गोरखपुर में ‘जूताकांड’ के बाद बीजेपी का ब्राह्मण कार्ड कितना कारगर साबित होगा?

लखनऊ (ब्यूरो रिपोर्ट) :  योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर लोकसभा के उपचुनाव में जब बीजेपी ने उपेंद्र दत्त शुक्ला को मैदान में उतारा तो किसी को अंदाजा नहीं था कि वे हार जाएंगे. जब उपेंद्र शुक्ला हारे तो कुछ विश्लेषकों ने कहा कि बीजेपी की हार की कहानी तो उसी दिन लिख दी गई थी जब गोरक्षनाथ मठ से बाहर का, वो भी एक ब्राह्मण प्रत्याशी उतारा गया. इशारा यहां की ब्राह्मण बनाम ठाकुर वाली राजनीति की तरफ था. अब लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी ने यहां भोजपुरी अभिनेता रवि किशन को प्रत्याशी बनाकर भेजा है, जो शुक्ला हैं. देखना ये है कि ‘जूताकांड’ के बाद बीजेपी का ‘शुक्ला दांव’ या कहा जाए ब्राह्मण कार्ड कितना कारगर साबित होता है?

राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं, ‘संतकबीर नगर में जूताकांड के बाद ब्राह्मण बनाम ठाकुर की लड़ाई और मजबूत हो गई है और खुलकर सामने आई है. सांसद शरद त्रिपाठी ने अपनी ही पार्टी के विधायक राकेश सिंह बघेल की जूते से पिटाई कर दी थी. राकेश सिंह ठाकुर भी हैं और योगी आदित्यनाथ के खास भी. इसलिए चुनाव में इसका नफा-नुकसान बढ़ जाए तो कोई बड़ी बात नहीं.’

गोरखपुर में अब तक 18 बार लोकसभा चुनाव हुए हैं, जिसमें से आठ बार गोरक्षपीठ का कब्जा रहा है. योगी आदित्यनाथ तो लगातार पांच बार से चुनाव जीत चुके हैं. वैसे यहां की सियासत को शुरू में ही ब्राह्मण बनाम ठाकुर का रोग लग गया था. पुराने लोग बताते हैं कि यह कहानी शुरू होती है उस समय से, जब गोरखनाथ मंदिर के महंत की गद्दी पर दिग्विजय नाथ आसीन थे. वही वक्त था जब, गोरखपुर के ब्राह्मणों के बीच सुरति नारायण मणि त्रिपाठी भी काफी लोकप्रिय थे. वो गोरखपुर के डीएम और बनारस संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके थे. विधान परिषद सदस्य रहे. साथ ही गोरखपुर विश्वविद्यालय की कार्यसमिति में भी उनका अच्छा खासा दखल था.

गोरखपुर की राजनीति को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार कमलेश त्रिपाठी बताते हैं कि जब गोरखपुर में सुरति नारायण मणि त्रिपाठी डीएम थे, उस समय गोरखपुर विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी जा रही थी. इस यूनिवर्सिटी को बनाने में दिग्विजय नाथ का भी बड़ा योगदान था. गोरखनाथ मंदिर से संचालित होने वाले एमपी डिग्री कॉलेज को गोरखपुर यूनिवर्सिटी का मुख्य भवन बनाया गया था. उस समय यूनिवर्सिटी में अपनों की नियुक्तियों को लेकर दोनों के बीच खींचतान हुई जो धीरे-धीरे ठाकुरों और ब्राह्मणों की बीच राजनीतिक विवाद बन गई. यह विवाद आज भी जिंदा है.

यूनिवर्सिटी विवाद के बाद दोनों एक दूसरे को कमजोर करने में जुटे हुए थे. वैसे तो दिग्विजय नाथ सन्यासी थे लेकिन ठाकुर यानी क्षत्रिय जाति के लोग मठ को अपना केंद्र मानते रहे. दोनों के बीच वर्चस्व की जंग ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय की सोच को मजबूत करती रही. इसके बाद महंत दिग्विजय नाथ 1967 में राजनीति में उतरे और निर्दलीय सांसद बनकर उन्होंने अपना और मठ की ताकत का लोहा मनवाया. दिग्विजय नाथ के बाद अवैद्यनाथ के जमाने में ये रार थोड़ी कमजोर पड़ी लेकिन यह शीतयुद्ध मठ की कमान योगी आदित्‍यनाथ के हाथ में आने के बाद और गहरा गया.

उधर, हरिशंकर तिवारी को छात्र जीवन में ही अपने दबंग कारनामों से इलाके में बहुत से ब्राह्मणों का आशीर्वाद मिल गया था. कहा ये भी जाता है कि सुरति मणि त्रिपाठी ने भी तिवारी को शह दी. पुराने लोग बताते हैं कि छात्र जीवन से निकलकर जब तिवारी ने ठेकेदारी के धंधे में प्रवेश किया तो उन्हें गोरखपुर विवि के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके रवींद्र सिंह की ओर से चुनौती मिली. रवींद्र सिंह की हत्या के बाद से तिवारी के हाते से ही निकल कर कभी उन्हीं के समर्थक रहे वीरेंद्र शाही ने ठाकुरों का झंडा संभाल लिया.

