आखिर कितनी कामयाब होगी भाजपा से मंदिर मुद्दा छीनने की कांग्रेस की कोशिश?

आखिर कितनी कामयाब होगी भाजपा से मंदिर मुद्दा छीनने की कांग्रेस की कोशिश?

रिपोर्ट ¦ रवि प्रकाश मौर्य   

नई दिल्ली : अब ये एक कहावत बन गई है कि ‘जब-जब चुनाव आता है, भाजपा को राम मंदिर की याद सताने लगती है. सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में डाली गई याचिका को भी इसी कड़ी में जोड़ कर देखा जा सकता है. इसके बाद केंद्र और योगी सरकार की मिलीभगत से प्रयागराज में अर्धकुम्भ को महाकुम्भ बना कर पेश किया गया और अरबों रुपये फूंके गए ताकि इस बहाने मंदिर मुद्दे को भुनाया जा सके, जो फिलहाल कामयाब नहीं हुआ.

पिछले काफी समय से इन सबके बीच कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में साफ्ट हिन्दुत्व की राजनीति खेली. जाहिर है कि भाजपा को यह नागवार लगा और फिर उसने ‘जनेऊधारी राहुल’ को लपेटने की कोशिश की. हालांकि कांग्रेस हिन्दुत्व के अपने एजेंडे पर चलती रही और फिर भाजपा से मंदिर मुद्दा छीनने की कोशिश की. कांग्रेस नेताओं के कई बयानों में इसकी झलक देखी सकती है.

हाल फिलहाल उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस महासचिव हरीश रावत ने इस बारे में बयान दिया है. देहरादून के एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है, तो वह अयोध्या में राम मंदिर बनाने का भरसक प्रयास करेगी. इसके साथ ही उन्होंने अपने बयान में यह भी जोड़ा, ‘मेरे इस दृष्टिकोण को पार्टी का भी दृष्टिकोण माना जाना चाहिए.’ सीधी-सी बात है कि वह ये बयान यूं ही नहीं दे रहे, बल्कि इसकी पीछे कांग्रेस की एक सोची-समझी रणनीति है.

बता दें कि इससे पहले भी हरीश रावत अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बारे में बयान दे चुके हैं. करीब एक माह पूर्व की बात है, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता भैयाजी जोशी ने कहा कि उनकी ख्वाहिश है कि राम मंदिर का निर्माण 2025 तक हो जाए, तब रावत ने यही कहा था कि कांग्रेस जब सत्ता में आएगी तभी राम मंदिर बनेगा.

एक अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी राज बब्बर के नजरिए से भी कांग्रेस के राम मंदिर मुद्दे पर उसकी सोच की झलक मिलती है. उन्होंने कहा था कि ‘राम मंदिर अयोध्या में नहीं बनेगा तो कहां बनेगा? भगवान राम के मंदिर को लेकर कौन नहीं चाहता है. चाहे वो हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिख हो या इसाई, हर व्यक्ति चाहता है कि राम मंदिर बने.’

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला भी कह चुके हैं कि अयोध्या मु्ददे पर चर्चा होनी चाहिए और इसे बातचीत की मेज पर बैठकर लोगों द्वारा हल किया जाना चाहिए. आखिर इसे कोर्ट में क्यों घसीटा जाना चाहिए? मुझे भरोसा है कि इसे बातचीत से हल किया जा सकता है. भगवान राम सारी दुनिया के हैं, सिर्फ हिन्दुओं के नहीं. आगे यह भी कहा कि जिस राम मंदिर बनेगा, मैं भी एक पत्थर लगाने जाऊंगा.

राम मंदिर मुद्दे पर ये तो रहा कांग्रेसी नेताओं की पक्ष, जबकि इस मामले में कुछ समय पूर्व विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार के एक बयान ने भी सुर्खियां बटोरी थी. उन्होंने कहा था कि ‘कांग्रेस अगर लोकसभा चुनाव के अपने घोषणा पत्र में राम मंदिर का मुद्दा शामिल करेगी, तो वह समर्थन पर विचार करेंगे.’

आलोक कुमार के इस बयान का यही अर्थ लगाया गया कि विश्व हिन्दू परिषद का भाजपा पर से मंदिर मसले को लेकर विश्वास डगमगा रहा है. जब इस बात को हो-हल्ला मचा तो आलोक कुमार अपने बयान से पलट गए. उन्होंने सफाई पेश की है कि विहिप ने कांग्रेस को समर्थन का कोई प्रस्ताव नहीं दिया है, लेकिन इसका जनता में जो संदेश जाना था, वह चला गया यानी राम मंदिर निर्माण की राहें बदौलत भाजपा ही नहीं, कांग्रेस के जरिये भी खुल सकती हैं. इसके साथ ही मंदिर मुद्दे पर जब-तब कांग्रेस के कई नेताओं द्वारा दिए गए बयानों ने आग में घी का काम किया, जिससे लगता है कि कहीं न कहीं वह इस मुद्दे को भाजपा से छीनना चाहती है.

यहां गौरतलब बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे राजीव गांधी द्वारा मंदिर के ताले खुलवाने के बाद बड़ी संख्या में लोग और हिन्दू संगठन उनके साथ आ गए थे, जिसके बाद कांग्रेस जमीन से लेकर संसद तक मजबूत हुई थी. ऐसे में अगर कांग्रेस राम मंदिर के लिए अपने दरवाजे खोलती है और विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार की बात पर गौर करते हुए अपने घोषणा पत्र में मंदिर मसले को शामिल कर लेती है तो भाजपा को शर्तिया आगामी लोकसभा चुनाव में नुकसान झेलना पड़ सकता है.

Ravi Prakash

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