गांधी आखिर गांधी क्यों ?

गांधी आखिर गांधी क्यों ?

शोध-पत्र ¦ डॉ. सुधांशु कुमार शुक्ला

आज के माहौल में, भारतीय जीवन की उठापटक, बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव, पाश्चात्य संस्कृति की उन्मादी लहर ने कई बड़े-बड़े प्रश्न खड़े कर दिए। दूसरे राजनीतिक गलियारों में गिरता स्तर और मानवीय नैतिकता का सूखते जाना, तरह-तरह की सोच को जन्म दे रहा है। आज हम अपने अतीत की गाथाओं में महापुरूषों के बारे में गाल बजाते, आँखे मटकाते नए तथ्यों, नई सोच को सोचने समझने को मजबूर कर रहे हैं। राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में गांधी की प्रासंगिकता, गांधी के मूल्य, गांधी की गलती पर प्रश्न उठाते फिरते हैं। प्रवास के समय अर्थात् पोलैंड में मैंने गांधी अर्थात् राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चिंतन मनन फिर किया। कारण स्पष्ट है कि यूरोप की बड़ी से बड़ी लाइब्रेरी हो, विश्वविद्यालय और दूतावास हो सब जगह गांधी जी की मूर्ति, गांधी जी चरखे के साथ तो कभी ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको संमत्ति दे भगवान की भजन पंक्ति में हैं।

मुझे लगता है कि गांधी ही क्यों? आज के दौर में अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं, क्या राष्ट्रपिता होने के कारण या फिर अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई के लिए ये सब भी कुछ ना कुछ कारण रहें होंगे। पर गांधी गांधी कैसे बने, गांधी क्यों जिंदा है आज भी हर अवसर पर उन्हें क्यों याद किया जाता है, इसका मुख्य कारण उनका नैतिक दर्शन या यूँ कहा जाए कि गांधी को गांधी केवल श्रीमद्भागवत गीता और रामचरितमानस भारत के दो ऐसे अमूल्य ग्रंथ हैं जिन्होंने गांधी को आज भी जीवित रखा है।

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गांधी जी जिस भारत को या उनके सपनों का भारत कैसा हो? भारत के लोग कैसे हो? उसका वर्णन रामचरितमानस में मिलता है। श्रीराम ने लंका पर विजय ऐसे ही प्राप्त नहीं कर ली, राम को नल-नील, जामवंत, केवट, वानर यहाँ तक की विभीषण की भी सहायता लेनी पड़ी। यदि भारत का उत्थान, विकास करना है तो सभी वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलना होगा तभी देश आगे बढ़ेगा। अमीर और अधिक अमीर तथा गरीब और अधिक गरीब क्यों होता चला जा रहा है? उसका कारण आर्थिक असंतुलन है। आर्थिक असमानता ने मनुष्य मनुष्य के बीच खाई पैदा कर दी है। हालात यह हो गये हैं कि परिवारों से भाईचारा खत्म होता चला जा रहा है। भाई-भाई के खूने के प्यासे होते चले जा रहे हैं। अहम् और अर्थ की अग्नि ने क्रोधाग्नि प्रज्वलित कर दी है। राजा अपना धर्म भूल रहा है, गुरू अपना धर्म भूल रहा है, वैद्य अपना धर्म भूल रहा है, कारण लालच या भय कुछ भी हो सकता है। इसीलिए रामचरितमानस में लिखा है-

सचिव बैद गुरू तीनि जौं प्रिय बोलहि भय आस। राज धर्म, तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।

यही हालत अंग्रेजों के समय अर्थात् गुलामी के समय थी। गांधी जी ने सत्य और अहिंसा दो ब्रह्मास्त्र दिए, जिसके बल पर देश ने करवट ली, देश गुलामी की जंजीरों से गुक्त हुआ। गांधी जी का सत्य और अहिंसा हमारे इन दो मूल ग्रंथों का सार है। गांधी जी कहते हैं-

मेरे पास दुनिया को सिखाने के लिए कुछ भी नया नहीं है सत्य और अहिंसा उतने ही पुराने हैं, जितने कि पर्वत। इन दोनों का प्रयोग मैंने एक व्यापक पैमाने पर किया। जितना में कर सकता था। इस प्रक्रिया में मैंने कभी-कभी गलतियाँ की और उनसे सीखा भी।…वस्तुतः सत्य की खोज में मैंने अहिंसा को खोज लिया।

(गांधी, हरिजन, पेज 49)

गांधी जी का सत्य क्या है उनका सत्य सत्यम् शिवम् सुंदरम् है। भारतीय दर्शन भी यही कहते हैं। सत्य कल्याणकारी और सुंदर है। इस तरह से केवल सत्य ही अटल है और अटल ईश्वर है-

