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दुनिया को दिशा  दे रहा ‘गांधी दर्शन’

दुनिया को दिशा  दे रहा ‘गांधी दर्शन’
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गांधी चर्चा ¦ अरुण ‘सहयोगी’अहिंसक मानवीय बदलाव का गांधीवादी दृष्टिकोण दुनिया के तमाम देशों में धीरे-धीरे लेकिन लगातार ध्यान आकृष्ट कर रहा है. दुनिया अब फिर से गांधी और उनके विचारों की ओर देख रही है. गांधी के अपने देश भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आमद के चलते पश्चिमी देशों से जो आवागमन बढ़ा, उसने कुछ सालों में ही युवा पीढ़ी को भी इस महानायक के विषय में सोचने पर मजबूर कर दिया. गांधीवाद के वैश्विक स्वरूप ने उनकी सोच को बदल दिया है। गांधी के सामाजिक न्याय के स्वप्न को हासिल करने के लिए इन युवाओं को बड़ी भूमिका निभानी होगी. फिलवक्त यह कहना प्रासंगिक न होगा कि गांधी अब अप्रासंगिक होते जा रहे हैं, बल्कि आज हिंसा, असमानता, बेरोजगारी, मतभेद, धनलिप्सा व तनावभरे माहौल में वह और जरूरी जान पड़ते हैं. एक सिंहावलोकन:


वर्तमान परिदृश्य में पूरी दुनिया हिंसा, मतभेद, बेरोजगारी, महंगाई तथा तनावपूर्ण वातावरण में छटपटा रही है. ऐसे में हर किसी को गांधी, गांधीवाद और गांधी के सिद्धांत याद आ रहे हैं. दु:खद है कि गांधीजी के जिंदा रहते शायद उनके विचारों की प्रासंगिकता को लोग महसूस नहीं कर पाए. गांधी से असहमति के इसी उन्माद ने उनकी हत्या तक कर दी. कहते हैं कि वक्त तो सब सिखा देता है. आज जैसे-जैसे दुनिया हिंसा, आर्थिक मंदी, भूख, बेरोजगारी और नफरत की गिरफ्त में आती जा रही है, वैसे-वैसे दुनिया को न केवल गांधी दर्शन याद आ रहा है बल्कि उसे आत्मसात करने की आवश्यकता भी महसूस की जाने लगी है. गांधी आज क्यों याद आ रहे हैं और गांधीवाद की प्रासंगिकता क्यों महसूस की जा रही है, इसके लिए इतिहास के कुछ पन्ने पलटने जरूरी हैं.आतंकवाद के विरु द्ध युद्ध ने अमेरिकियों का मन बदलाअमेरिका पर 9/11 को हुए आतंकवादी हमले ने दुनिया की राजनीति का रु ख ही बदलकर रख दिया. 9/11 के आतंकी आक्र मण के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश द्वितीय ने कुछ ऐसा ही किया. अमेरिका पर हुए आतंकी हमले को अमेरिकी स्वाभिमान पर हमला मानते हुए राष्ट्रपति बुश ने आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर डाली. इस घोषणा के बाद बुश के पूरे शासनकाल के दौरान दुनिया के किसी भी देश से आतंकवाद का सफाया नहीं हो सका. अफगानिस्तान, इराक, इजराइल-फिलिस्तीन में हिंसा आज भी जारी है और अलकायदा जैसे आतंकी संगठन पहले से और मजबूत हुए हैं. आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध में लाखों मौतें, अरबों डॉलर का खर्च, लाखों बेगुनाहों और सैनिकों की मौत तथा इसके बाद भारी आर्थिक मंदी, बेरोजगारी एवं मानवाधिकारों के हनन ने विश्वव्यापी असंतोष पैदा कर दिया. यही एक बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण था कि अमेरिका में वर्ष 2009 में राष्ट्रपति चुनाव में सत्य, अहिंसा तथा शांति की बात करने वाले पहले अश्वेत अमेरिकी बराक ओबामा का राष्ट्रपति के रूप में पदार्पण हुआ. अमेरिकी राजनीति में आए इस क्रातिकारी परिवर्तन के पीछे आखिर क्या रहस्य था? महाबली, सर्वशक्तिमान अमेरिका की जनता आखिर जॉर्ज बुश के तथाकथित आतंकवाद विरोधी युद्ध से ऊब कर क्योंकर शांति की बात करने वाले ओबामा के समर्थन में एकमत हो गई? इसी ऐतिहासिक परिवर्तन ने एक बार फिर यह प्रश्न अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा कर दिया है कि कहीं आज के हिंसापूर्ण वातावरण में महात्मा गांधी के आदर्शों की पुन: प्रासंगिकता तो महसूस नहीं की जा रही है? ओबामा का जीवन महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रेरित रहा है. राष्ट्रपति चुनाव के समय ओबामा ने अपने सीनेट कार्यालय में महात्मा गांधी की वह तस्वीर लगा रखी थी, जिसमें गांधी शांति का संदेश देते हुए नजर आ रहे हैं. ओबामा ने खुद यह स्वीकार किया कि उन्होंने सदैव गांधीजी को अपने आदर्श एवं प्रेरणा के रूप में देखा व समझा है. इससे साफ जाहिर है कि हिंसा की बात चाहे किसी भी स्तर पर क्यों न की जाए, लेकिन वास्तविकता यही है कि हिंसा किसी भी समस्या का सम्पूर्ण एवं स्थायी समाधान नहीं है. यही कारण है कि चारों ओर गांधी के आदर्शों की प्रासंगिकता की चर्चा छिड़ी हुई है.उपज रहा आक्रोश और याद आ रहे गांधीजीगांधीजी ने कहा था कि बुनियादी जरूरतों की पूर्ति जनता को संतुष्ट रखती है और सत्ता को जीवन देती है. जबकि वर्तमान दौर में सत्ता हासिल करने के लिए आज सब कुछ किया जा रहा है. साम-दाम-दंड और भेद की राजनीति पर हासिल की गई सत्ता कभी स्थाई नहीं रहती है. गत वर्षों में दुनिया के छोटे-छोटे देशों में जहां भी गृहयुद्ध और आंदोलन हुए, वहां अशिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के नाम पर जनता को छला गया. बिना कर्म किए ही फल प्राप्त करने अर्थात राजसत्ता को दबोचने का प्रयास किया गया. इस शॉर्टकट का दुष्परिणाम है कि आज देश ही नहीं पूरी दुनिया में सांप्रदायिकता फल-फूल रही है. दुनिया के अन्य कई देश भी इस समय सांप्रदायिकता तथा जातिवाद की पीड़ा से प्रभावित हैं. आज दुनिया के किसी भी देश में शांति मार्च का निकलना हो अथवा अत्याचार व हिंसा का विरोध किया जाना हो, या हिंसा का जवाब अहिंसा से दिया जाना हो, ऐसे सभी अवसरों पर पूरी दुनिया को गांधीजी की याद आज भी आती है.देश-दुनिया में गांधी एक विचारधारा बन गई20वीं शताब्दी के प्रभावशाली लोगों में नेल्सन मंडेला, दलाई लामा, मिखाइल गोर्बाचोव, अल्बर्ट श्वाइत्जर, मदर टेरेसा, मार्टिन लूथर किंग (जू.), आंग सान सू की, पोलैंड के लेख वालेसा आदि ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपने-अपने देशों में गांधी की विचारधारा का उपयोग किया और सफलतापूर्वक अहिंसा से अपने इलाकों, देशों में परिवर्तन लाए. यह एक सबूत है इस बात का कि महात्मा गांधी के बाद और भारत के बाहर भी अहिंसा के जरिए अन्याय के खिलाफ सफलतापूर्वक लड़ाई लड़ी गई और उसमें विजय भी प्राप्त हुई.नेल्सन मंडेला को दक्षिण अफ्रीका का गांधी माना जाता है. उन्होंने गांधीवादी विचारों से प्रेरणा लेकर रंगभेद के खिलाफ अपने संघर्ष की शुरु आत की थी. मंडेला ने अपने जीवन में बार-बार गांधीवादी विचारधारा की बात कही. मार्टिन लूथर किंग गांधी के दर्शन व विचारों से काफी प्रभावित थे. इसी से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपनी रणनीति व भाषण तैयार किए और अमेरिका में मानवाधिकार आंदोलन का नेतृत्व किया. उनका कहना था- ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिए और महात्मा गांधी ने उन्हें प्राप्त करने के तरीके. महात्मा गांधी को लेकर विश्वविख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन ने कहा था- आने वाली पीढ़ियां शायद ही इस बात पर विश्वास करेंगी, कि हाड़-मांस का बना हुआ यह आदमी सचमुच कभी धरती पर था.