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मध्य प्रदेश की राजनीति में आदिवासी चेतना का उभार

मध्य प्रदेश की राजनीति में आदिवासी चेतना का उभार
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मध्य प्रदेश ¦ रिपोर्ट जावेद अनीस 21 प्रतिशत से अधिक आदिवासी बहुल वाले प्रदेश में kजयसl की सक्रियता ने भाजपा और कांग्रेस को परेशानी में डाल दिया है. राज्य विधानसभा की कुल 230 सीटों में से 47 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जबकि करीब 30 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां पर्याप्त संख्या में आदिवासी आबादी है. ऐसे में आदिवासियों के अधिकारों की मांग करने वाली जयस आगामी विधानसभा चुनाव में kअबकी बार आदिवासी सरकारl के नारे के साथ 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है.


अगर सब कुछ सामान्य रहा तो तीन महीने बाद मध्य प्रदेश में चुनाव होने हैं, लेकिन इधर पहली बार दोनों प्रमुख पार्टियों से इतर राज्य के आदिवासी समुदाय में स्वतंत्र रूप से सियासी सुगबुगाहट चल रही है. गोंडवाना गणतंत्र पार्टी तो पहले से ही थी, जिसका कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में अहम रोल माना जाता है. अब kजयसl यानी जय आदिवासी युवा शक्ति जैसे संगठन भी मैदान में आ चुके हैं, जो विचारधारा के स्तर पर ज्यादा शार्प हैं और जिसकी बागडोर युवाओं के हाथ में है. जयस की सक्रियता दोनों पार्टियों को बैचैन कर रही है.डेढ़ साल पहले आदिवासियों के अधिकारों की मांग के साथ शुरू हुआ यह संगठन आज kअबकी बार आदिवासी सरकारl के नारे के साथ 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है. जयस द्वारा निकाली जा रही kआदिवासी अधिकार संरक्षण यात्राl में उमड़ रही भीड़ इस बात का इशारा है कि बहुत ही कम समय में यह संगठन प्रदेश के आदिवासी सामाज में अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहा है. जयस ने लंबे समय से मध्य प्रदेश की राजनीति में अपना वजूद तलाश रहे आदिवासी समाज को स्वर देने का काम किया है. आज इस चुनौती को कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां महसूस कर रही हैं शायद इसीलिए जयस के राष्ट्रीय संरक्षक डॉ. हीरालाल अलावा कह रहे हैं, ‘आज आदिवासियों को वोट बैंक समझने वालों के सपने में भी अब हम दिखने लगे हैं.आदिवासी वोटरों को साधने के लिए आज दोनों ही पार्टियों को नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ रही है. शिवराज अपने पुराने हथियार kघोषणाओंl को आजमा रहे हैं, तो वहीं कांग्रेस आदिवासी इलाकों में अपनी सक्रियता और गठबंधन के सहारे अपने पुराने वोटबैंक को वापस हासिल करना करना चाहती है. उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में आदिवासियों की आबादी 21 प्रतिशत से अधिक है. राज्य विधानसभा की कुल 230 सीटों में से 47 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा करीब 30 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां पर्याप्त संख्या में आदिवासी आबादी है. 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में भाजपा को 32 तथा कांग्रेस को 15 सीटें मिली थीं. दरअसल मध्य प्रदेश में आदिवासियों को कांग्रेस का परंपरागत वोटर माना जाता है, लेकिन 2003 के बाद से इस स्थिति में बदलाव आना शुरू हो गया जब आदिवासियों के लिए आरक्षित 41 सीटों में कांग्रेस को महज 2 सीटें ही हासिल हुई थीं जबकि भाजपा ने 34 सीटों पर कब्जा जमा लिया. 2003 के चुनाव में पहली बार गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी, जो कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने में एक प्रमुख कारण बना था.