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ग्रामीण स्तर पर शिक्षा की नींव रखने से भारत बनेगा मजबूत राष्ट्र

ग्रामीण स्तर पर शिक्षा की नींव रखने से भारत बनेगा मजबूत राष्ट्र
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अमित बैजनाथ गर्ग

‘बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ’ जैसे नारे गांवों तक तो पहुंच गए, लेकिन शिक्षा नहीं पहुंची। ऐसे देश में जहां शिक्षा बच्चोंका मूल अधिकार है, वहां हर 10 अशिक्षित बच्चों में से 8 लड़कियों का होना शर्म की बात है। शिक्षा केलिए जद्दोजहद करती ग्रामीण बालिकाएं बड़ी मुश्किल से यदि स्कूल जाने भी लगें,तो भी अपने परिवेश और पारिवारिक हालात उन्हेंशिक्षा से दूर करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

देश के 78 लाख बच्चों को पढ़ाई के साथ कमाई करनी पड़तीहै, वहीं 8.4 करोड़ बच्चे आज भी स्कूलों से वंचित हैं।विभिन्न आंकड़े और रपट कहती हैं कि शिक्षा के मामले में सबसे खराब स्थिति उत्तरप्रदेश की है, जहां 16 लाख बच्चों तक शिक्षा की रोशनी नहीं पहुंचाईजा सकी है। स्कूल जाने वाले बच्चों में भी 59 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जो ठीक से पढ़ नहीं पाते हैं।

2013 में मानव विकासमंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिवर्ष पूरे देश में 5वीं तक आते-आते करीब 23 लाखछात्र-छात्राएं स्कूल छोड़ देते हैं। लगभग एक तिहाई सरकारी स्कूलों में लड़कियोंके लिए शौचालयों की सुविधा नहीं है, जिस कारण से वे स्कूल छोड़ रही हैं। भारत में लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य परजोर देना ज्यादा जरूरी है, क्योंकि 22 लाख से भी ज्यादा लड़कियों की शादी कम उम्रमें कर दी जाती है। ऐसे में उनका स्कूल छूटना स्वाभाविक है। शिक्षा सहित लड़कियोंके अन्य मुद्दों पर भी समाज को जागरूक करना होगा। खासतौर पर ग्रामीण समाज को।

हमारे देश मेंशिक्षा की हालत बदतर है। ग्रामीण क्षेत्रों में हालात और भी भयानक हैं। इस मामलेमें सबसे खराब स्थिति लड़कियों की शिक्षा को लेकर है। यह आंकड़े यूनिसेफ कीवार्षिक रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन’ ने जारी किएहैं।

ग्रामीण भारत मेंकुछ सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या बहुत ज्यादा है, जिससे छात्रों और शिक्षकों का अनुपात बिगड़ जाता है। 5दिसंबर, 2016 को मानव संसाधनविकास मंत्री द्वारा लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, देशभर के प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों के 18 प्रतिशत पद और माध्यमिक स्कूलों में 15 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। मसलन, सरकारी स्कूलों में शिक्षक के छह पदों में सेएक पद खाली है यानी करीब 10 लाख शिक्षकों कीसामूहिक रूप से भारी कमी है। वहीं भारत के 2600 लाख स्कूली बच्चों में से 55 प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूल जाते हैं। शिक्षकों की कमीझेलते हजारों स्कूलों के पास शौचालय तो क्या क्लासरूम तक नहीं है। देश में अभीभी करीब 1,800 स्कूल पेड़ केनीचे या टेंटों में चल रहे हैं।

सैम्पलरजिस्ट्रेशन सिस्टम बेसलाइन सर्वे-2014 की रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 17 साल की लगभग 16 प्रतिशतलड़कियां बीच में ही स्कूल छोड़ देती हैं। गुजरात इस मामले में देश के सबसे पिछड़ेराज्यों में से एक है। गुजरात में 15 से 17 साल की 26.6 प्रतिशतलड़कियां किसी न किसी कारण से स्कूल छोड़ देती हैं। इसका मतलब यह है कि राज्य में 26.6 प्रतिशत लड़कियां 9वीं और 10वीं कक्षा तक भी नहीं पहुंच पाती हैं।