वैश्विक महासंघ की परिकल्पना में गांधीआज भूमंडलीकरण का दौर है और अब राज्य उपनिवेशवाद का स्थान बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद ने ले रखा है. गांधीजी राज्य उपनिवेश से लड़े थे, हमें बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद से जूझना है, क्योंकि दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनके साम्राज्य विस्तार को बढ़ावा देने वाले विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व व्यापार संगठन की नापाक तिकड़ी का शिकंजा हम पर कसता जा रहा है. दरअसल गांधी के अनुसार विकास के लिए बुनियादी शर्त थी कि हम अंदर से सबल बनें, आंतरिक संसाधनों पर हमारी ज्यादा निर्भरता हो, निर्णय लेने का अधिकार हमारे हाथों में हो और हमारी सारी व्यवस्थाएं स्वतंत्र स्फूर्त हों. एक और बात साफ कर देना जरूरी है कि गांधीजी बाहर की चीजों का एकदम निषेध नहीं करते बल्कि वे इसके न्यूनातिन्यून आवश्यकता के पक्षधर हैं, क्योंकि उनका मानना था कि बाहरी शक्तियों के सीमा से अधिक होने पर वे हम पर हावी होती जाएंगी. परिणामस्वरूप हमारी स्वतंत्रता कम होती जाएगी. कुछ विचारकों का मानना है कि गांधी विचार का अनुसरण करके हम दुनिया से अलग-थलग पड़ जाएंगे, जबकि परिदृश्य एकदम अलग है. वास्तव में गांधीजी वैश्विक महासंघ की परिकल्पना में सभी राष्ट्रों का स्वतंत्र अस्तित्व है. उनके अनुसार किसी भी राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों के शोषण की आजादी नहीं रहेगी और न ही कोई राष्ट्र इतना मोहताज या लाचार होगा कि अन्य राष्ट्र उसके स्वत्व का दोहन या उसकी संप्रभुता का अपहरण कर सके. दरअसल गांधी का विचार था कि हमारे दिमाग की खिड़कियां इतनी जरूर खुली होनी चाहिए कि हम बाहर की चीजों का लाभ उठा सकें, लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हमारे दरवाजे इतने न खुल जाएं कि बाहर का भीषण अंधड़-तूफान हमारे अंदर दाखिल होकर हमारे परखच्चे उड़ा दे. गांधीजी के अनुसार हमें बाहर की खुली ताजी हवा चाहिए, सड़ांध नहीं कि जिसके रोगाणु हम पर हमला कर दें.दुनिया ने सबसे ज्यादा गांधी को याद कियादुनियाभर के 70 देशों में महात्मा गांधी की प्रतिमाएं लगी हैं. भारत के बाद अमेरिका में सबसे ज्यादा तीस प्रतिमाएं अलग-अलग शहरों में स्थापित हैं. गांधी पर लिखी गई किताबों का कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. भारत के 67वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कनाडा के विनीपेग शहर में सड़क का नामकरण महात्मा गांधी के नाम पर किया गया था. काहिरा में पूर्व दूत पीए नजारथ की किताब ‘गांधीज आउटस्टैंडिंग लीडरशिप’ के अरबी संस्करण का विमोचन किया गया. किताब में मिस्र, फलस्तीन और दक्षिण अफ्रीका सहित दुनिया के कई देशों पर गांधी के प्रभाव पर फोकस किया गया है. स्पेन के बुर्गस शहर में महात्मा गांधी की प्रतिमा लगाई गई है. देश इसे अपने प्रमुख पर्यटन स्थाल के रूप में प्रचारित करता है. वर्ष 1968 में लंदन के टेविस्टोक स्क्वेयर पर गांधी की प्रतिमा स्थापित की गई थी. वाशिंगटन में एम्बेसी रो पर भारतीय दूतावास के सामने गांधी की प्रतिमा स्थापित है. वर्ष 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसका उद्घाटन किया था.गांधी के सिद्धांतों ने दुनिया को दिया संदेशमहात्मा गांधी के पास अहिंसा, सत्याग्रह और स्वराज नाम के तीन हथियार थे. लेकिन पूरी दुनिया उनकी अहिंसा रूपी हथियार से परास्त हो गई. किसी ने सोचा भी न था कि जो काम बड़ी-बड़ी फौज नहीं कर सकती, वह बिना हथियारों के कैसे हो सकता है. युद्ध किसी भी देश को मजबूत नहीं करता, उसे सिर्फ कमजोर कर सकता है क्योंकि इसमें संसाधन और मनुष्यों की बलि चढ़ती है. गांधीजी 100 साल पहले इस बात को समझ चुके थे. उनका पूरा सिद्धांत और उनकी लड़ाई हिंसा के खिलाफ खड़ी हुई और उन्हें शानदार कामयाबी मिली. अमेरिका की लड़ाई इराक से निकलने के बाद भी अफगानिस्तान में पसरी हुई है. लीबिया और ट्यूनीशिया के विद्रोहों को उसका समर्थन था, सीरिया हर बीतते दिन के साथ नर्क में जा रहा है और हिंसक संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है. भारत लौटने के 10 साल के अंदर गांधीजी को भारत के स्वतंत्रता