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‘अखबार पर खाना, बहती दाल’ में उन्माद होता तो मीडिया जरूर बेचता यह खबर

‘अखबार पर खाना, बहती दाल’ में उन्माद होता तो मीडिया जरूर बेचता यह खबर
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कृष्ण कांत

मीडिया यह तोछापता है कि फलाने कोरंटाइन सेंटर में कौन लोग मटन मांग रहे थे, कौन बिरयानी मांग रहा था? लेकिन उसी उत्साह और सनसनी के साथ यह नहींछापता कि कोरंटाइन में अखबार पर खाना परोसा गया और दाल बह गई! क्योंकि इसमेंउन्माद नहीं है। मीडिया उन्माद बेचता है।

मीडिया यह नहींपूछता कि अखबार पर परोसा गया खाना खत्म होने से पहलेअखबार तो गल गया होगा, क्या इस व्यक्तिके खाने में मिट्टी नहीं आई होगी? क्या अखबार मेंदाल-चावल खाने को देना, जानवरों को जमीनपर चारा डाल देने जैसा नहीं है?

लेकिन हमारेदिमाग में डाला जा रहा है कि सवाल पूछना देशद्रोही काम है। हमें सिखाया जा रहा हैकि जिनसे सवाल करना चाहिए, उनकी पूजा करतेरहना ही हमारा धर्म है। इसलिए हम एक-दूसरे से भी कहने लगे हैं कि सवाल क्यों करतेहो?

इसलिए हम यह नहींपूछ पाते कि जिस सरकार ने कुंभ मेले के समय सबसे बड़े बसों के काफिले का गिनीजवर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था, जिस राज्य के पासबसों का सबसे बड़ा परिवहन बेड़ा है, उस राज्य में दो महीने तक कामगार भूखे-प्यासे पैदल क्यों चलते रहे?

भारत का समाजमूलत: परसंतापी समाज है। हम लोग अगर यह सुन लें कि कोई सुखी है तो हमें दुख होता है,षडयंत्र सूझता है। दूसरे के दुख से हम सुखीहोते हैं। नोटबंदी में हम सिर्फ इसलिए सुखी थे कि अमीरों का दिमाग सही हो गया। उससच्चाई से हमने आंख मूंद ली कि पौने चार करोड़ लोग बेरोजगार हो गए।

हम परसंतापी हैं,लेकिन असल अत्याचारी को भगवान मान लेते हैं। इसलिएयह सवाल नहीं करते कि जब देश की आर्थिकी डूब गई तो तीन-चार लोगों की संपत्तिदोगुनी कैसे हो गई? हम सब लूट औरभ्रष्टाचार को आदर्श मानते हैं। कॉरपोरेट और राजनीति की लूट को मौन समर्थन देतेहैं।

मीडिया भी इसीपरसंतापी समाज का हिस्सा है। वह भी परसंतापी लोगों से भरा है। इसलिए मीडिया काचरित्र गरीब विरोधी और धनपशुओं का समर्थक है।

पिछले दो महीनेमें गरीब जनता पर जिस तरह का ऐतिहासिक अत्याचार हुआ है, मीडिया की भी उसमें सहभागिता है। भागते हुए लोगों की खबरछाप देना एक बात है, लेकिन सरकार कोउसकी करतूतों के लिए असहज कर देना दूसरी बात। मीडिया ने यह काम छोड़ दिया है,क्योंकि उसकी लगाम सरकार और कॉरपोरेट के हाथमें है।

यह भी कम हैरानीकी बात नहीं है कि जनता हर उस कारनामे से खुश है, जो उसके विरोध में रचा जा रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार इनके निजी हैं। उदय सर्वोदय का इससे सहमत अथवा असहमत होना आवश्यक नहीं है)

Updated : 29 May 2020 8:05 AM GMT
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