मेरे लिए ईश्वर सत्य और प्रेम, नैतिकता, नीति और निडर है, ईश्वर प्रकाश और जीवन का स्रोत है लेकिन इसके बावजूद भी वह इन सबसे परे है। ईश्वर अन्तकरण है।

(यंग इंण्डिया, पेज 18)

जब गांधी जी यह कहते हैं कि सत्य ही ईश्वर है और ईश्वर ही सत्य है अर्थात् जो सच है, जो अटल है, जिसका स्वरूप नहीं बदलता। अद्वैत दर्शन- एको अहं द्वितीयो नास्ति। एक मैं ही हूँ, दूसरा कोई नहीं। अर्थात् सत्य केवल मैं (ईश्वर) हूँ। जगत् मिथ्या है, झूठ है, जिसका कोई स्वरूप नहीं होता है। मानव-जीवन में सत्य ही स्थायीत्व को धारण किए हुए है। झूठ माया के प्रपंच से, माया की चमक से आकर्षित अवश्य करता है। लेकिन वह क्षण भंगुर होता है। गांधी जी का सत्य, ईश्वर और नैतिकता ही मानवीय जीवन मूल्यों का आधार है। इसी के आधार पर उन्होंने सत्य की खोज, सत्य के प्रयोग किए, परिणाम स्वरूप प्रयोगों द्वारा निखरा सत्य कोहिनूर बन गया। उनकी गलतियों का पश्चाताप, उससे सीख लेना उनका जीवन दर्शन बन गया।

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गांधी जी ने सत्य के साथ अहिंसा को जोड़ा, जो उनकी सोच दृष्टि को उजागर करता है। वास्तव में सत्य और अहिंसा एक ही सिक्के के दो पहलू है। दोनों का परस्पर घनिष्टतम् संबंध है। जब हम कहते हैं, सत्य मनसा, वाचा, कर्मणा होती है। अहिंसा सबलो का हथियार है, दूसरों का हृदय परिवर्तन करना धैर्य और प्रेम के साथ। अहिंसावादी कायर नहीं होता है, वह तो मात्र सत्य से बंधे रहने के कारण मानवतावादी होता है। गांधी जी ने लिखा है-

अहिंसा किसी को चोट न पहुँचाने की नकारात्मक अवस्था मात्र नहीं है, अपितु यह बुराई करने वाले के प्रति भी भलाई करने के रूप में प्रेम का एक सकारात्मक पक्ष है। किन्तु यह पाप करने वाले की सहायता करना या उसके प्रति निष्क्रिय समर्पण नहीं है। इसके विपरीत प्रेम जो कि अहिंसा की एक सक्रिय अवस्था है, इस बात की अपेक्षा रखता है कि वह गलत करने वाले से स्वयं को अलग कर उसका विरोध करे, भले ही इससे गलत कार्य करने वाला नाराज हो या उसे चोट पहुँचे। अपने सकारात्मक अर्थ में अहिंसा सर्वोत्तम प्रेम है, सर्वोच्च उदारता है। यदि मैं अहिंसा का अनुरागी हूँ तो अपने शत्रु से भी प्रेम करूँगा। वे कहते हैं अहिंसा अचूक है, वह कभी नाकाम नहीं जाती।
(15 अगस्त के बाद, महात्मा गांधी, पेज- 197)

गांधी जी की अहिंसावादी दृष्टि मानवतावाद के लिए है कि अमानवीय लोगों के लिए है, सबसे बड़ा कारण यह है कि हम गांधी को बिना पढ़े-समझे बोलना शुरूकर देते हैं। आज के संदर्भ में जब आतंकवाद, भ्रष्टाचार का बोलबाला है, तब गांधी कैसे प्रासंगिक हो सकते हैं। गांधी जी क्रूर, अमानवीय व्यक्ति, संगठन के प्रति हिंसा की बात करते हैं।

हम कुछ प्रजातियों की रक्षा के लिए हिंसक जानवरों को मारते हैं, कुछ विशेष परिस्थितियों में मनुष्य की हत्या भी जरूरी हो जाती है। मान लें कि एक व्यक्ति पागल की तरह हाथ में तलवार लेकर उग्रतापूर्वक दौड़ रहा है और अपने रास्ते में आने वाले हर व्यक्ति को मारे दे रहा है तथा उसे जिंदा पकड़ने का साहस कोई नहीं कर पा रहा है। ऐसे में कोई भी जो इस सनकी व्यक्ति को मारेगा तो वह सम्मान का हकदार होगा और लोग उसे परोपकारी मानेंगे।