वर्तमान में दोनों ही पार्टियों के पास कोई ऐसा आदिवासी नेता नहीं है, जिसका पूरे प्रदेश में जनाधार हो. जमुना देवी के जाने के बाद से कांग्रेस में प्रभावी आदिवासी नेतृत्व नहीं उभर पाया है. पिछले चुनाव में कांग्रेस ने कांति लाल भूरिया को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया था लेकिन वे अपना असर दिखाने में नाकाम रहे. खुद कांति लाल भूरिया के संसदीय क्षेत्र झाबुआ में ही कांग्रेस सभी आरक्षित सीटें हार गई थी. वैसे भाजपा में फग्गन सिंह कुलस्ते, विजय शाह, ओम प्रकाश धुर्वे और रंजना बघेल जैसे नेता जरूर हैं, लेकिन उनका व्यापक प्रभाव देखने को नहीं मिलता है. इस बीच आदिवासी इलाकों में भाजपा नेताओं के लगातार विरोध की खबरें भी सामने आ रही हैं, जिसमें मोदी सरकार के पूर्व मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते और शिवराज सरकार में मंत्री ओम प्रकाश धुर्वे शामिल हैं. ऐसे में जयस की चुनौती ने भाजपा की बेचैनी को बढ़ा दिया है और कांग्रेस भी सतर्क नजर आ रही है.2013 में डॉ. हीरा लाल अलावा द्वारा जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) का गठन किया गया था, जिसके बाद इसने बहुत तेजी से अपने प्रभाव को कायम किया है. पिछले साल हुए छात्रसंघ चुनावों में जयस ने एबीवीपी और एनएसयूआई को बहुत पीछे छोड़ते हुए झाबुआ, बड़वानी और अलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल जिलों में 162 सीटों पर जीत दर्ज की थी. आज पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों अलीराजपुर, धार, बड़वानी और रतलाम में जयस की प्रभावी उपस्थिति लगातार बढ़ रही है. यह क्षेत्र भाजपा और संघ परिवार का गढ़ माना जाता था. दरअसल जयस की विचारधारा आरएसएस की सोच के खिलाफ है. ये खुद को हिंदू नहीं मानते और इन्हें आदिवासियों को वनवासी कहने पर भी ऐतराज है. खुद को हिंदुओं से अलग मानने वाला यह संगठन आदिवासियों की परंपरागत संस्कृति के संरक्षण और उनके अधिकारों के नाम पर आदिवासियों को अपने साथ जोड़ने में लगा है. यह संगठन आदिवासियों की परंपरागत पहचान, संस्कृति के संरक्षण व उनके अधिकारों के मुद्दों को प्रमुखता उठाता है. जयस का मुख्य जोर 5वीं अनुसूची के सभी प्रावधानों को लागू कराने में है. दरअसल पांचवी अनुसूची की धारा 244(1) के तहत आदिवासियों को विशेषाधिकार दिए गए हैं, जिन्हें सरकारों ने लागू नहीं किया है.मध्य प्रदेश में आदिवासियों की स्थिति काफी खराब है. शिशु मृत्यु और कुपोषण सबसे ज्यादा आदिवासी बाहुल्य जिलों में देखने को मिलता है, जिसकी वजह यह है कि सरकार की नीतियों के कारण आदिवासी समाज अपने परंपरागत संसाधनों से लगातार दूर होता गया है. विकास परियोजनाओं की वजह से वे व्यापक रूप से विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर हुए हैं और इसके बदले में उन्हें विकास का लाभ भी नहीं मिला. वे लगातार गरीबी व भूख के दलदल में फंसते गए हैं. भारत सरकार द्वारा जारी kरिपोर्ट आफ द हाई लेबल कमेटी आन सोशियो इकोनॉमिक, हेल्थ एंड एजुकेशनल स्टेटस आफ ट्राइबल कम्यूनिटी 2014l के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी समुदाय में शिशु मृत्यु दर 88 है, जबकि मध्य प्रदेश में यह दर 113 है. इसी तरह से राष्ट्रीय स्तर पर 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 129 है, वहीं प्रदेश में यह दर 175 है. आदिवासी समुदाय में टीकाकरण की स्थिति भी चिंताजनक है. रिपोर्ट के अनुसार देश में 12 से 23 माह के बच्चों के टीकाकरण की दर 45.5 है, जबकि मध्य प्रदेश में यह दर 24.6 है. इसी तरह से एक गैर सरकारी संगठन kबिंदास बोलl द्वारा जारी की गई अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के आदिवासी जिलों के करीब 40 प्रतिशत बच्चे अभी स्कूल नहीं जा रहे हैं. इसका प्रमुख कारण यह है कि पिछले कुछ सालों के दौरान आदिवासी क्षेत्रों में स्कूलों की संख्या में करीब 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी तो हुई है लेकिन मानकों के आधार पर यहां अभी भी करीब 60 प्रतिशत टीचरों की कमी है. जाहिर है सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, लगातार की गई अवहेलना के कारण ही आज आदिवासी समाज गरीबी, कुपोषण और अशिक्षा की जकड़ में है. दूसरी तरफ स्थिति ये है कि पिछले चार सालों के दौरान मध्य प्रदेश सरकार आदिवासियों के कल्याण के लिए आवंटित बजट में से 4800 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं कर पाई है. 2015 में कैग द्वारा जारी रिपोर्ट में भी आदिवासी बाहुल्य राज्यों की योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए गए थे.