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तुमने ना गिना तो क्या मौत ना हुई?

तुमने ना गिना तो क्या मौत ना हुई?
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रईस अहमद लाली

लॉकडाउन के दौरानप्रवासी मजदूरों की मौत को लेकर संसद में दिया गया सरकार का बयान हैरान करने वालाहै। सरकार कहती है कि उसके पास ऐसा कोई डेटा नहीं, जो बताता हो कि लॉकडाउन के दौरान कितने प्रवासी मजदूरों कोअपनी जान गंवानी पड़ी। और यह कि जब डेटा ही नहीं, तो उन्हें मुआवजा देने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता।

सही कहते हैंसरकार, आपके पास ऐसा डेटा हो भीक्यों? आखिर मजदूर, और खासकर प्रवासी मजदूर आपके किस काम के हैं?उन्हें वोटर जो नहीं माना जाता, क्योंकि वे तो ज़िंदा रहने के लिए अपना घर-बार छोड़कर जीनेका सामान जुटाने कहीं दूर अपनी हड्डियां गलाने चले जाते हैं। जहां वे काम करनेजाते हैं, वहां वोटर लिस्ट में तोअमूमन उनका नाम होता नहीं और जहां उनका नाम वोटर लिस्ट में दर्ज़ होता है यानी उनकागृह प्रदेश, वहां अपनीमजबूरियों की वजह से शायद ही वे वोट देने जा पाते हैं। यह आपको भी पता है सरकार।

अब जब अधिकांशप्रवासी मजदूर चुनाव में वोट ही नहीं कर पाते, तो वे भला आपकी प्राथमिकताओं में क्यों होंगे? क्यों आप उनकी मौतों का आंकड़ा जुटाने मेंदिलचस्पी रखेंगे? और जब आंकड़ा हीनहीं होगा, तो आपको मुआवजा देने सेपल्ला झाड़ने में भी कोई दिक्कत नहीं आयेगी। हक़ीक़त तो यह है कि ये मजदूर आपके लिएकीड़े-मकोड़े हैं, जिनकी न तोज़िंदगी की कोई कीमत है और न ही मौत की। तभी तो आप कहते हैं कि आपके पास इन मजदूरोंकी मौत का आंकड़ा नहीं है, और जब आंकड़ा हीनहीं तो मुआवजा देने का सवाल ही कहां पैदा होता है।

पर याद रखियेसरकार, सवाल पैदा होता है। कईदूसरे ऐसे सवाल जो आपके लिए शुभ नहीं। आपकी संवेदनशीलता की पोल खोलते हैं। आपनेखुद संसद में स्वीकार किया है कि लॉकडाउन के दौरान देशभर में कुल 1 करोड़ 4 लाख 66 हज़ार 152 प्रवासी मजदूरों ने घर-वापसी की है। यह ग़ज़ब कीबेशर्मी नहीं तो क्या है कि आपके पास देशभर के कोने-कोने से अपने घर लौटे प्रवासीमजदूरों का तो आंकड़ा है, लेकिन उनकी मौतोंका हिसाब-क़िताब नहीं!

सुना होगा आपनेसरकार कि ग़रीब-मजलूमों की हाय लगती है। कहीं ऐसा न हो कि बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे सूबों, जहां आने वाले समय में चुनाव होने हैं, वहां आपको इनकी हाय लग जाए! ये आपकाहिसाब-क़िताब न खराब कर दें! यह तो आपको भी मालूम है कि घर वापसी करने वाले प्रवासीमजदूरों में सर्वाधिक मजदूर बिहार और उत्तर प्रदेश के ही हैं।

न यह देश भूला हैऔर न वे पीड़ित प्रवासी मजदूर, जिन्हें अचानकहुए लॉकडाउन के बाद न सिर्फ़ रोजी-रोटी से हाथ धोना पड़ा है बल्कि बेशुमार मुसीबतोंका सामना करना पड़ा, करना पड़ रहा है।भूखे-प्यासे, नंगे पांव अपनेघर-परिवार के साथ मौसम की हर मार झेलते हुए इन्हें हज़ारों हजार किलोमीटर पैदल चलनापड़ा है। कइयों ने इस सफर में अपने प्राण त्याग दिये। कोई रेल की पटरियों पर मारागया, कोई सड़क पर। सरकारों केपास यह गिनती तो बहुत पहले आ गयी थी कि उसने कितने मजदूरों को खाना खिलाया,कितने के खाते में पैसे डाले मगर क्या उससेमजदूरों की मौत की गिनती नहीं हो पायी?

लॉकडाउन केदरम्यान मजदूरों का वह ऐतिहासिक पलायन अभूतपूर्व और ह्रदयविदारक था, जिसे शायद ही भुलाया जा सकता है। और जो भूलनेकी हिमाकत कर रहे हैं, वे याद रखें किइसका अंजाम उनके लिए कतई अच्छा नहीं होगा।

जहां तक मजदूरोंकी मौत के आंकड़े का सवाल है, कई सारीग़ैर-सरकारी एजेंसियों, स्वयंसेवी संस्थाओं,मीडिया प्रतिष्ठानों ने समय-समय पर इसका आंकड़ासामने रखा है। उनमें अंतर हो सकता है पर सभी ने यह माना है कि बड़ी तादाद में मजदूरमारे गये थे लॉकडाउन के दौरान। और लॉकडाउन के बाद भी उनकी स्थिति कोई बहुत सुधरीनहीं है। दाने-दाने को मोहताज हैं वे। मर रहे हैं। आत्महत्याएं कर रहे हैं। हज़ारोंमें होंगे मरने वाले। माइग्रेंट वर्कर्स सॉलिडीरिटी नेटवर्क नामक समूह ने सिर्फ़अप्रैल, मई और जून के तीन महीनोंमें 971 प्रवासी मजदूरों की मौतकी बात कही है। सेव लाइफ फाउंडेशन ने इसी दरम्यान केवल दुर्घटनाओं में 198 प्रवासी मजदूरों की मौत हुई बताई है।

कई मीडियारिपोर्टों की बुनियाद पर बीबीसी ने भी उन तीन महीनों में 300 से ज्यादा प्रवासी मजदूरोंके मारे जाने की बात कही है। और फिर भी आश्चर्यजनक है कि जो आंकड़े सबको मालूम हैं,वो सरकार को नहीं मालूम। विपक्ष के सवालों केजवाब में वह कह रही है कि उसके पास न तो ऐसा कोई डेटा है और न ही मुआवजा देने काकोई सवाल पैदा होता है।

सच कहते हैंसरकार, ये मजदूर अंबानी-अडानीथोड़े हैं जो आपको इनकी फ़िक्र होगी! ऐसे में विपक्षी नेता राहुल गांधी ने जो कहा,क्या ग़लत कहा?

तुमने ना गिना तो क्या मौत ना हुई?
हां मगर दुख है सरकार पे असर ना हुई,
उनका मरना देखा ज़माने ने,
एक मोदी सरकार है जिसे ख़बर ना हुई।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Updated : 16 Sep 2020 5:07 AM GMT
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