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दवा कंपनियों की मनमानी पर नकेल

दवा कंपनियों की मनमानी पर नकेल
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प्रतिबंध ¦ आशुतोष कुमार सिंहभारत में बन रही एवं बिक रही 328 ऐसी फिक्स डोज कंबिनेशन वाली दवाइयों पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है जो सेहत के लिए हानिकारक थीं. इस प्रतिबंध से यह साफ हो गया है कि पिछले 30 वर्ष से दवा कंपनियां भारतीयों को किस तरह से झांसा देकर उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही थीं.


सवा अरब आबादी वाले भारत के सेहत का हाल बहुत ही बुरा है. न तो लोगों को अपनी सेहत का ख्याल है और न ही सरकार को. विगत 30 वर्षों में देश की दवा कंपनियों ने खिचड़ी दवा बनाकर देश की जनता को न केवल आर्थिक रूप से लूटा है बल्कि उनकी सेहत से भी खिलवाड़ किया है. इसी आलोक में 1988 से चली आ रही गड़बड़ियों को भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब जाकर कुछ हद तक दुरुस्त करने का काम किया है. भारत में बन रहे एवं बिक रहे 328 ऐसी फिक्स डोज कंबिनेशन वाली दवाइयों पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है जो सेहत के लिए हानिकारक थीं. इस प्रतिबंध से यह साफ हो गया है कि पिछले 30 वर्षों से दवा कंपनियां भारतीयों को किस तरह से झांसा देकर उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही थीं.14 सितंबर दवा कंपनियों के लिए काला दिन14 सितंबर,2018 का दिन दवा कंपनियों के लिए काला दिन साबित हुआ. नई दिल्ली स्थित एफडीए भवन से एक चिट्ठी निकली. विषय में लिखा था- अधिसूचना एस.ओ.4379 (ई) से एस.ओ.4706 (ई) के संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा 328 फिक्स डोज कंबीनेशन को प्रतिबंधित करने के संबंध में. इस पत्र के निकलते ही दवा कंपनियों के मालिकों के होश उड़ गए. भारत के औषधि नियंत्रक डॉ. एस. ईश्वर रेड्डी के हस्ताक्षर से निकले इस पत्र ने हड़कंप मचा दिया. इस पत्र में ड्रग कंट्रोलर ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत सरकार द्वारा 7.09.2018 को जारी गैजेट अधिसूचना एनओएस एस.ओ.4379 (ई) से एस.ओ 4706 (ई) एवं ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 के सेक्शन 26 ए के आलोक में 328 फिक्स डोज कंबिनेशन की दवा बनाना, बेचना एवं वितरित करना पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है. इस पत्र में रेड्डी ने स्पष्ट रूप से कहा कि औषधि तकनीक सलाहकार परिषद की अनुशंसा पर यह कदम उठाया गया है. यहां गौर करने वाली बात यह है कि सलाहकार परिषद ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इन 328 फिक्स डोज कंबीनेशन में डाले गए तत्व या साल्ट का थिरैप्यूटिक (उपचारात्मक) उपयोग न्यायपूर्ण नहीं है और मानव स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ रहा है.2016 में ही इन दवाओं पर लगा था प्रतिबंधगौरतलब है कि इससे पूर्व केंद्र सरकार ने 10 मार्च 2016 को औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 26ए के तहत मानव उपयोग के उद्देश्य से 344 एफडीसी के उत्पादन, बिक्री व वितरण पर प्रतिबंध लगाया था. इसके बाद सरकार ने समान प्रावधानों के तहत 344 एफडीसी के अलावा 5 और एफडीसी को प्रतिबंधित कर दिया था. हालांकि, इससे प्रभावित उत्पादकों या निर्माताओं ने देश के कई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में इस निर्णय को चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट की ओर से 15 दिसंबर, 2017 को सुनाए गए फैसले में दिए गए निर्देशों का पालन करते हुए इस मसले पर दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड द्वारा गौर किया गया, जिसका गठन औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 5 के तहत हुआ था. इस बोर्ड ने इन दवाओं पर अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी. दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड ने अन्य बातों के अलावा यह सिफारिश भी की कि 328 एफडीसी में निहित सामग्री का कोई चिकित्सीय औचित्य नहीं है और इन एफडीसी से मानव स्वास्थ्य को खतरा पहुंच सकता है. बोर्ड की सिफारिश थी कि औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 26ए के तहत व्यापक जनहित में इन एफडीसी के उत्पादन, बिक्री या वितरण पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक है. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने पिरामल की दर्द निवारक दवाई सेरीडॉन और दो अन्य दवाइयों- पिरिटन और डार्ट से फिलहाल प्रतिबंध हटा दिया है.स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग अथॉरिटी को बचाने का आरोपसरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए दवा मामलों के जानकार एवं उतराखंड के स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग अथॉरिटी रह चुके हरे राम गुप्ता कहते हैं कि, फिक्स डोज कंबिनेशन पर प्रतिबंध बहुत पहले ही लग जाना चाहिए था. उनका कहना है कि उन स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग अधिकारियों को दंड दिया जाना चाहिए जिन्होंने बिना ड्रग कंट्रोलर आॅफ इंडिया की सहमति से न्यू ड्रग्स को बनाने एवं बेचने व वितरण करने की सहमति दी. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक स्टेट ड्रग कंट्रोलर बीएससी पास आदमी बनता रहेगा, जिसे न तो फार्माक्लोजी मालूम है और न ही दवाइयों की महत्ता, इस तरह की दुर्घटनाएं होती रहेंगी. डीसीजीआई को स्टेट लाइसेंसिग अथॉरिटी के लिए एक स्टैंडर्ड मानक बनाना चाहिए. इसके अभाव में राज्य की लाइसेंसिंग अथॉरिटी बोरा भर कर दवाइयों का लाइसेंस गैर-कानूनी तरीके से देती रही हैं. उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि डीसीजीआई स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग अथॉरिटी को बचाने का काम कर रही है. इस बाबत न्यूरो सर्जन डॉ. मनीष कुमार कहते हैं कि, यह फैसला सही हुआ है. भारत ही एक ऐसा देश हैं जहां पर इतनी खिचड़ी दवाइयां मिलती हैं. आॅर्थोपेडिक सर्जन एवं नी ट्रांसप्लांट एक्सपर्ट डॉ. अनुराग अग्रवाल का मानना है कि इस तरह की दवाइयां रेसीस्टेंसी को बढ़ा रही हैं.अभी भी बाजार में मिल रही हैं प्रतिबंधित दवाइयांबेशक सरकार ने 325 एफडीसी को बैन कर दिया है, लेकिन अभी भी इन दवाइयों की ब्रिक्री धड़ल्ले से हो रही है. वह भी ड्रग इंस्पेक्टरों की निगरानी में. ड्रग इंस्पेक्टर यह कहते हुए सुने जा रहे हैं कि जितनी दवा है उसे बेच दो. उत्तम नगर के एक दवा दुकानदार ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि अभी भी होलसेलर प्रतिबंधित दवाइयों को बिल पर दे रहे हैं. ड्रग इंस्पेक्टर बेचने के लिए कह रहे हैं. ऐसे में यह एक बड़ा प्रश्न है कि आखिर आम जनता इन दवाइयों के साइड इफेक्ट से कैसे बच पाएगी?30 साल से चल रहा था गोरखधंधाखिचड़ी दवाई बनाने का काम दवा कंपनियां पिछले 30 वर्षों से करती आ रही हैं. ये जानबूझकर देश की सेहत के साथ खेलती रहीं. अब जब इनकी सच्चाई पूरी तरह से सामने आ चुकी है, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि पिछले 30 वर्षों में बीमारी की खेती करने वाली इन दोषी दवा कंपनियों एवं दोषी सरकारी अफसरान के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है.(लेखक स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक व हेल्थ एक्टिविस्ट हैं)

Updated : 11 Oct 2018 2:02 PM GMT
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