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हाय! हिंदी; हमारी हिंदी

हाय! हिंदी; हमारी हिंदी
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हिंदी दिवस विशेष ¦ प्रेमकुमार मणि इस हिंदी दिवस पर हमें इन तमाम बिंदुओं पर विमर्श करना चाहिए. हमें अंग्रेजी विरोधी अभियान की भी समीक्षा करनी चाहिए. हम यदि यह सोचते हैं कि किसी जुबान का विरोध कर ही हम अपनी जुबान का विकास कर सकते हैं, तब यह शायद सही नहीं है. अंग्रेजी, उर्दू या किसी भी भाषा का हम विरोध न कर अपनी जुबान को संवारने की चिंता करें तो ज्यादा सही होगा.


14 सितंबर आते ही बहुतों को हिंदी की याद आती है. यह हिंदी दिवस होता है. जैसे गोरैया दिवस या पर्यावरण दिवस. जो चीज खतरे या मुश्किल में पड़ जाती है, उसके लिए दिवस तय किए जाते हैं. अंग्रेजी के लिए कोई दिवस नहीं होता. अंग्रेजी की बारहों महीने जय-जय है. हिंदी के लिए 14 सितंबर जय-जय का होता है. कुछ महकमे हिंदी पखवाड़ा मनाते हैं, पितरपख अथवा पितृपक्ष की तरह.हिंदी दिवस के आयोजन हाल के वर्षों में भव्य से भव्यतर हुए जा रहे हैं. इसे देख मुझे थोड़ा गुस्सा आता है. आयोजन की भव्यता और कुछ नहीं, हमारी जुबान की दुर्दशा बयां करती है. मुझे भय है, भविष्य में ये आयोजन अधिक भव्य होंगे. कारण बतलाने की जरूरत नहीं समझता.हर दिवस की तरह हिंदी दिवस का भी इतिहास है और इस पर एक नजर डालना बुरा नहीं होगा. 14 सितंबर 1949 को भारत की संविधान सभा ने तय किया कि भारत की राजभाषा देवनागरी में लिखी हिंदी होगी और अंक होंगे भारतीय अंकों के स्वीकृत अंतर्राष्ट्रीय रूप. संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में इसे दर्ज किया गया. यह संविधान 26 नवंबर 1949 को आत्मसात किया गया और 26 जनवरी 1950 से इसे लागू किया गया. संवैधानिक व्यवस्था थी कि पंद्रह साल तक हिंदी के साथ अंग्रेजी भी रहेगी और तत्पश्चात समीक्षोपरांत केवल हिंदी राज-काज की संपर्क भाषा रहेगी. संविधान की आठवीं अनुसूची में 14 अन्य भारतीय भाषाओं को भी राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया गया.यह सब आजादी के उस उत्साह में हुआ, जो राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत था. अंग्रेजी अन्य देश की भाषा थी और एक आजाद राष्ट्र उसे राजभाषा के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था. भाषा पर संविधान सभा में जो बहसें हुई हैं, उसका अध्ययन दिलचस्प हो सकता है. 13 सितंबर 1949 को जवाहरलाल नेहरू ने कुछ ज्यादा ही इत्मीनान से कहा था- ‘किसी विदेशी भाषा से कोई देश महान नहीं बन सकता; क्योंकि कोई विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती.’संविधान लागू होने के तीन साल बाद 1953 के 14 सितंबर को पहला हिंदी दिवस आयोजित हुआ और फिर तो ये सिलसिला ही लग गया. पांच साल बाद एक समीक्षा होनी थी. अब तक आजादी का उत्साह कम हो गया था. लाजिम था हिंदी का उत्साह भी कम हुआ था. कतरब्योंत की शुरुआत हो गई थी. 