( निर्मल कुमार बोस की पुस्तक, पेज-156)

श्रीमद्भागवत में भी भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार करते हुए समझते हैं कि यह युद्ध धर्म की रक्षा के लिए है, तुम धर्म की रक्षा के लिए लड़ रहे हो, अधर्म के नाश के लिए धर्म की रक्षा के लिए भगवान स्वयं अवतरित होते हैं, सामने कोई रिश्तेदार नहीं, भाई बंधु नहीं मात्र अधर्मी खड़े हुए हैं। तुम्हारा सामना उनसे है, तू अगर नहीं मारेगा तो मैं मारूँगा। अच्छे कर्म का निमित्त बनकर धर्म की रक्षा करो। तुम्हारा यही धर्म है- क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।। (श्रीमद्भागवत गीता- पेज 55) हे पार्थ इस हीन नपुंसकता को प्राप्त मत हो। यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे शत्रुओं के दमनकर्ता हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। जब जब जहाँ जहाँ भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब मैं अवतार लेता हूँ।

गांधी दर्शन, गांधी की नैतिकता मावतावाद से जुड़ी है, अन्याय के प्रति लड़ाई मानवों के साथ अहिंसा द्वारा मानव पर क्रोध का, लालच का प्रभाव थोड़े समय के लिए होता है। उनका हृदय परिवर्तन किया जा सकता है। जिसका हृदय परिवर्तन स्वयं को धैर्य रखने से, स्वयं को आत्म शक्ति के परीक्षण से किया जाए वह स्थायी रास्ता होता है। अंग्रेजों से 200 सालों के राज को बदलने के लिए अंग्रेजों का विरोध असहयोग आंदोलन द्वारा अहिंसात्मक रवैये से किया। परंतु आज के संदर्भ में अमानवीय कुकृत्यों से गांधी हिंसात्मक रवैया ही अपनाते, जैसा कि उन्होंने कहा है। अहिंसा का संबंध मानवता से जुड़ा है। प्रेम के द्वारा ही मानवता की रक्षा की जा सकती है। प्रेम के द्वारा व्यक्ति व्यक्ति में, परिवार में, समाज में, राष्ट्र में और अन्तरराष्ट्रीय देशों में प्रेम बढ़ेगा, तभी जाति वर्ग, रंग भेद, ऊँच नीच, अमीर गरीब का भेद मिटेगा। उन्होंने लिखा भी है कि मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि कैसे लोग अपने सहकर्मियों को अपमानित कर सम्मानित महसूस करते हैं। होना तो यह नहीं चाहिए कि हम किसी एक दूसरे को अपमानित करें और कहें कि हम आध्यात्मिक देश में रहते हैं जिसे लोग विश्वगुरू कहते हैं। वास्तव में यह सोच गांधी जी पर अद्वैत दर्शन और हमारे ग्रंथों का प्रभाव है। स्वामी विवेकानंद को जब रामकृष्ण कृष्ण परमहंस यह कह कर समझा सकते हैं कि जैसे मैं तुम को देखता हूँ, वैसे ही ईश्वर को देखता हूँ। परमात्मा ही सत्य है, परमात्मा का अंश आत्म हम जीवों में है। हमें आत्मा को देखना चाहिए। इसी तरह गांधी जी पाप से घृणा करो, चोरी से घृणा करो, व्यक्ति से नहीं की बात करते हैं। यही कारण है कि गांधी जी अंग्रेजों की नीति से लड़ते थे। उनके प्रति उनके मन में कोई बैर का भाव नहीं था, गांधी जी हर व्यक्ति से प्रेम का भाव रखते थे। इसीलिए मेरे सपनों का भारत और स्वराज्य में वह भारत के अंतिम व्यक्ति तक को मूलभूत सुविधाएँ प्राप्त कराने की बात करते हैं। यदि गांधी जी रामराज्य की बात करते हैं, तो वह गोस्वामी तुलसीदास के राम राज्य की बात करते हैं। गांधी जी चाहते थे कि रामराज्य में प्रत्येक व्यक्ति अपना शासक हो उसके द्वारा चुना गया व्यक्ति ऐसा शासन करे जिससे किसी वर्ग समुदाय को परेशानी ना हो। सब वर्ग के लोग मिल जुलकर कार्य करें। शासक वर्ग पर नैतिकता का दायित्व हो, जिस प्रकार जनता हेतु राजा दशरथ चाहकर भी राम को वापस नहीं बुला पाए। श्रीराम ने जनता के पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए वनवास काटा, केवल पितृ आज्ञा ही कारण नहीं रहा, वह तो मात्र साधन था, साध्य तो राक्षसों का वध ऋषियों-मुनियों की मुक्ति था।

