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वर्तमान संकट काल में प्रासंगिक होता गांधीजी का आर्थिक दर्शन

वर्तमान संकट काल में प्रासंगिक होता गांधीजी का आर्थिक दर्शन
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डॉ॰ स्वतंत्र रिछारिया

सत्रहवीं सदी में न्यूटन द्वारा क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम प्रतिपादित किया गया था, विज्ञान का यह नियम कभी-कभी समाज की प्रक्रियाओं एवं वैचारकी को भी समझने में सहायता कर सकता है। न्यूटन के इस सिद्धांत के अनुसार कह सकते हैं, हम जिस विचार या दर्शन को समाज में जितना अप्रासंगिक मानने लगते हैं या कहें कि उसे समाज हेतु अनुपयोगी मानते हैं, वह वास्तविकता में उतना ही प्रासंगिक, उपयोगी और अपरिहार्य हो जाता है।

पिछले कुछ दशकोंकी सामाजिक समस्याओं को अध्ययन करते हुए विश्लेषण करने पर हम जान सकते हैं कि जबभी भारत या कहें विश्व के सामने कोई भी बड़ी सामाजिक, आर्थिक या राजनैतिक समस्या उत्पन्न होती है, तो उनके समाधान हेतु गांधी-दर्शन तुरंत ही सबसेज्यादा प्रासंगिक होते हुए सबसे कारगर और सही उपाय नजर आने लगता है। किन्तु जैसे ही समस्या कुछ कम होती है या समाजउससे अनुकूलन कर लेता है तो हम फिर स्थायी समाधान हेतु गांधी के विचारों को भूलकरपुनः अस्थायी विकल्पों और अयथार्थ समाधानों को अपना लेते हैं।

आजादी के पश्चात भारत में गांधीजी के समाज दर्शन और विचारों को बड़ी तीव्र गति से भुलाया गया या फिर तेजी से भागते आधुनिक और विज्ञानवादी युग में अप्रासंगिक मानकर सिर्फ बौद्धिक चर्चाओं और कालेजों के पुस्तकालयों और गांधी जयंती पर औपचारिकता बस गांधी के गुणगान तक सीमित कर दिया। लेकिन वास्तविकता यह है कि यदि हम ध्यान से समाज की आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं एवं उनके कारणों को समझते हुए विश्लेषित करने का प्रयास करें, तब हमें इन समस्याओं के कारण और उनके स्थायी समाधान सिर्फ अप्रासंगिक मान लिए गए गांधी-दर्शन में ही मिलते हैं।

गांधी एक ऐसे चिंतक और कर्मयोगी थे, जिनका उद्देश्य सिर्फ भारत की राजनैतिक आजादीनहीं वरन समता, न्याय और अहिंसापर आधारित एक नए भारत का निर्माण करना था। इसलिए समय-समय पर राजनैतिक आंदोलनों के साथ वे सामाजिकपुनर्निर्माण हेतु विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों, सामाजिक आंदोलनों को भी संचालित करते रहते थे, ताकि समाज की सभी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समस्याओं का एक स्थायी हलखोजा जा सके।

गांधी जी ने कुछदशक पूर्व पूंजीवाद, नगरीकरण, अनियंत्रित आधुनिकता आदि से भविष्य में होनेवाली समस्याओं हेतु अपने विचारों से सचेत किया था, उनकी वे सभी वैचारिक भविष्यवाणी आज अनेक चुनौती के रूप मेंहमारे सामने सुरसा रूपी मुंह खोले खड़ी हैं। गांधीजी अनियंत्रित औद्योगीकरण के मुखरविरोधी थे, उनका मानना था औद्योगीकरणसिर्फ एक समस्या नहीं बल्कि अनेक गंभीर समस्याओं की जननी है।

आजादी के बादभारत में तीव्रगति से औद्योगीकरण प्रारम्भ हुआ, इस औद्योगीकरण के फलस्वरूप अबाध और अव्यवस्थित नगरीकरण की प्रक्रिया शुरू होगयी। औद्योगीकरण के दुष्परिणामों की व्याख्या करते हुये वह कहते थे कि सिर्फ लाभ केदृष्टिकोण से बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से ही अनेक प्रकार के आर्थिक और सामाजिकदोष उत्पन्न हुए हैं।