छत्तीसगढ़ में 15 से 17 साल की 90.1 प्रतिशतलड़कियां स्कूल जा रही हैं, जबकि असम में यहआंकड़ा 84.8 प्रतिशत है। बिहार भीराष्ट्रीय औसत से ज्यादा पीछे नहीं है। यहां यह आंकड़ा 83.3 प्रतिशत है। झारखंड में 84.1 प्रतिशत, मध्यप्रदेश में 79.2 प्रतिशत, यूपी में 79.4 प्रतिशत और ओडिशा में 75.3 प्रतिशतलड़कियां हाई स्कूल के पहले ही स्कूल छोड़ देती हैं। अगर 10 से 14 साल की लड़कियोंकी शिक्षा की बात करें तो इसमें गुजरात सबसे निचले पांच राज्यों में आता है।

करीब 1.2 करोड़ भारतीय बच्चों का विवाह दस वर्ष की आयुसे पहले हो जाता है। इनमें से 65 प्रतिशत कम उम्रकी लड़कियां हैं और बाल विवाह किए गए हर 10 अशिक्षित बच्चों में से 8 लड़कियां होतीहैं। प्रति 1,000 पुरुषों कीतुलना में कम से कम 1,403 ऐसी महिलाएं हैं,जो कभी स्कूल नहीं गईं। भारत के पांच राज्यतमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में महिला साक्षरता की दर सबसेऊंची है। इन्हीं राज्यों में महिला उद्यमियों की संख्या भी सबसे ज्यादा है।

आर्थिक जनगणना केअनुसार, देशभर में महिलाओं द्वाराचलाए जा रहे कारोबार में इन पांच राज्यों की 53 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। तमिलनाडु में शिक्षित महिलाओंकी संख्या 73.4 प्रतिशत है।करीब 10 लाख व्यापारिक इकाइयांयहां महिलाओं के द्वारा चलाई जाती हैं, जो देशभर में महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे व्यापार में सबसे अधिक है। वहीं केरलका दूसरा स्थान है। यहां भारत की सबसे ज्यादा शिक्षित महिला आबादी है। यहां 90 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं और व्यापार कीहिस्सेदारी 11 प्रतिशत है।

शिक्षा को लेकरसरकार के प्रयासों में भले कमी रही हो, लेकिन सरकारी अभियानों से शिक्षा की स्थिति में सुधार आया है। खासतौर पर सर्वशिक्षा अभियान के माध्यम से स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है। शिक्षा केअधिकार का कानून लागू करने के बाद प्राथमिक शिक्षा के लिए होने वाले नामांकनों मेंवृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या में भीलगातार गिरावट आ रही है।

वर्ष 2009 में 6 से 13 वर्ष की उम्र के स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या लगभग 80 लाख थी, जबकि पांच साल बाद यानी 2014 में यह घटकर 60 लाख रह गई है। 2014 में 3 से 6 वर्ष की उम्र केबीच के 7.4 करोड़ बच्चों मेंसे लगभग 2 करोड़ बच्चेकिसी तरह की प्री-स्कूल शिक्षा नहीं ग्रहण कर रहे थे। सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की कमी के चलते लोग निजीस्कूलों की तरफ रुख कर रहे हैं। शिक्षकों की कमी झेलते हजारों स्कूलों के पासशौचालय तो क्या क्लास रूम तक नहीं हैं।

यूनिसेफ कीगुडविल एंबेसडर प्रियंका चोपड़ा का कहना है कि जब तक लोग लड़के और लड़की मेंभेदभाव खत्म नहीं करेंगे, तब तक इस स्थितिमें बदलाव नहीं आएगा। उत्तर प्रदेश,झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़,ओडिशा सहित अन्य राज्यों के प्रत्येक गांव मेंस्कूल ही नहीं हैं यानी पढ़ने के लिए छात्रोंको दूसरे गांव जाना पड़ता है। इसके चलते माता-पिता अपनी बेटियों को स्कूल नहीं भेजपाते और भारत में ग्रामीण शिक्षा विफल रह जाती है।

गरीबी भी एक बाधाहै। सरकारी स्कूलों की हालत अच्छी नहीं है और निजी स्कूल बहुत महंगे हैं। इसकानतीजा यह रहता है कि माध्यमिक शिक्षा में सफल रहकर आगे पढ़ने के लिए कॉलेज जाने वाले छात्रों की संख्या कमहो जाती है, इसलिए गांवों मेंमाध्यमिक स्तर पर ड्रॉप आउट दर बहुत ज्यादा है। भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनानेकी नींव प्राथमिक और ग्रामीण स्तर पर रखना जरूरी है, ताकि शुरू से ही शिक्षा का स्तर बेहतर हो।मुफ्त शिक्षा के बजाय ड्रॉप आउट के पीछे की वजह जाननी चाहिए, जो कि प्रगति के रास्ते में एक बड़ी बाधा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Updated : 14 May 2020 7:06 AM GMT
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