गौ संरक्षण योगी सरकार के लिए गौ माता की आस्था के साथ-साथ आमदनी का भी स्रोत

गौ संरक्षण योगी सरकार के लिए गौ माता की आस्था के साथ-साथ आमदनी का भी स्रोत

अजय कुमार | लखनऊ

गौ संरक्षण हमेशा से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ(आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख एजेंडा रहा है। गौ रक्षा के लिए आरएसएस और भाजपा लम्बे समय से संघर्षरत हैं। विपक्ष में रहते तो भाजपा इस पर ज्यादा कुछ नहीं कर सकी,लेकिन केन्द्र और तमाम राज्यें में सत्ता हासिल करने के बाद बीजेपी सरकारों ने गौ संरक्षण के लिए काफी कुछ किया है,लेकिन यह भी सच्चाई है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी हैं। एक तरफ बीजेपी सरकारें गौ संरक्षण के लिए नई-नई योजनाएं बना रही हैं तो दूसरी तरफ देश भर में गौ रक्षा के नाम मोब लिंचिंग की घटनाओ की बाढ़ आई हुई हैं। अक्सर ही गौ रक्षा के नाम पर कथित गौ रक्षक और कुछ हिन्दूवादी संगठन सड़क पर मार-पिटाई और खून खराबा करते दिख जाते हैं। इससे एक तरफ केन्द्र और राज्यों में सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार और संगठन की किरकिरी होती है तो विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिल जाता है। मोदी भी गौ रक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा से नाराज थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नाराजगी साबरमती आश्रम के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रम में पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आई। मोदी ने गुस्से में कहा कि इंसानों को मारना गौ-भक्ति नहीं हो सकती है। गौ-भक्ति के नाम पर लोगों ही हत्या स्वीकार नहीं की जाएगी। महात्मा गांधी आज होते तो वह भी इसके खिलाफ होते।

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गौ-रक्षा के नाम पर देशभर में हो रही हिंसा के पीछे तमाम किन्तु-परंतु काम कर रहे हैं। दरअसल, देश में गौ हत्या पर प्रतिबंध लम्बे समय से लागू है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 48 में राज्यों को गायों और बछड़ों की हत्या को प्रतिबंधित करने का आदेश दिया गया है। 26 अक्टूबर 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में भारत में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अधिनियमित विरोधी गाय हत्या कानूनों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था। बात दें, भारत में 29 राज्यों में से 20 में वर्तमान में हत्या या बिक्री को प्रतिबंधित करने वाले विभिन्न नियम हैं। केरल, पश्चिम बंगाल, गोवा, कर्नाटक, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा ऐसे राज्य हैं जहां गाय वध पर कोई प्रतिबंध नहीं है। भारत में मौजूदा मांस निर्यात नीति के अनुसार, गोमांस (गाय, बैल का मांस और बछड़ा) का निर्यात प्रतिबंधित है।

गौ माता को हिन्दू धर्म में जितना महत्व दिया गया है, गौ माता ने उतना ही अहम किरदार भारतीय राजनीति में भी निभाया है। भले ही गौ माता को बेजुबान प्राणी समझा जाता हो,लेकिन यह अपनी ‘ताकत’ से सत्ता परिवर्तन तक कर देती हैं। कौन भूल सकता है उत्तर प्रदेश का चर्चित अखलाक हत्याकांड, जिसका आरोप हिन्दूवादी संगठनों पर लगा था। अखलाक हत्याकांड पर खूब राजनीति हुई। एक तरफ अखलाक के समर्थन में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश और उनकी सरकार खड़ी थी तो वहीं बसपा और कांगे्रस भी अखलाक के बहाने भारतीय जनता पार्टी हमलावर थीं। 2015 में नोएडा के दादरी थाना क्षेत्र के बिसाहड़ा गांव में गोमांस रखने के आरोप में भीड़ के हाथों मारे गए मोहम्मद अखलाक की हत्या के मामले ने प्रदेश की राजनीति में ऐसा भूचाल लाया कि अखिलेश को दो साल के भीतर ही सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। वहीं बीजेपी विरोधी अखलाक की हत्या को इस तरह से प्रचारित और प्रसारित कर रहे थे मानों केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद मुस्लिम सुरक्षित नहीं रह गए हों। अखलाक हत्याकांड के चलते 2017 के विधान सभा चुनाव में वोटों का खूब धु्रवीकरण हुआ। जीत का सेहरा भाजपा के हाथ बंधा तो बीजेपी आलाकमान ने गौ प्रेमी के रूप में अपनी अलग पहचान रखने वाले योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया।