विधायक वीरेंद्र शाही के जिंदा रहते गोरखपुर में ब्राह्मणों के वर्चस्व को चुनौती मिली. बाद के दौर में पूर्वांचल के अपराध जगत में श्रीप्रकाश शुक्‍ला नाम उभरा. माना जाता है कि उसके जरिए वीरेंद्र शाही की हत्‍या करा दी गई. तब तक ये लड़ाई हरिशंकर तिवारी के ‘हाता’ और ‘मठ’ के बीच बदल गई. योगी आदित्‍यनाथ के उदय के बाद से तिवारी कमजोर होते चले गए. हरिशंकर तिवारी 1985 से 2007 तक लगातार गोरखपुर के चिल्लूपार विधानसभा से विधायक बनते रहे.

हरिशंकर तिवारी के अलावा ब्राह्मणों की तरफ से मठ के खिलाफ लड़ने की जिम्‍मेदारी शिव प्रताप शुक्‍ला ने भी उठाई. शुक्‍ला को भी ब्राह्मणों का खूब सहयोग मिला. वो यहां ब्राह्मणों के सर्वमान्य नेता बन गए. लेकिन मठ तब तक काफी मजबूत हो चुका था. शुक्‍ला 2002 के विधानसभा चुनाव में गोरखपुर से हार गए. उस समय कहा गया कि उनकी हार में मठ की भूमिका अहम थी.

तब गोरखपुर सीट से योगी अपने खासमखास राधा मोहन दास अग्रवाल को टिकट दिलाना चाहते थे. लेकिन उस सीट के मौजूदा विधायक रहे शिव प्रताप शुक्‍ला उस वक्‍त प्रदेश कैबिनेट थे. इसलिए बीजेपी उन्‍हें टिकट देना चाहती थी. पार्टी ने ऐसा ही किया. फिर योगी ने बागी तेवर अपनाते हुए बीजेपी प्रत्‍याशी शुक्‍ला के खिलाफ अग्रवाल को अखिल भारतीय हिंदू महासभा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतारा. योगी का वहां प्रभाव इतना था कि अग्रवाल चुनाव जीत गए और शुक्‍ला को तीसरे नंबर पर संतोष करना पड़ा. बावजूद इसके कि शुक्‍ला यूपी में तीन मुख्‍यमंत्रियों की कैबिनेट का अंग रह चुके थे.

योगी आदित्‍यनाथ और मठ की प्रतिष्‍ठा लगातार बढ़ती रही. योगी ने हिंदू युवा वाहिनी के जरिए खुद को काफी मजबूत किया. तब आलम ये था कि गोरखपुर के आसपास मामला योगी बनाम बीजेपी हो गया था. वह जिसे चाहते उसे टिकट मिलता, जिसे नहीं चाहते वो टिकट पाकर भी चुनाव हार जाता. बीजेपी को उनके आगे घुटने टेकने पड़ जाते थे.

2017 में जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो सबसे ज्यादा नाराजगी ब्राह्मणों में थी. यही नहीं सरकार बनने के कुछ ही महीने बाद गोरखपुर में हरिशंकर तिवारी के हाते पर पुलिस की रेड को भी इसी ब्राह्मण बनाम ठाकुर की पटकथा से जोड़कर देखा गया. मामले में हरिशंकर तिवारी के लड़के और बसपा विधायक विनय शंकर तिवारी ने इस रेड को लेकर सीधे सीएम योगी आदित्यनाथ पर आरोप भी मढ़े थे.

उधर, 1989 के बाद कोई ब्राह्मण सीएम नहीं बना था. ऐसे में गोरखपुर के ब्राह्मणों को साधने के लिए बीजेपी ने फिर से शिव प्रताप शुक्ला पर दांव चला. उन्हें न सिर्फ राज्यसभा भेजा गया बल्कि वित्त राज्य मंत्री जैसा अहम पद दिया गया. महेंद्र पांडेय को प्रदेश अध्यक्ष. यही नहीं योगी की सीट पर उपेंद्र दत्त शुक्ल को टिकट दिया गया.

हालांकि सूत्रों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ के समर्थक नहीं चाहते थे कि गोरखपुर का नेतृत्व मठ से बाहर और वो भी ब्राह्मणों के हाथ में जाए. इस बार फिर बीजेपी ने भोजपुरी अभिनेता रविकिशन शुक्ला को उतारा है. देखना ये है कि जूता कांड के बाद ब्राह्मण और ठाकुर गोलबंद होकर बीजेपी को वोट करते हैं या नहीं? गोरखपुर के पत्रकार राजीव दत्त पांडे का कहना है कि ब्राह्मण हो या ठाकुर कोई नहीं चाहेगा कि योगी की स्थिति कमजोर हो. बाहरी प्रत्याशी की वजह से स्थानीय दावेदारों का झगड़ा भी खत्म हो गया है.

गोरखपुर में सबसे ज्यादा निषाद बताए जाते हैं. तीन विधानसभा सीटों पिपराइच, कैंपीयरगंज और सहजनवा में इस समुदाय की अच्छी संख्या है. प्रवीण निषाद संत कबीर नगर भेज दिए गए हैं, जहां निषाद गोरखपुर के मुकाबले काफी कम हैं. दूसरी ओर गोरखपुर में शुक्ला के सामने गठबंधन की ओर से राम भुवाल निषाद हैं. ऐसे में देखना ये भी होगा कि चार लाख निषाद किसकी तरफ जाते हैं?

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