहीं किया, उस आबादी ने भी मोदी के फैसलों का न केवल सम्मान किया बल्कि उनको माना भी।

भले ही भारत में कोरोना जैसी बीमारी पर अंकुश लगाने की लिबर्टी के बहाने मोदी ने अपनी मूर्खता को देश की जनता पर थोपने की कोशिश की हो लेकिन किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री ने फिर चाहे वह विरोधी दल का ही क्यूं न हो, किसी ने भी उनके खिलाफ कोई राजनीतिक षडय़ंत्र नही रचा।

बता दें कि मोदी ने अपने मातहतों से यहां तक कहलवा दिया कि अब जनता को इस बीमारी के साथ ही जीने की आदत बना लेनी चाहिए, फिर भी उनके इस बयान का कहीं कोई राजनीतिक विरोध खड़ा नही किया गया। जिस तरह से देश भर से मोदी को राज्यों के मुख्यमंत्रियों का सहयोग प्रदान हुआ, उसे देखते हुए तमाम सीएम की उदारता के लिए हुजूर को उनका एहसानमंद होना चाहिए। पर जिस तरह से उनकी हरकतें सामने आ रही हैं, उसे देखते हुए तो ऐसा नहीं लगता है कि वे किसी का भी एहसानमंद होंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं, इससे उदय सर्वोदय का सहमत अथवा असहमत होना जरूरी नहीं है)

Updated : 19 May 2020 11:40 AM GMT
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