गांधी के विचारोंसे असहमति रखने वाले लोग कहते हैं कि नगरीकरण और औद्योगीकरण व्यक्ति एवं समाज कोआर्थिक प्रगति के अवसर उपलब्ध करता है, इसलिए यह दोनों आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य भी हैं। लेकिन नगरीकरण औरऔद्योगीकरण का वास्तविक मूल्यांकन करें, तो इसके सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक पक्ष देखने को मिल जाएँगे शहरों की गरीबी, आजीविका एवं जीवनजीने की स्थिति आज गांवों से ज्यादा भयाभय है। क्योंकि शहर में क्रय शक्ति की तुलना में खर्चा ज्यादा होता है। शहरों मेंगरीब और मजदूरों की बस्तियों का वातावरण एवं रहने की परिस्थितियाँ गाँव की तुलनामें ज्यादा खराब और अमानवीय है।

कोरोना त्रासदी में एक नजारा पूरे भारत में सामान्य रूप से देखने को मिल रहा है, सभी शहरों से निकलने वाले राजमार्ग श्रमिकों की बदहाल स्थिति की मार्मिक और दर्दनाक कहानी बया कर रहे हैं। शहरों से गांवों में होने वाले यह अभूतपूर्व पलायन मानों यह कह रहे हैं कि नगरीकरण और औद्योगीकरण ने अवसर नहीं बल्कि गरीब-अमीर की खाई को और चौड़ा किया है। श्रमिकों के फटे पाँव, सूखता गला और पेट की आग और रोज होने वाली मौतें यह दर्शा रही हैं कि गरीब और अमीर के बीच का आर्थिक और सामाजिक अंतर विकराल रूप से बड़ा हो चुका है, जिसके आने वाले समय में भी खत्म होने की संभावना सामाजिक और राजनैतिक रूप से नहीं लगती है।

नगरीकरण औरऔद्योगीकरण ने आजीविका के कितने अवसर उत्पन्न किए और उनके फलस्वरूप कितने प्रवासीमजदूरों, कामगारों का जीवन विकसितऔर खुशहाल हुआ, इसको ज्ञात करनाबड़ा ही दुरूह कार्य है और जिसका पता लगाना भी मुमकिन नहीं लगता है। किन्तु नगरीकरणऔर औद्योगीकरण ने जिस विकराल रूप से असमानता, शोषण, गरीबी, स्वास्थ्य समस्याओं, पर्यावरण प्रदूषण को उत्पन्न किया है, उसके जीवंत प्रमाण हम सब के सामने हैं।

वर्ष 2017 में अंतर्राष्ट्रीय समूह 'ऑक्सफेम' ने भारत में आय में असमानता की चिंताजनक तस्वीर पेश की है। सर्वे केअनुसार भारत में साल 2017 में कुल संपत्ति के सृजन का 73 प्रतिशत हिस्सा केवल एक प्रतिशत अमीर लोगों के हाथों में है। अर्थात तमामविकास, समानता और न्यायकी बातों के बाद भी भारत में सबसे अमीर 1% लोगों के पास भारत की 73% संपत्ति मौजूद है और शेष मजदूर, किसान अपनी दो जून की रोटी को जुटाने में ही जीवन भरसंघर्षरत रहता है। इस कोरोना संकट में भी मजदूर और उनकी आर्थिक, सामाजिक हैसियत का यथार्थ पक्ष उजागर हुआ है,जो अत्यंत कष्टप्रद है।

गांधीजी पूंजीवादके विरोधी थे। उनका कहना था कि “इस पृथ्वी परमानव की आवश्यकतानुसार प्रचुर मात्रा में संसाधन उपलब्ध है, परंतु मानव की लालसा के अनुरूप संसाधन नहीं हैं”। अगर मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार वस्तुओंका उपयोग करे तो कोई भी इस दुनिया में भूखा नहीं मरेगा।

