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मुश्किल वक्त में मुफ्त एम्बुलेंस की सेवा

मुश्किल वक्त में मुफ्त एम्बुलेंस की सेवा
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हादसों में हर रोज न कितनी जानें चली जाती हैं, जिसकी प्रमुख वजह होती है- समय पर इलाज न मिल पाना. अगर उन्हें सही समय पर इलाज मिल जाए तो कई जानें बच सकती हैं. अनिल सिंह ने इसे समझा और जरूरतमंद लोगों के लिए मुफ्त एम्बुलेंस सेवा शुरू करने का निर्णय लिया. इस कार्य की वजह से वह जल्द ही ‘लावारिसों के मसीहा’ के रूप में चर्चित हो गए.सद्भावना सेवा संस्थान का यह ध्येय वाक्य है, जिसका अर्थ है- सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दु:ख का भागी न बनना पड़े. कहने की जरूरत नहीं कि इस संस्थान का मकसद जरूरतमंदों की सेवा करना है. दरअसल, यह संस्थान पूरे देश में एम्बुलेंस की सेवा देकर उन लोगों की मदद करता है जो सड़क हादसे के बाद लावारिस पड़े दम तोड़ देते हैं. यूं तो संस्थान से कई लोग जुड़े हैं लेकिन इसके सफल संचालन का मुख्य श्रेय अनिल सिंह को जाता है. इस कार्य के चलते ही आज लोग उन्हें ‘लावारिसों का मसीहा’ के रूप में जानते हैं. मूलत: उत्तर प्रदेश स्थित खुर्जा बुलंदशहर के अनिल सिंह में सेवा भाव जन्मजात है. शुरू-शुरू में उनका झुकाव राजनीति की ओर था. इसी दौरान 1991 में उन्होंने खुर्जा में उन्होंने एक फाइनेंस कंपनी खोली और फिर एक होटल. इसके बाद वह दिल्ली आ गए और नोएडा के सेक्टर-37 में कार सेल का कारोबार शुरू किया. इसके अलावा एक छोटी कंपनी भी खोली, साथ ही वह जन सेवा भी करते रहे. इस बीच एक सड़क हादसे ने उनकी जन सेवा की आदत को उनका जुनून बना दिया, जो आज न जाने कितनी जिंदगियों का ऐसे वक्त में साथ देता है, जब उनके आसपास उनका अपना तो क्या, बेगाना भी नहीं होता. 1994 से दिल्ली में रह रहे अनिल सिंह बचपन से जुझारू प्रवृत्ति के व्यक्ति रहे हैं. एक बार वह अपने सुरक्षाकर्मियों के साथ किसी विवाह समारोह में शिरकत करने के बाद मुरादाबाद से दिल्ली लौट रहे थे. वह नींद के आगोश में थे कि अचानक कार के ब्रेक लगने से उनकी आंखें खुल गर्इं. उन्होंने चालक से पूछा कि क्या हुआ तो चालक ने बताया कि आगे किसी हादसे की वजह से बड़ा जाम लगा है. उन्होंने इधर-उधर निगाह दौड़ाई तो पता लगा कि वह गढ़ और गजरौला के बीच में हैं. अनिल कार से नीचे उतर आए और पैदल ही आगे बढ़ने लगे. कोई तीन किमी वह पैदल ही निकल गए कि अचानक उन्हें एक गड्ढे से किसी बच्चे की रोने की आवाज सुनाई दी. वह अकेला बच्चा सिर्फ सात-आठ माह का था. उन्होंने उसे अपनी शॉल में लपेट कर सीने से लगा लिया. थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्होंने खौफनाक सड़क हादसे के शिकार हुए सात-आठ लोगों को तड़पते देखा. वहां तमाशबीनों की भीड़ लगी थी मगर किसी ने घायलों को अस्पताल पहुंचाने की जहमत नहीं उठाई. उसी समय एक एम्बुलेंस वहां से गुजरी, लेकिन ‘कहीं और बुलाया गया है’ कहते हुए उसका चालक एम्बुलेंस को दौड़ा ले गया. तब अनिल सिंह ने घायलों को अस्पताल पहुंचाया.इस हादसे को देखकर अनिल की नजरों के सामने एक अन्य हादसे की तस्वीर घूम गई. 1991 में ऐसे ही एक भीषण हादसे ने उनसे उनका भाई छीन लिया था. उन्हें यह बात हमेशा कचोटती रहती थी कि काश कोई उनके भाई को वक्त रहते अस्पताल पहुंचा देता तो उनकी जान बच जाती. उन्होंने वहीं संकल्प लिया कि अब ऐसे हादसे के शिकार लोगों की मदद के लिए वह जरूर कुछ करेंगे. उनकी सामर्थ्य में जो भी होगा, वह करके ही रहेंगे लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी. मन की बात मन में ही रह गई फिर 2009 में उन्होंने एम्बुलेंस चलवाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए. उन्हें लगा कि वह संस्था बनाकर ही लोगों की मदद कर सकते हैं. उन्होंने अपने एक करीबी मित्र के समक्ष जब तीन-चार एम्बुलेंस चलवाने का प्रस्ताव रखा, तो वह इतने खुश हुए कि बोले, ‘तीन या चार क्यों? पांच तुम चलवाओ और पांच मैं चलवाता हूं.’ इस तरह 2010 में सद्भावना सेवा संस्थान वजूद में आया.अनिल सिंह ने इसे एक मिशन के तौर पर लिया. 11 सितंबर को एक भव्य समारोह में जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और अन्य आला अफसरान की मौजूदगी में इस नेक कार्य की शुरुआत की गई. देखते ही देखते सद्भावना सेवा संस्थान के पास 16 एम्बुलेंस हो गर्इं. तब अनिल सिंह ने जिला अस्पताल प्रशासन के सामने एम्बुलेंस सेवा देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन जिला अस्पताल प्रशासन का रवैया सकारात्मक नहीं था. अनिल सिंह पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा. महाराष्ट्र में शिरडी के पास मनी गांव के लोग लगभग बीस साल से एम्बुलेंस के लिए सरकार से गुहार लगा रहे थे, लेकिन उनकी फरियाद पर किसी ने ध्यान तक नहीं दिया था. अनिल सिंह को जब मनी के ग्रामीणों की यह व्यथा पता चली तो उन्होंने फौरन गांव के लिए एम्बुलेंस मुहैया कराई. मुंबई में उन्हें इस काम के लिए सम्मानित भी किया गया क्योंकि जो काम सरकार इतने वर्षों में नहीं कर पाई थी, उसे उन्होंने चुटकी बजाते कर दिया था.सद्भावना सेवा संस्थान महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, दिल्ली और एनसीआर समेत देश के लगभग हर राज्य में काम कर रहा है. फिलहाल, संस्थान की ओर से देश में दो बसें, सात शव वाहन और तकरीबन 167 एम्बुलेंस चल रहे हैं. इसके अलावा अनिल सिंह अन्य तरीकों से भी गरीबों की मदद करते हैं. किसी को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए वह दुकान खुलवा देते हैं, तो किसी को मारुति वैन दे देते हैं. कई निर्धन कन्याओं का विवाह कराने के साथ अनिल सिंह आज निर्बल बच्चों में शिक्षा की ज्योति भी जला रहे हैं.

Updated : 2 Oct 2018 6:01 AM GMT
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