संग्राम में पहली कामयाबी मिली, उनकी शर्त पर. भले ही भारत में आजादी के लिए सशस्त्र आंदोलन के समर्थक भी रहे हों लेकिन गांधी ने जनमानस को हथियारों के खिलाफ करने में कामयाबी हासिल कर ली थी. गांधीजी की इस सोच ने उन्हें दुनिया में सबसे अलग खड़ा कर दिया. भारत की आज भी जो पहचान है, उसमें गांधी सबसे ऊपर हैं. रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ इतिहास की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिनी जाती है. वास्तव में अहिंसा गांधी दर्शन का आधार स्तंभ है. अहिंसा का सत्य से बहुत गहरा संबंध है. हिंसा असत्य है क्योंकि यह जीवन की एकता की विनाशिनी है और हिंसा का रास्ता बड़े खतरों से भरा हुआ है. शांति दुनिया में तभी स्थापित की जा सकती है जब हम अहिंसा का अनुसरण करें.ट्रस्टीशिप सिद्धांत को अपना रही दुनियागांधीजी आर्थिक और राजनीतिक दोनों प्रकार के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे. अहिंसा में उनके विश्वास के कारण केंद्रीकरण में निहित हिंसा के विषय में उन्हें चेतना थी. गांधीजी आत्मनिर्भर और स्वायत्त पंचायतों की स्थापना के पक्षधर थे. गांव की समस्याओं का समाधान गांववालों द्वारा ही होना चाहिए और इसके लिए संगठन वे स्वयं ही बनाएं. उनका विश्वास था कि सही वातावरण दिया जाए तो व्यक्ति में स्वयं पर शासन करने की सामर्थ्य है. आर्थिक क्षेत्र में भी गांधीजी केंद्रीकृत उद्योग के विरु द्ध थे. उन्होंने कुटीर उद्योग-धंधों के सुधार एवं स्थापना पर काफी बल दिया. सामान्यत: गांधीजी भारी उद्योगों के खिलाफ थे. अब जबकि भारी उद्योगों से निकलने वाली गैसों ने पर्यावरण की क्षति की समस्या को जन्म दिया है तब कुटीर उद्योग और लघु उद्योगों की ओर वापसी ही पर्यावरण प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव से बचने के लिए मानवता के लिए एक आशा की किरण प्रदान करती है. इस संबंध में गांधीजी का दृष्टिकोण अब भी कितना सार्थक है. गांधीजी की अद्वितीय देन है कि उन्होंने पूंजीवाद और समाजवाद का समन्वय किया. उनके ट्रस्टीशिप के सिद्धांत का यही लक्ष्य है. गांधीजी अमीरों से धन छीनकर गरीबों में बांटने में विश्वास नहीं रखते थे. वे अमीरों के फालतू धन को अमीर द्वारा ही समाज के भले के लिए ट्रस्ट में रखना चाहते थे. गांधीजी का यह विचार आजकल बहुत सार्थक है. देश-दुनिया के बड़े बड़े उद्योगपति आज ट्रस्ट के माध्यम से जाने कितने गरीबों और असहायों की मदद कर रहे हैं.गांधीवाद ही सभ्यता को बुराइयों से मुक्त कर सकता हैगांधीजी के शिक्षा संबंधी विचार आज बेहद प्रासंगिक हैं. यह सही है कि कई विचारों का संपूर्ण रूप से क्रियान्वयन नहीं किया जा सकता, लेकिन शिक्षा के संबंध में बनने वाली नीतियों और कार्यक्र मों में उन विचारों की आत्मा को लागू किया जा सकता है. ‘अध्ययनशील रहते हुए जीविका कमाओ’ जो कि उनकी बुनियादी शिक्षा का केंद्रीय सिद्धांत है, आज भारत ही नहीं पूरी दुनिया को एक नई दिशा प्रदान कर रहा है. चीन ने आज इसी पद्धति को अपनाते हुए पूरी दुनिया को मेड इन चाइना की चीजों से पाट दिया है. वहां कक्षा पांच में पढ़ने वाला बच्चा भी अपनी फीस और जेबखर्च कक्षा के दौरान कुछ तकनीकी कार्य कर कमा लेता है. शिक्षा के पाठ्यक्र म में व्यावसायिक कोर्स का लागू किया जाना गांधीजी के शिक्षा संबंधी विचारों का ही विस्तार है. इसे भारत काफी दिनों बाद समझ पाया. हमें यह तथ्य स्वीकार करना है कि गांधीवाद का प्रचार एवं अभ्यास ही हमारी सभ्यता को बुराइयों एवं ऋणात्मक प्रवृत्तियों से मुक्त कर सकता है, जो कि मानव जाति को इस्पात की एड़ियों से कुचलने की संभावना रखते हैं.

Updated : 11 Oct 2018 2:40 PM GMT
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