पूरे विश्व मेंकोरोना महामारी ने हाहाकार मचा रखा है, और अभी पता नहीं कब यह भयंकर त्रासदी हालात को सामान्य होने देगी। लेकिन जैसेही कोरोना से समाज कुछ राहत महसूस कर रहा होगा, उसके तुरंत बाद ही भारत सहित पूरा विश्व एक बड़े आर्थिक संकटका सामना करेगा। बेरोजगारी, पूंजी की कमी,गरीबी और उसके फलस्वरूप अन्य समस्याएँ, वर्तमान की तुलना में आने वाले समय में कहीं अधिक गंभीर रूप में समाज और सरकार के सामनेमौजूद होंगी। अब इस संकट में यक्ष प्रश्न यह है कि इस आने वाले आर्थिक संकट सेकैसे बचा जाए।

कुछ दशक पूर्वगांधी द्वारा बताया गया विकास का आर्थिक दर्शन ही इस गंभीर आर्थिक संकट से लड़नेमें प्रभावी रूप से मदद कर सकता है। गांधीजी गाँवों को भारत की आत्मा कहते थे,उनके अनुसार वास्तविकभारत इसके गांवों में बसता है। यदि हम भारत को विकसित और समृद्ध करना चाहते हैं,तो हमें भारत के गाँवोंको आत्मनिर्भर और खुशहाल बनाना होगा। भारत एक बड़ी जनसंख्या वाला देश है, इसलिए यहाँ वे आर्थिक नीतियां और व्यावसायिक गतिविधियां ज्यादा प्रभावी नहींहो सकती जो कम जनसंख्या वाले देशों में उपयोगी हैं।

भारत को आवश्यकता है ऐसी विकेंद्रीकृत उत्पादन प्रणाली की जिसमें उत्पादन कार्य मैनुयल अर्थात हाथों से ज्यादा हो, बड़ी-बड़ी मशीनों और तकनीकी का प्रयोग सिर्फ अति आवश्यक और अपरिहार्य स्थिति में ही हो, अगर हम ज्यादा कंप्यूटीकृत तकनीकी और तेज मशीनों का अत्यधिक प्रयोग करेंगे तो उतने ही मानव हाथ बेरोजगार हो जायेंगे। बेरोजगारी के साथ उच्च तकनीकी और मशीनों पर आधारित उत्पादन प्रणाली से साथ उत्पादित वस्तु की विक्री हेतु बाजार की उपलब्धता संबंधी डर भी सदैव साथ रहता है, क्योंकि इस उत्पादन प्रणाली में उत्पादित माल की मांग में कमी होने से तुरंत ही आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव हो जाता है।

भारत और राज्यसरकारों को इस आर्थिक संकट काल में तुरंत आवश्यकता है गांधी जी के ग्राम स्वराजसंबंधी सिद्धांत पर आधारित कुटीर और लघु उद्योगों को अविलंब प्रोत्साहित करने की।सिर्फ यह संकटकाल ही नहीं यदि हम भारत की विकराल होती बेरोजगारी और गरीबी कोसमाप्त करना चाहते हैं, तो कुटीर और लघुउद्योग ही भारत का संतुलित आर्थिक भविष्य तय कर सकते हैं।

वर्तमान मेंऊर्जावान युवा लोगों को उचित प्रबंधकीय और अपेक्षित कौशल प्रशिक्षण, मार्गदर्शन प्रदान कर उद्यमिता विशेषकर सामाजिकउद्यमिता की ओर प्रोत्साहित कर सकते हैं। इससे शहरों से गाँव में पहुंचे हजारोंश्रमिकों को रोजगार भी उपलब्ध हो सकेगा, और भारतीय अर्थव्यवस्था में गतिशीलता भी बनी रहेगी। कंपनियों को भी अपनीव्यावसायिक रणनीतियों में परिवर्तन करते हुये ऐसे विकल्प तलाशने होंगे, जिनसे उनकी आर्थिक गतिविधियों को छोटे यूनिटों के रूप में कस्बा या छोटेशहरों से संचालित किया जा सके। क्योंकि शहरों से गांवों की तरफ हो चुके इस बड़े श्रमिक पलायन के बाद अगले कुछमहीनों या एक वर्ष तक श्रमिकों के पुनः लौटने की संभावना कम ही लगती है।

