सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कितना उचित?

सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कितना उचित?

निष्पक्ष आकलन ¦ डॉ. राजाराम त्रिपाठी

  • बीएसएनएल एमटीएनएल भी जाएंगी अब निजी हाथों की गिरफ्त में, इनकी दुर्दशा का जिम्मेदार कौन?
  • गजब का गणित? बीएसएनएल एमटीएनएल को पुनर्जीवित करने का खर्चा 75 हजार करोड़, जबकि इन्हें समाप्त करने पर लगेंगे 95 हजार करोड़?
  • 1.16 लाख करोड़ कैप की सरकारी इंडियन ऑयल भी नीलाम होगी कौड़ियों के मोल?
  • 5 से 10 दस गुना फीस लेकर भी निजी संस्थान आईआईटीयंस से बेहतर इंजीनियर क्यों नहीं बना पाते
  • एम्स आज भी है बेजोड़, निजी अस्पतालों की तुलना में आज भी सरकारी अस्पतालों का चेहरा है ज्यादा मानवीय?
  • सरकारें इस मलाईदार गोरखधंधे में इतनी उलझी हैं कि, रसातल की ओर जा रही देश की किसानी तथा किसानों की दुर्दशा की ओर देखने की फुर्सत ही नहीं

आज हम सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के बारे में और इन सरकारी उपक्रमों की वर्तमान तथा दूरगामी उपादेयताओं के बारे में निष्पक्ष तथा तथ्यपरक तरीके से विवेजना कर रहे हैं। कुछ ही महीने पहले हमने सुना कि भारतीय रेलवे की कुछ चुनिंदा रेलों को बेहतर प्रबंधन हेतु निजी हाथों में दिया गया है।  पिछले कुछ महीनों से यह चर्चा भी हवा में तैर रही है कि बीएसएनएल, एमटीएनएल जैसे कई घाटे में चल रहे उपक्रमों को लाभकारी बनाने के लिए इसे निजी हाथों में सौंपा जाएगा। यानी कि सरकार घाटे में चल रहे BSNL और MTNL को बेचने के पक्ष में है। अब बेहद ही हैरतअंगेज जानकारी, गजब का गणित आपसे साझा करना चाहूंगा  कि डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्यूनिकेशंस (DoT) ने बीएसएनएल और एमटीएनएल को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए 74,000 करोड़ रुपए के निवेश का प्रस्ताव दिया था, जिसे वित्त मंत्रालय ने  ठुकरा दिया , और दोनों पीएसयू  कंपनियों को बंद करने की सलाह दी है। जबकि  विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों सरकारी कंपनियों को बंद करने की स्थिति में 95 हजार करोड़ रुपए की लागत आने वाली है। यह लागत इन उपक्रमों के 1.65 लाख कर्मचारियों  रिटायरमेंट प्लान देने के और कंपनी  का कर्ज लौटाने में लगने वाली है। यानी कि इस सरकारी कंपनी को समाप्त करने  में होने वाला खर्च, की तुलना में कंपनी का  इलाज करके पुनर्जीवित करने का कुल खर्चा कम है , बावजूद इसके मरीज को बचाने के बजाय समाप्त करने का निर्णय लिया जा रहा है।और यह क्यों किया जा रहा है या इसी लेख में आगे स्पष्ट हो जाएगा।

