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खुद को हिन्दी और उर्दू का दोआब मानते थे शमशेर बहादुर सिंह

खुद को हिन्दी और उर्दू का दोआब मानते थे शमशेर बहादुर सिंह
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विराज रंजन

शमशेर बहादुरसिंह आधुनिक हिंदी कविता के प्रगतिशील कवि हैं। वे प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं। उनकी कविताओं मेंजीवन के राग-विराग के साथ-साथ समकालीन सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं का कलात्मकचित्रण हुआ है। भाषा-प्रयोग में चमत्कार उत्पन्न करने वाले वे अत्यंत सजग कवि हैं। आजशमशेर को याद करने की वजह यह है कि आज (12 मई) ही के दिन 1993 में उनका निधन हुआ था।

शमशेर हिंदी तथा उर्दूके विद्वान हैं। वे खुद को हिन्दी और उर्दू का दोआब मानते थे। प्रयोगवाद और नई कविता के कवियों की प्रथमपंक्ति में इनका स्थान है। इनकी शैली अंग्रेज़ी कवि एजरा पाउण्ड से प्रभावित है। शमशेरबहादुर सिंह ने अपने वक्तव्य में एजरा पाउण्ड के प्रभाव को मुक्तकण्ठ से स्वीकारकिया है- टेकनीक में एजरा पाउण्ड शायद मेरा सबसे बड़ा आदर्श बन गया। शमशेर ‘दूसरा सप्तक’ (1951) के कवि हैं। शमशेर ने कविताओं के समान ही चित्रों में भीप्रयोग किये हैं।

शमशेर बहादुरसिंह में अपने बिम्बों, उपमानों औरसंगीतध्वनियों द्वारा चमत्कार और वैचित्र्यपूर्ण आधात् उत्पन्न करने की चेष्टाअवश्य उपलब्ध होती है, पर किसीकेन्द्रगामी विचार-तत्व का उनमें प्रायः अभाव-सा है। अभिव्यक्ति की वक्रता द्वारावर्ण-विग्रह और वर्ण-संधि के आधार पर नयी शब्द-योजना के प्रयोग से चामत्कारिक आघातदेने की प्रवृत्ति इनमें किसी ठोस विचार तत्त्व की अपेक्षा अधिक महत्त्व रखती है।

उनका जन्म देहरादूनमें 13 जनवरी, 1911 को हुआ। उनके पिता का नाम तारीफ सिंह था औरमाँ का नाम परम देवी था। शमशेर जी के भाई तेज बहादुर उनसे दो साल छोटे थे। उनकीमाँ दोनों भाइयों को ‘राम-लक्ष्मण कीजोड़ी’ कहा करती थीं। जब शमशेरबहादुर सिंह आठ या नौ वर्ष के ही थे, तब उनकी माँ की मृत्यु हो गई, किन्तु दोनोंभाइयों की जोड़ी शमशेर की मृत्यु तक बनी रही।

आरंभिक शिक्षादेहरादून में हुई और हाईस्कूल-इंटर की परीक्षा गोंडा से दी। बी.ए. इलाहाबाद सेकिया, किन्हीं कारणों से एम.ए.फाइनल न कर सके। 1935-36 में उकील बंधुओंसे पेंटिंग कला सीखी। ‘रूपाभ’, ‘कहानी’, ‘नया साहित्य’, ‘माया’, ‘नया पथ’,‘मनोहर कहानियां’ आदि में संपादन सहयोग। उर्दू-हिन्दी कोश प्रोजेक्ट मेंसंपादक रहे और विक्रम विश्वविद्यालय के ‘प्रेमचंद सृजनपीठ’ के अध्यक्ष रहे।

शमशेर की कविताएँआधुनिक काव्य-बोध के अधिक निकट हैं, जहाँ पाठक तथा श्रोता के सहयोग की स्थिति को स्वीकार किया जाता है। उनकाबिम्बविधान एकदम जकड़ा हुआ ‘रेडीमेड’ नहीं है। वह ‘सामाजिक’ के आस्वादन कोपूरी छूट देता है। इस दृष्टि से उनमें अमूर्तन की प्रवृत्ति अपने काफ़ी शुद्ध रूपमें दिखाई देती है। उर्दू की गज़ल से प्रभावित होने पर भी उन्होंने काव्य-शिल्प केनवीनतम रूपों को अपनाया है।

उनकी रचनाओं में (काव्य-कृतियां)- ‘कुछ कविताएं’(1956), ‘कुछ और कविताएं’(1961), ‘शमशेर बहादुर सिंह कीकविताएं’ (1972), ‘इतने पास अपने’(1980), ‘उदिता : अभिव्यक्ति कासंघर्ष’ (1980), ‘चुका भी हूं नहीं मैं’(1981), ‘बात बोलेगी’(1981), ‘काल तुझसे होड़ है मेरी’(1988) और ‘शमशेर की ग़ज़लेंप्रमुख हैं।

गद्य में उन्होने ‘दोआब’ निबंध- संग्रह (1948), ‘प्लाट का मोर्चा’कहानियां व स्केच (1952), ‘शमशेर की डायरी’ आदि लिखी हैं।इसके अलावा अनुवाद कार्य भी किया है।

साहित्य अकादमीपुरस्कार से सम्मानित शमशेर बहादुर सिंह प्रयोगवाद और नई कविता के प्रमुख कवियोंमें से एक हैं। आमतौर पर उनकी कविताओं का ही जिक्र ज्यादा होता है। आज पढ़तेहैं शमशेर की एक मकबूल ग़ज़ल-

दिल, मेरी कायनात अकेली है और मैं
बस अब ख़ुदा की जात अकेलीहै, और मैं

तुम झूठ और सपनेका रंगीन फ़र्क थे
तुम क्या, ये एक बात है, और मैं

सब पार उतर गएहैं, अकेला किनारा है
लहरें अकेली रात अकेली है,और मैं

तुम हो भी,और नहीं भी हो- इतने हसीन हो
यह कितनी प्यारी रातअकेली है, और मैं

मेरी तमाम रात कासरमाया एक शमअ
ख़ामोश, बेसबात, अकेली है, और मैं

'शमशेर' किस को ढूँढ़ रहे हो हयात में
बेजान-सी इयात अकेली है,और मैं।

Updated : 12 May 2020 6:18 AM GMT
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