गांधी जी केग्राम पुनर्गठन और पुनर्निर्माण संबंधी विचार को धरातल पर फलीभूत करने हेतु यहसबसे सही समय है। यदि गांधी दर्शन पर आधारित ग्राम-केन्द्रित अर्थव्यवस्था का 50 प्रतिशत क्रियान्वयन भी हम कर पाए, तब हम इसके वास्तविक दूरगामी परिणामों को देखपाएंगे, जो गांधी जी द्वारा बताए गएथे।

सरकार द्वारा संचालित विभिन्न ग्रामीण विकास एवं आजीविका संबंधी योजनाएँ विशेषरूप से इस आर्थिक संकट से उबरने में सहायक हो सकती हैं। उदाहरण के लिए मनरेगा एक महत्वपूर्ण और बहुउद्देशीय कार्यक्रम हैं, जो ग्रामीण लोगों को रोजगार प्राप्ति की गारंटी देता है, इस योजना में मुख्य रूप से सिविल निर्माण कार्यों में रोजगार उपलब्ध होता है।

मनरेगा के नियमों और कार्यक्षेत्र का विस्तार करते हुए, ग्रामीण स्तर पर स्थापित एवं संचालित लघु और कुटीर उद्योगों को अपेक्षित लेबर कार्य मनरेगा से उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे नए व्यवसायियों के उद्यम में लगने वाला लेबर कॉस्ट बचेगा, जिससे उत्पादन मूल्य घटेगा और बनने वाली वस्तु के मूल्य स्वतः ही कम हो जाएंगे।

सरकारों को ऐसे लघु और कुटीर उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन देना चाहिए जो ग्रामीण स्तर पर स्थापित एवं संचालित हों एवं 5 से 10 लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा हो। यह आर्थिक प्रोत्साहन बिना ब्याज के ऋण और 50 से 80 प्रतिशत की सब्सिडी द्वारा दिया जा सकता है। हम सभी जानते हैं आने वाले समय में रोजगार की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनने जा रही है, यदि हम भारत की युवा कार्यशील विशाल आबादी के हाथों में रोजगार देना चाहते हैं, तो लघु और कुटीर उद्योग ही भविष्य की सुदृढ़ और समृद्ध अर्थव्यवस्था का भविष्य हो सकते हैं।

विभिन्नअर्थशास्त्रीय शोध लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि सिर्फ जीडीपी का बढ़ना विकास का सही पैमाना नहींहोता है। प्रो. अमर्त्य सेन ने भी विकास को परिभाषित करते हुए कहा है कि सिर्फजीडीपी ग्रोथ से समाज में समग्र विकास नहीं आ सकता, समग्र विकास के लिए संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण एवंउपलब्ध संसाधनों से विकास की प्रक्रिया मेंसम्मिलित सभी हितधारकों का सशक्त होना भी जरूरी है, तभी हम विकास को न्यायोचित ठहरा सकते हैं।

इसलिए अब समय आ गया है कि विभिन्न राज्य एवं केंद्र सरकार गांधी-दर्शन एवं उनके आर्थिक विचारों को अपने कार्यक्रमों और योजनाओं में सम्मीलित करके आर्थिक गतिविधियों को संचालित करें, ताकि विकास सिर्फ शहरों और कुछ लोगों तक सीमित ना रह जाए, बल्कि विकास और संसाधनों का न्यायोचित वितरण भी समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक हो पाए। गांधीजी के विचारों में समाज के छोर पर अंतिम व्यक्ति तक विकास और संसाधनों की पहुँच ही लोकतन्त्र, न्याय और विकास का सही सूचक है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं, इससे उदय सर्वोदय का सहमत अथवा असहमत होना जरूरी नहीं है)

Updated : 20 May 2020 4:53 AM GMT
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