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गौ प्रेम जगजाहिर है। सत्ता में आते ही उन्होंने ताबड़तोड़ फैसला लेते हुए प्रदेश में गौवध पर सख्ती से रोक लगा दी। अवैध रूप से चल रहे पशु कत्ल खाने बंद करा दिए गए। योगी गौ-वध को इस लिए रोकना चाहते थे, क्योंकि इसके पीछे हिन्दू आस्था तो थी ही इसके अलावा योगी जी को यह भी लगता था गाय को सिर्फ दूध देने वाला प्राणी नहीं समझा जाए। वह जानते थे कि गाय के गोबर से लेकर मूत्र तक सबका उपयोग करके गौ पालन को कुटिर उद्योग के रूप में बढ़ावा दिया जा सकता है,जिससे गौ पालकों की तो माली हालत सुधरती ही इसके आलावा लोगों को रोजगार मिलता। एक मोटे अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश में इस समय लगभग 22 लाख छुट्टा और 10 लाख से ज्यादा निराश्रित गोवंश के पशु मौजूद हैं। इनको उनके पालको ने इस लिए छोड़ दिया है क्योंकि अब यह दूध नहीं देती हैं। योगी को लकता था अगर इनका कायदे से संरक्षण हो किया जाए तो दूध न देने वाली गाय भी दुधारू साबित हो सकती हैं। आंकड़े जुटाए गए तो यह साफ हुआ कि गौ संरक्षण के लिए अस्थाई गोशालाएं बनाने के लिए साढ़े सोलह हजार फुटबाल मैदानों से भी अधिक भूमि की जरूरत होगी। इतनी जमीन कहां से आएगी ? योगी सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था और अगर सही कहा जाए तो ऐसे सवालों का हल खोजने की ईमानदारी से कोशिश भी नहीं की गई।

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खैर, योगी ने हार नहीं मानी। इसका प्रमाण बनी 07 अगस्त 2019 को योगी सरकार द्वारा जारी विज्ञप्ति। जिसमें कहा गया था कि योगी सरकार नई गौ कल्याण योजना लागू करेगी जिससे गौ संरक्षण और रोजगार सृजन दोनों ही होंगे। योजना के पहले चरण में सरकार, सरकारी गोशालाओं की एक लाख गायों को एक प्रक्रिया के तहत उन किसानों और अन्य लोगों को सौपेंगी, जो इनकी देखभाल करने के लिए तैयार हैं। जो इन गायों की देखभाल करेंगे, उन्हें प्रतिदिन, प्रति गाय 30 रुपए के हिसाब से हर महीने सीधे बैंक खाते के माध्यम से मिलेंगे। इस हिसाब से लोगों को एक गाय के लिए प्रतिमाह 900 रुपए मिलेंगे। यूपी सरकार ने स्वीकार किया कि आवारा पशुओं को सरकार द्वारा संचालित गोशालाओं में रखना और पशुओं की उचित देखभाल करना व उनका पालन पोषण करना एक बड़ी समस्या साबित हो रही है। 2012 की गणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में 205.66 लाख पशु हैं, जिनमें से 10 से 12 लाख आवारा पशु हैं। राज्य में 523 पंजीकृत गोशालाएं हैं और कई गोशालाएं बनाई जा रही हैं। सरकार को इस नई योजना के पहले चरण के लिए 109 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। सरकार का दावा है कि इस योजना से आवारा पशुओं की समस्या का समाधान होगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। 2019-20 के बजट में राज्य सरकार ने प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए 500 करोड़ रुपये और पशु कल्याण के लिए 600 करोड़ रुपए का आवंटन किया है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में पशु आश्रयस्थलों के निर्माण और रखरखाव के लिए 250 करोड़ रुपये, जबकि शहरी क्षेत्रों में इसी कार्य के लिए 200 करोड़ रुपए शामिल हैं।