दूसरी बानगी देखिए, एक लाख सोलह हजार करोड़ की केप वाले सार्वजनिक उपक्रम  इंडियन ऑयल की नीलामी लगभग तय है, इसके 52% शेयर पर केंद्र का हक था, माना जा रहा है कि यह सार्वजनिक उपक्रम  भी एक खास चहेती निजी कंपनी  के खाते में जाएगा। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि एक समय जिस कंपनी के 1000 पेट्रोल पंप बंद पड़े रहे  हों तथा जिसके 3000 पेट्रोल पंपों के आवेदनको लाइसेंस ही प्रदान नहीं किया गया हो, जिसे कभी ब्लैक लिस्टेड किया गया हो, वही आज इसके अधिग्रहण का सबसे मजबूत, महत्वपूर्ण, व सर्वश्रेष्ठ चहेता उम्मीदवार माना जा रहा है । इधर एनएमडीसी राष्ट्रीय खनिज विकास निगम के हाथों से धीरे-धीरे खदानें सरकती जा रही है ,और वे देश की चुनिंदा चहेती बड़ी कंपनियों के शिकंजे में एक-एक करके जा रही हैं, और यह सब सरकार जनता के हित के नाम पर  डंके की चोट पर कर रही है। यह भी चर्चाएं आम हैं कि बस्तर का एनएमडीसी का लोहे का कारखाना भी निजी हाथों में सुचारू संचालन हेतु दिया जाएगा। अब मैं सबसे पहले  चाहूंगा कि हम आज की तारीख पर देश में कुछ चुनिंदा उपक्रमों के बारे में निष्पक्ष ढंग से विचार करें। आप देखेंगे और पाएंगे  कि, आज की तारीख पर देश का सबसे अच्छे अस्पताल का नाम मेदांता, इस्कार्ट अथवा कोई प्राइवेट अस्पताल नहीं है बल्कि  एम्स है जो सरकारी हैं , निजी क्षेत्रों के ज्यादातर अस्पताल अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं, लूट-खसोट के केंद्र बन गए हैं।

सबसे अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेजों की लिस्ट उठाएं तो आप पाएंगे कि सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग के संस्थानों में ज्यादातर आईआईटी हैं, जो कि सरकारी हैं , 7 अंकों में डोनेशन लेकर तथा आईआईटी से चार से 10 गुना तक ज्यादा फीस लेने के बावजूद यह निजी कालेज आईआईटीयंस से बेहतर इंजीनियर नहीं गढ़ पा रहे हैं। यही हाल व्यावसायिक शिक्षा के अन्य क्षेत्रों का भी है,  यथा आज भी सबसे अच्छे मैनेजमेंट कॉलेज  आईआईएम माने जाते हैं, जो कि सरकारी हैं ,देश के सबसे अच्छे विद्यालय आज भी  केन्द्रीय विद्यालय हैं, जो सरकारी हैं ।देश के एक करोड़ लोग सदैव अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए सरकारी रेलों में बैठते हैं…,, अंतरिक्ष विज्ञान में नासा को टक्कर देने वाला संस्थान किसी निजी कंपनी   का नहीं है , बल्कि आईएसआरओ है, जिसे सरकार  चलाती है।

तो हमारा मानना है कि  सरकारी संस्थाओं में खामियां हो सकती हैं, जिन्हें समुचित प्रबंधन तथा अनुशासन के जरिए ठीक किया जा सकता है। किंतु विडंबना है,  इन्हें ठीक करने के ठोस प्रयास करने के बजाय इन्हें सप्रयास योजनाबद्ध तरीके से बदनाम किया जा रहा है , अगर इन सारे उपक्रमों को  प्राइवेट हाथों में सौंप दिया जाए तो तात्कालिक तौर पर भले हमें ऐसा प्रतीत हो कि, निजी करण से इन संस्थाओं में आमूलचूल परिवर्तन तथा सुधार आ जाएगा, पर हकीकत तो यही है कि, यह मृग मरीचिका मात्र है, अंततः  ये उपक्रम  सिर्फ़ लूट खसोट का अड्डा बन जाएँगे। इस तरह किए जा रहे निजीकरण को दरअसल एक व्यवस्था नहीं , बल्कि नव रियासतीकरण  माना जा सकता है। ध्यान रहे कि, सरकारी जनता की कीमत पर लाभ कमाने के लिए नहीं चुनी जाती,और समाज में हर कार्य केवल लाभ कमाने के लिए नहीं किया जाता। अगर हर काम में मात्र लाभकेन्द्रित  सियासत होगी तो आम जनता का क्या होगा। कुछ दिन बाद नवरियासतीकरण वाले यही लोग कहेगें कि देश के उद्यानों, खेलकूद के मैदानों, स्टेडियम, वाचनालय ओं बाल गृहों,  सरकारी स्कूलों, कालेजों, अस्पतालों से कोई लाभ नहीं है अत: इनको भी या तो बंद कर दिया जाए अथवा निजी हाथों में दे दिया जाय तो जनता का क्या होगा।