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सबसे छोटी इकाई गाँव तक को मूलभूत सुविधाओं से सम्पन्न करना चाहते थे। यदि गाँव उन्नत होगा तो समाज उन्नत होगा, राष्ट्र उन्नत होगा। यही कारण है कि वे कुछ लोगों को सत्ता देने के पक्ष में नहीं थे। वे सत्ता के विकेन्द्रीयकरण पर विश्वास करते थे। जिस प्रकार श्रीराम ने सत्ता आने पर वहाँ के शासक को सौंपी, चाहे वह सुग्रीव हो या फिर विभीषण। विभीषण को शराणागत होने पर वह रावण को मारकर लंका का राजा उसे बना देते हैं। गांधी जी श्रीराम से प्रभावित तभी थे, तभी वह सहयोग और समानता की बात करते हैं, मनुष्य के द्वारा मनुष्य का शोषण न हो यही रामराज्य है, यही बापू का सर्वोदय अर्थात् सबका उदय, सबका विकास, सबका कल्याण है।

गांधी जी का धर्म सत्य और अहिंसा अर्थात् मानवतावाद है। इसकी हत्या वह कभी नहीं होने देना चाहते हैं। वह मनुस्मृति के इस श्लोक पर अपना जीवन चलाते रहे- धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षतिः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोडवधीत्।। (मनुस्मृति, अध्याय-6, श्लोक 15) मारा हुआ धर्म मारने वाले का नाश करता है, रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसीलिए धर्म का हनन कभी नहीं करना चाहिए। श्रीकृष्ण और श्रीराम ने धर्म की रक्षा के लिए ही अवतार लिया, उनका पूरा जीवन धर्म की रक्षा हेतु बीता। उसी प्रकार गांधी जी का धर्म सत्य और अहिंसा मानवता रहा है। विश्वबंधुत्व की भावना लेकर चलने वाले गांधी पर भारतीय चिंतकों और ग्रंथों का पूर्ण प्रभाव पड़ा है। बुद्ध की करूणा, महावीर की दया, भारतीय स्रोतों की ही उपज है। गांधी का धर्म व्यवहार की कसौटी सत्य की परीक्षा का फल है। भारत में ही नहीं विश्व में गांधी का मान-सम्मान, यश फैला हुआ है। गांधी पर जॉन रस्किन की पुस्तक अनटू दिस लास्ट का प्रभाव देखा जाता है।भारतीय दर्शन में सर्वप्राणियों और जीवों को एक समान समझा जाता है। यही कारण है कि गांधी आखिर क्यों आज भी जीवन दृष्टि विश्व को दे रहे हैं। क्यों हर समस्या के समाधान के लिए गांधी को पढ़ना पड़ता है, पुस्तकें खोजनी पड़ती है। आखिर गांधी वक्त बेवक्त क्यों याद आते हैं? गांधी आखिर रामबाण क्यों बन गए है? गांधी पर आज भारत ही नहीं विश्व इतना विश्वास करता है इसका कारण स्पष्ट है कि गांधी एक व्यक्ति का नाम नहीं, गांधी एक व्यक्तिवाचक, जातिवाचक संज्ञा ना रहकर वह भाववाचक संज्ञा बन गई है, दार्शनिकता का पर्याय बन गई है। यह दार्शनिकता केवल चार पृष्ठ पलटने से नहीं आती है, पूरा जीवन होम करने पर आती है।

यही कारण है कि गांधी को राजनीति के गलियारों से ऊपर उठकर पढ़ना होगा। राजनीति करना उनका उद्देश्य नहीं था। तत्कालीन भारत और साउथ अफ्रीका में फैले बैर भाव अस्पृश्यता को दूर कर मनुष्य को मनुष्य से प्रेम करना सिखाना था। उन्होंने वैसा किया भी। आज विश्व का हर बड़ा नेता, चिंतक गांधी दर्शन की बात करता ही नहीं है अपितु उनका मुरीद बन गया है। प्रवास के समय लोगों से भारत और राष्ट्रपिता गांधी की बात करने से स्वयं को गौरवान्वित ही नहीं महसूस करता हूँ अपितु उस ऋषियों-मुनियों की पावन धरती, तपोवन भूमि को याद करता हूँ जहाँ गांधी का जन्म हुआ। गांधी दर्शन एक ऐसी विचारधारा है जो हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाकर विश्वबंधुत्व का पाठ पढ़ाती है।

लेखक वार्सा यूनिवर्सिटी, वार्सा पोलैंड में आई.सी.सी.आर. चेयर हिंदी हैं.
संपर्क: +48579125129

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