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उधर, विपक्ष और गौ संरक्षण के काम में लगे लोगों का कहना है अगर गौ संरक्षण के प्रति योगी सरकार वास्तव में संवेदनशील होती तो वह सातवें राज्य विधि आयोग की ओर से बनाए गए गो-संरक्षण अधिनियम 2018 के मसौदे को पूरी तरह से लागू कर देती। गौरतलब हो, जस्टिस आदित्यनाथ मित्तल की अध्यक्षता में उत्तर प्रदेश गौ एवं गोवंश (प्रोटेक्शन, प्रिजर्वेशन, कंजरवेशन एण्ड प्रोहिबिटेशन और स्लाटर) विधेयक, 2018 के नाम से एक विधेयक का मसौदा तैयार किया गया था। इसके साथ ही गोसंरक्षण के हर पहलू पर विचार करती 206 पृष्ठ की रिपोर्ट 21 जून 2018 को मुख्यमंत्री को सौंप दी गई थी। मगर गौवध निवारण अधिनियम 1955 में व्यापक बदलाव और उसे आज के हालात के हिसाब से बनाने वाली रिपोर्ट और प्रस्ताव पर योगी सरकार ने कोई खास रूचि नहीं दिखाई। जस्टिस एएन मित्तल द्वारा प्रस्तावित एक्ट अपने आप में इस लिए महत्वपूर्ण हो गया था क्योंकि इसमें गोसंरक्षण के तमाम कानूनी पहलुओं के साथ-साथ तमाम धार्मिक मान्यताओं का भी ध्यान रखते हुए मोहम्मद साहब के कथन कि ‘सभी चैपाए पशुओं में गाय सर्वश्रेष्ठ है, इसका सम्मान किया जाना चाहिए’ से लेकर हिंदू सिख, जैन, बौद्ध , ईसाई और यहूदी आदि सभी धर्मों में गाय के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए जैसी तमाम बातों का जिक्र था। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गौसंरक्षण का कैसा व्यावहारिक नजरिया होना चाहिए। खुले, छुट्टे और निराश्रित गौवंशीय पशुओं के रखरखाव और देखरेख की व्यवस्थाओं से लेकर इस काम के लिए धन के प्रबंध की बात भी इसमें शामिल थी।

प्रस्तावित एक्ट में कहा गया था कि राज्य भर में ऐसी प्रयोगशालाएं खोलने के लिए राज्य सरकार को आर्थिक व्यवस्था करनी होगी। इसी तरह अपराध की पुष्टि होने पर इसमें दो से सात साल की सजा और एक लाख रु तक के जुर्माने की बात भी की गई इसमें एक से दूसरे स्थान तक गोवंशीय पशुओं को लाने-ले जाने के लिए परमिट का भी प्रावधान किया गया था जो जिले या तहसील के सक्षम अधिकारी द्वारा दिया जा सकता था। इस पर योगी सरकार ने जरूर काम करते हुए हालात यह हैं कि सरकार अब करोड़ों खर्च कर तमाम महानगरों में कान्हा उपवन के नाम से गोसंरक्षण स्थल खोलने जा रही है, लेकिन राजधानी लखनऊ में 2010 में स्थापित 54 एकड़ के कान्हा उपवन की बदहाली ऐसी योजनाओं की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह लगा देती है। अखिलेश सरकार में उनके सौतेले भाई की पत्नी का एक एनजीओ इसे संचालित करता था और उसे इस काम के लिए 5 वर्ष में 8.35 करोड़ रुपये मिले थे। यह तो एक बानगी भर है। गायें तब भी बेहाल थीं और आज भी बेहाल हैं। लखनऊ का कान्हा उपवन बस किसी तरह चल रहा है, बार-बार वहां और प्रदेश में मौजूद पशुओं के सामने भुखमरी एवं दुगर्ति के हालात सामने आते रहते हैं,जो कुछ समय सुर्खिया बनने के बाद बंद हो जाती हैं।

Uday Sarvodaya Team

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