8 सितंबर 1956 को नेहरू ने संसद में भाषा के सवाल पर एक भाषण दिया, जिसमें शुरू से आखिर तक अंग्रेजी का महत्त्व बतलाते रहे. सरकार की मंशा स्पष्ट हो गई थी. यही कारण था 1963 आते-आते यह स्पष्ट हो गया कि अंग्रेजी की विदाई 1965 में नहीं होनी है. और नहीं ही हुई. इस बीच नेहरू जी गुजर गए और लाल बहादुर शास्त्री मुल्क के प्रधानमंत्री हो चुके थे.1965 में अंग्रेजी विरोधी की जगह हिंदी विरोधी आंदोलन दक्षिण में शुरू हो गया. आंदोलन का केंद्र तो तमिल भाषी मद्रास प्रांत था, लेकिन मलयाली, तेलगु और कन्नड़ भाषी भी हिंदी से भयभीत थे. हिंदी विरोधी आंदोलन को उत्तर भारत के अधिकतर नेताओं ने अब तक समझने की कोशिश नहीं की है. हिंदी पर अधिक जोर दिया जाता तो राष्ट्र एक बार और टूट सकता था. इसलिए यथास्थिति बनाये रखी गई और दक्षिणावर्त को आश्वस्त किया गया की हिंदी उन पर थोपी नहीं जाएगी. भारतीय जनसंघ और लोहियावादी सोशलिस्टों को छोड़ कर सभी राजनीतिक दल इस पर एकमत थे.तब से अब तक यथास्थिति चल रही है. अंग्रेजी बनी हुई है और उसका प्रभाव बढ़ता जा रहा है. हिंदी के हाल पर टिप्पणी अनावश्यक समझता हूं. लेकिन प्रश्न है यह स्थिति कैसे आयी? क्या हिंदी की स्थिति दक्षिण के राज्यों खास कर तमिल भाषियों के विरोध के कारण हुआ, या कुछ और कारण थे? मैं कहना चाहूंगा, दक्षिण के लोगों को हमने समझने में भूल की. यह हमारी आर्यावर्तीय प्रवृत्ति है कि हम हमेशा अन्य-भाव में जीते और सोचते-विचारते हैं. हम राष्ट्र की बात जरूर करते हैं, लेकिन वह इतना पवित्र और संकुचित होता है कि उसमें हम अपने घर की स्त्रियों को भी शामिल नहीं करना चाहते. हमने अपनी सोच का एक दैवी ढांचा बना लिया है और उसमें स्वयं को कैद कर लिया है. इसी गुलामखाने से हम अपने लिए तमाम तरह के विरुद खुद सृजित कर लिए हैं. अपनी भाषा को भी हमने इन्हीं गुणों से संस्कारित कर रखा है. हिंदी संस्कृत से निकली है और संस्कृत देवताओं की जुबान रही है, यह हमारी मान्यता रही है. नेहरू तक यही मानते रहे कि दक्षिण की चार जुबानों को छोड़कर (आदिवासियों की जुबान का तो कोई जिक्र ही नहीं करता) बाकि सब संस्कृत से नि:सृत हैं. फिर एक जुमला यह भी है कि हिंदी बड़ी बहन है, बाकि छोटी बहनें हैं. इस बड़ी-छोटी की बात संस्कारवश मेरे मुंह से ही एक दफा चेन्नई की एक सभा में आ गई. बड़ा विरोध हुआ. थोड़ी जिल्लत भी झेलनी पड़ी. फिर इस विषय पर मैंने उनके नजरिये को समझा. दक्षिण के लोग हिंदी से या उत्तर भारतीयों से नफरत नहीं करते, न अंग्रेजी के लिए उनके मन में व्यामोह है. वे तो बस अपनी जुबान से प्रेम करते हैं. उनकी जुबान हिंदी ही नहीं, संस्कृत से भी प्राचीन है. उनके काव्य ग्रंथ खूबसूरत और मौलिक हैं. हम उनसे परिचित भी नहीं होना चाहते और चाहते हैं कि हमारी भाषायी गुलामी वे स्वीकार लें. यदि हम उनकी भाषा-संस्कृति से परिचित होने का उत्साह दिखाते, तो वे भी दिखाते. लेकिन हम तो दूसरों से कुछ सीखना नहीं चाहते, दूसरों पर खुद को थोपना चाहते हैं. झगडे की शुरुआत यहीं से होती है. इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी एक बड़े भूभाग की भाषा है. कहा जाता है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा कहकर ही गांधी ने 1918 में अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाई थी. तब तिलक जीवित थे. तिलक हिंदी नहीं जानते थे. गांधी टूटी-फूटी जानते थे और उसी में काम करना शुरू कर चुके थे. गांधी से भी बहुत पहले दयानन्द सरस्वती ने हिंदी में सत्यार्थ प्रकाश लिख कर बतलाने का प्रयास किया था कि भारत में कोई आंदोलन हिंदी के बिना नहीं चल सकता. उससे भी पूर्व भक्ति आंदोलन के कवियों ने इस जुबान को अपनी तरह से संवारा और इस्तेमाल किया था. कबीर, मीरा और रैदास की पांतियां बंगाल से लेकर राजस्थान, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र और हैदराबाद तक गुनगुनाई जाती थीं. वह हिंदी उन्नीसवीं बीसवीं सदी में सिमटने कैसे लगी? इस पर हमने कभी विचार किया है? करना चाहिए.क्या कारण रहा कि हमारी हिंदी जो किसानों और कारीगरों की जुबान थी, बुनकरों, कुम्हारों, दर्जियों, मोचियों की जुबान थी, जो कबीर, रैदास, मीरा, रसखान, तुलसी और सूर जैसे फटेहाल और मेहनतकश लोगों की जुबान थी, वह उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में भारतेन्दु और मिश्र बंधुओं की जुबान बन गई. इन लोगों ने हिंदी की प्रकृति और प्रवृत्ति बदल दी. हिंदी प्रचार ठेंगे पर रख दिया गया. नागरी प्रचारिणी सभाएं बनने लगीं. उद्देश्य स्पष्ट था. जो हिंदी फारसी से लेकर कैथी और गुरुमुखी लिपियों में लिखी जाती थी, आग्रह हुआ कि केवल देवनागरी में लिखी जाए. भारतेन्दु ने हिंदी को उर्दू से काट दिया. हमने खुद को जान-बूझ कर गालिब और मीर से जुदा कर लिया. परवर्तियों ने तो हिंदी को बोलियों से भी दूर कर लिया. हिंदी तत्सम होने लगी. तद्भव, देशज और विदेशज तत्व घटते चले गए. हिंदी पर तत्सम समाज का प्रभाव भी गहराने लगा. जो हिंदी समानता, मानवीयता और करुणा के तत्वों-विचारों से भरी-पड़ी थी, अब वर्चस्ववादी हिंदुत्व का प्रचारक बन कर सिमटने लगी.इस हिंदी दिवस पर हमें इन तमाम बिंदुओं पर विमर्श करना चाहिए. हमें अंग्रेजी विरोधी अ•िायान की भी समीक्षा करनी चाहिए. हम यदि यह सोचते हैं कि किसी जुबान का विरोध कर ही हम अपनी जुबान का विकास कर सकते हैं, तब यह शायद सही नहीं है. अंग्रेजी, उर्दू या किसी भी भाषा का हम विरोध न कर अपनी जुबान को संवारने की चिंता करें तो ज्यादा सही होगा. हिंदी में साहित्यिक कार्य भले कुछ हो जाते हैं, लेकिन इतिहास, राजनीति, समाज शास्त्र, तकनीक और विज्ञान विषयों पर मौलिक कार्य नगण्य हैं. हिंदी पत्रकारिता चाटुकारिता का पर्याय बन कर रह गई है. विदेशी जुबानों से अनुवाद का कार्य भी बहुत कम हो रहा है. ऐसे में हम हिंदी को राजभाषा बनाये रख पाएंगे, इसमें संदेह होने लगा है.14 सितंबर के इस हिंदी दिवस को सरकारी तामझाम और कर्मकांडों की उपेक्षा कर हम एक नई परंपरा का आरंभ कर सकते हैं. इस अवसर पर अन्य भाषा-भाषियों के साथ हम संवाद बनाएं. उन्हें हिंदी सुनाएं-सिखाएं, उनकी जुबान सुनें-सीखें, तभी हमारी हिंदी मजबूत होगी.

Updated : 1 Oct 2018 3:18 PM GMT
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