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सरकारी नीतियों से घायल देश

सरकारी नीतियों से घायल देश
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बहसतलब ¦ डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेयदेश का नागरिक असुरक्षित है; देश के शिक्षण-प्रशिक्षण-संस्थानों-आयोगों में अपराधी पाले जा रहे हैं और संचालन करनेवाले फूल-फल रहे हैं; जातियों-वर्गों में समाज को विभाजित कर दिया गया है; देश के युवाओं के साथ गद्दारी की जा रही है; आये-दिन हमारे जवान सैनिक नृशंसतापूर्वक मारे जा रहे हैं; साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाया जा रहा है. इन सबका जिम्मेदार कौन है?


आज देश की कैसी स्थिति है, कभी किसी ने समझने का प्रयास किया है? आहार, घर, स्वास्थ्य, शिक्षा-परीक्षा, दैनन्दिन उपयोग-उपभोग की वस्तुएं आदिक प्रतिदिन महंगी होती जा रही हैं; खुदरा महंगाई प्रतिमाह लगभग 2 प्रतिशत बढ़ रही है; बहू-बेटियों का मान-मर्दन किया जा रहा है; दलाली और रिश्वतखोरी से जनसामान्य ऊब चुका है. देश का नागरिक असुरक्षित है; देश के शिक्षण-प्रशिक्षण-संस्थानों-आयोगों में अपराधी पाले जा रहे हैं और संचालन करनेवाले फूल-फल रहे हैं; जातियों-वर्गों में समाज को विभाजित कर दिया गया है; देश के युवाओं के साथ गद्दारी की जा रही है; आये-दिन हमारे जवान सैनिक नृशंसतापूर्वक मारे जा रहे हैं; साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाया जा रहा है.कल तक विपक्ष में रहनेवाला सत्तापक्ष तत्कालीन सरकार की जिन नीतियों और योजनाओं का विरोध करता था, सत्ता में आने के बाद उन्हीं नीतियों और योजनाओं का गुणगान करते हुए, नाम बदल-बदलकर क्रि यान्वित कर रहा है; सरकार की कथनी-करनी में एकरूपता नहीं दिखती; मनचाहे निर्णय किए जा रहे हैं तथा उद्घाटनबाज प्रधानमंत्री केवल बातों की जुगाली करते आ रहे हैं.सरकारों की अमानवीयताप्रतिवर्ष वर्षाकाल में लगभग आधा भारत आवृष्टि (बाढ़) के प्रभाव में जलमग्न हो जाता है; परंतु उसके लिए कोई निरापद व्यावहारिक उपाय तलाशने में केंद्र और राज्य की सरकारें पूरी तरह से अपनी अमानवीय भूमिका में दिख रही हैं. वहीं देश के विपक्षी दल भी बाढ़ से आर्त स्वर कर रहे संबंधित राज्यों के नागरिकों की कोई कारगर सहायता करते नहीं दिखते. ऐसी परिस्थितियों में, वे दल और केंद्र का सत्ताधारी दल यह देखता है कि प्रभावित राज्यों में किस-किस दल की सरकार है, फिर उसके आधार पर राहत कार्य की दिशा निर्धारित की जाती है. यह है, हमारे देश में सत्तापक्ष और विपक्षी दल के आचरण की बीभत्स सभ्यता! भीषण जलप्लावित राज्यों के नागरिकों के प्रति देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्षी दल कांग्रेस, साम्यवादी दल तथा अन्य दलों के प्रमुख नेता में गहन संवेदना का अभाव दिखता है. प्रधानमंत्री को अपनी पार्टी की राजनीति करने और शिलान्यास-उद्घाटन करने से अवकाश कहां मिल रहा था कि वे बाढ़ की अकथनीय मार झेल रहे, जीवन-मरण के बीच झूल रहे आबाल वृद्ध नर-नारी की व्यथा-कथा के जागरूक श्रोता होते.संत्रस्त हैं युवा और किसानदेश के विपक्षी दलों में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं दिख रहा है, जो विपक्षियों को संघटित कर सके; सभी के ढपली से भिन्न-भिन्न प्रकार के स्वर सुनाई दे रहे हैं. विपक्षी एकता के मार्ग में सर्वाधिक खतरनाक भूमिका में मायावती दिख रही हैं. इसके दो प्रमुख कारण हैं:- पहला, अतिरिक्त महत्वाकांक्षा (प्रधानमंत्री की कुर्सी) और दूसरा, भारतीय जनता पार्टी के अवसरवादी महारथियों-द्वारा मायावती के उत्तर प्रदेश को लूटकर अपने, अपने भाई तथा अन्य स्वजन को भरपूर लाभ पहुंचाने का साक्ष्य सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय के पास होने का डर दिखाते रहना. यह सत्य है कि अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में मायावती ने जिस निरंकुशता और निर्दयता के साथ उत्तर प्रदेश की जनता का पर्याप्त आर्थिक दोहन किया है, उसकी यदि निष्पक्षतापूर्वक जांच करा दी जाए तो मायावती भी लालू प्रसाद की तरह से जेल की हवा खाएंगी.सबसे बड़ी बात, केंद्र और राज्य-सरकारों के पास नौकरियां नहीं हैं. हमारे युवावर्ग को सरकारी नीतियों ने बुरी तरह से घायल कर दिया है. अन्नदाता के रूप में जाने जानेवाले हमारे किसान अपने-अपने राज्यों की सरकारों की विघटनकारी नीतियों के कारण संत्रस्त हो चुके हैं; कहीं-कोई सुननेवाला नहीं.ऐसे में, सबसे पहले हमारे-आपके घरों में जो चोर, बेईमान, भ्रष्ट, उचक्के, बलात्कारी, रिश्वतखोर, सामंतवाद आदिक कुत्सित को जीनेवाले गर्हित मानिसकतावाले मां-बाप, भाई-बहन, पति-पत्नी, बेटे-बेटी, चाचा-चाची आदिक सगे-संबंधी कुण्डली मारकर बैठे हुए हैं, उन्हें अपनी-अपनी समाजविरोधी आदतों में सुधार करने होंगे. तभी अपना देश समृद्धि-सम्पन्नता के मार्ग पर चलता दिखेगा, फिर किसी भी प्रकार के नेता की हिम्मत नहीं होगी कि देश के साथ छल कर सके.

Updated : 11 Oct 2018 2:42 PM GMT
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