अब हम एक नजर डालें प्राइवेट स्कूलों में डोनेशन, भारी फीस , हॉस्टल ड्रेस पुस्तक कापी, आदि के नाम पर हो रही भारी लूट के पर और एक बार हम प्राइवेट अस्पतालों में जांच तथ इलाज के नाम पर हो रही धांधली तथा अमानवीय लूट के बारे में भी सोचे जहां की संवेदनहीनता का आलम यह है कि जब तक भारी फीस का एक-एक पैसा वसूल नहीं कर लिया जाता तब तक मरे हुए मरीज के लाश को भी परिजनों को नहीं दिया जाता बल्कि लाश को बंधक बनाकर भी पैसे वसूले जाते हैं। अब अगर देश की आम जनता प्राइवेट स्कूलों और हास्पिटलों के लूटतंत्र से संतुष्ट है, और रेलवे, बैंकों एंव अन्य सरकारी संस्थाओं को भी निजी हाथों में जाने का स्वागत करें। हमने बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए सरकार बनाई है न कि इन अनमोल  सरकारी संपत्तियों को मुनाफाखोरों को बेचने के लिए। अगर प्रबंधन सही नहीं तो सरकार प्रबंधन को सख्ती के साथ सही करे, यह सरकार की जिम्मेदारी है। इन समस्याओं से मुंह मोड़ने और जिम्मेदारियों से भागने से  काम नही चलेगा।

हमें यह समझना होगा की यह घटनाक्रम दरअसल सोची समझी साजिश के हिस्से हैं, कि पहले सरकारी संस्थानों को ठीक से काम न करने दो, फिर इनके वित्तीय खातों तथा कुप्रबंधन को लेकर इन्हें लगातार बदनाम करो,  जिससे निजीकरण करने पर कोई  बोल ना पाए , फिर धीरे से अपने चहेते आकाओं को बेच दो। जिन्होंने चुनाव के भारी भरकम खर्च की फंडिंग की है। इसलिए कि शुरुआत में जो हमने बीएसएनएल, एमटीएनएल के निजीकरण की चर्चा की है इस संदर्भ में में एक विशेष तथ्य रेखांकित करना चाहूंगा वह यह है कि वर्तमान में इस संस्था के कार्यालय पूरे देश में राजधानियों, हर जिला मुख्यालयों सहित हर छोटी-छोटी जगहों पर भी मौजूद हैं, आज इनकी कार्यालय सरकारी जमीनों पर इन शहरों की प्रमुख व्यावसायिक जगहों पर है और यह जमीने आज की तारीख में अकूत खजाने में बदल गई हैं। बीएसएनएल, एमटीएनएल की इन सभी जमीनों का मूल्य यदि निष्पक्ष रुप से आकलित किया जाए तो आप यकीन करिए इस राशि से इन निजी समूची कंपनियों को  खरीदा जा सकता है, जो की व्यवस्था सुधारने के नाम पर बीएसएनएल, एमटीएनएल के अधिग्रहण करने में सरकार के सहयोग और प्रयासों से लगी हुई है, और निश्चित रूप से सफल भी हो जाएंगी। यह ढर्रा अगर आगे भी जारी रहा तो आप  ताम्रपत्र पर लिख लीजिए , आज नहीं तो कल,,, जल्द ही, सरकारी  पोस्ट ऑफिसों का भी निजी करण होना तय है और उसकी जमीन जमीने तो और भी अधिक फायदे देने का सौदा साबित होने वाली है। दरअसल यह तो  सरकारी खजाने की ऐलानिया लूट है, और यह भी ध्यान रखें यह खजाना सरकार का नहीं है जनता का है।