उपरोक्त परिस्थितियों ने जयस जैसे संगठनों के लिए जमीन तैयार करने का काम किया. इसी परिस्थिति का फायदा उठाते हुए जयस अब आदिवासी बाहुल्य विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने की तैयारी में है. इसके लिए वे आदिवासी समूहों के बीच एकता की बात कर रहे हैं जिससे राजनीतिक दबाव समूह के रूप में चुनौती पेश की जा सके. डॉ. अलावा कहते हैं कि kजयस एक्सप्रेस का तूफानी कारवां अब नहीं रुकने वाला है. हमने बदलाव के लिए बगावत की है और किसी भी कीमत पर बदलाव लाकर रहेंगे.l जयस ने 29 जुलाई से आदिवासी अधिकार यात्रा शुरू की है, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग जुड़ भी रहे हैं. जाहिर है अब जयस को हलके में नहीं लिया जा सकता है. आने वाले समय में अगर वे अपनी इस गति को बनाए रखने में कामयाब रहे तो मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.आदिवासी बहुल जिलों में जयस के लगातार बढ़ रहे प्रभाव को देखते हुए कांग्रेस और भाजपा दोनों के रणनीतिकार उलझन में हैं. स्थिति सुधारने के लिए भाजपा पूरा जोर लगा रही है. इसके लिए शिवराज सरकार ने 9 अगस्त आदिवासी दिवस को आदिवासी सम्मान दिवस के रूप में मनाया है, जिसके तहत आदिवासी क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर कार्यक्रम हुए हैं. इस मौके पर धार में आयोजित एक कार्यक्रम में खुद मुख्यमंत्री ने कई सारी घोषणाएं की हैं, जिसमें राज्य के कुल बजट का 24 फीसद आदिवासियों पर ही खर्च करने, आदिवासी समाज के लोगों पर छोटे-मोटे मामलों के जो केस हैं उन्हें वापस लेने, जिन आदिवासियों का दिसंबर 2006 से पहले तक वनभूमि पर कब्जा है उन्हें सरकार ने वनाधिकार पट्टा देने, जनजातीय अधिकार सभा का गठन करने जैसी कई घोषणाएं की हैं. इस दौरान उन्होंने जयस पर निशाना साधते हुए कहा कि kकुछ लोग भोले-भाले आदिवासियों को बहका रहे हैं, पर उनके बहकावे में आने की जरूरत नहीं है.lभाजपा द्वारा जयस के पदाधिकारियों को पार्टी में शामिल होने का आफर भी दिया जा चुका है, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया. डॉ. हीरालाल अलावा ने साफ तौर पर कहा है, kभाजपा में किसी भी कीमत पर शामिल नहीं होंगे क्योंकि भाजपा धर्म-कर्म की राजनीति करती है, उनकी विचारधारा ही अलग है. वे आदिवासियों को उजाड़ने में लगे हैं.l वहीं कांग्रेस भी आदिवासियों को अपने खेमे में वापस लाने के लिए रणनीति बना रही है. इस बारे में कार्यकारी अध्यक्ष बाला बच्चन ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को एक रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें पार्टी से बीते चुनावों से दूर हुए इस वोट बैंक को वापस लाने के बारे में सुझाव दिए गए हैं. कांग्रेस का जोर आदिवासी सीटों पर वोटों के बंटवारे को रोकने पर है. इसके लिए वो छोटे-छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहती है. अगर कांग्रेस गोंडवाना पार्टी और जयस को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रही तो इससे भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. हालांकि ये आसान भी नहीं है. कांग्रेस लंबे समय से गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से समझौता करना चाहती है, लेकिन अभी तक बात बन नहीं पाई है. उलटे गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने शर्त रख दी है कि उनका समर्थन कांग्रेस को तभी मिलेगा जब उसका सीएम कैंडिडेट आदिवासी हो. कुल मिलाकर कांग्रेस के लिए गठबंधन की राहें उतनी आसान भी नहीं हैं, जितना वो मानकर चल रही थी.आने वाले समय में मध्य प्रदेश की राजनीति में आदिवासी चेतना का यह उभार नए समीकरणों को जन्म दे सकता है और इसका असर आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़ना तय है. बस देखना बाकी है कि भाजपा व कांग्रेस में से इसका फायदा कौन उठाता है या फिर इन दोनों को पीछे छोड़ते हुए सूबे की सियासत में कोई तीसरी धारा उभरती है.

Updated : 1 Oct 2018 3:07 PM GMT
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