याद रखिये पार्टी फण्ड में गरीब मज़दूर, किसान पैसा नही देता। पूंजीपति देते हैं। और ये पूंजीपति यह भारी भरकम राशि दान में नहीं देता, वह भली-भांति सोच समझकर और इन राजनीतिज्ञों से बाकायदा सौदा करके, निवेश करता है। और चुनाव के बाद मुनाफे की फसल काटता है। ध्यान रखिए किसी सरकारी संस्था में अव्यवस्था अनुशासनहीनता अथवा अलाभकारी होने का इलाज निजी करण मात्र नहीं है, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है। उचित नेतृत्व, कुशल प्रबंधन सकारात्मक नीतियों के क्रियान्वयन के ठोस प्रयासों के जरिए इन संस्थानों को समुचित तरीके से चलाया जा सकता है तथा इससे पूरे देश को लाभ मिलेगा। क्या ध्यान रखें यह कोई असंभव कार्य नहीं है ऐसे सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं जब इस तरह के छोटे बड़े सरकारी उपक्रमों को कुशल प्रबंधन तंत्र, समुचित वित्तीय सहायता व समुचित दूरगामी नीति के जरिए घाटे के गर्भ से निकाल कर फिर से लाभकारी तथा जनहितकारी बनाया गया है। सबसे बुरा हाल तो इस देश में देश की कृषि व्यवस्था तथा किसानों की है। सरकार का किसानों की भूमि कारपोरेट घरानों  को देने के लिए निरंकुश भूमि अधिग्रहण का कानून आ ही गया था, वह तो भला हो कि, सही समय पर कुछ किसान संगठन चेत गए, और किसानों की नाराजगी को देखते हुए सरकार ने कदम वापस खींच लिये, वरना देश के किसानों की बहुमूल्य जमीनें कंपनियों के साथ हो जाते देर न लगती। आज की खतरा टला नहीं है बड़ी सी होशियारी से केंद्र ने भूमि अधिग्रहण के मुद्दे को राज्यों के पाले में ढकेल दिया है और राज्यों के स्तर पर इसमें भी सरकारों को मनमानी की पूरी छूट है।

दरअसल सरकारें इस मलाईदार गोरखधंधे में इतनी ज्यादा उलझी हुई हैं कि, रसातल की ओर जा रही  देश की किसानी तथा किसानों की दशा दुर्दशा की ओर देखने समझने तथा इसे सुधारने की इमानदारी से कोशिश करने की फुर्सत ही नहीं है। हमें यह समझना होगा कि निजीकरण कोई रामबाण इलाज नहीं है सरकारी संस्थानों की अव्यवस्था और हो रहे घाटों  का, बल्कि यह समस्या के हल की बजाय समस्या से पलायन है।  इसलिए इस अविवेक कारी निजी करण का विरोध किया जाना देश तथा समाज के हित में है । सरकारों को यह समझना ही होगा कि इन सरकारी उपक्रमों को सही तरीके से चलाना उनकी जिम्मेदारी है, इस जिम्मेदारी से भागने से काम नहीं चलेगा। और इन सरकारी उपक्रमों को इन सरकारी संपत्तियों को जो कि सीधे सीधे जनता की संपत्ति है इन्हें  बेचने की सोचना भी राष्ट्रद्रोह है। और जो भी इन सरकारी उपक्रमों को सरकारी संपत्तियों को हाथ लगाएगा उसे इस देश की जनता तथा हमारा यह  लोकतंत्र उसे माफ नहीं करेगा।

-लेखक अखिल भारतीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक हैं

Uday Sarvodaya Team

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