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कुतरन

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कहानी ¦ डॉ. हंसा दीप‘कोई समझता ही नहीं है कि पैसों के बिना किसी संस्था को कैसे चलाया जा सकता है. बातें तो सब बड़ी-बड़ी करते हैं.’ संस्था ‘अर्घ्य’ के सालाना समारोह का अवसर है. श्रोताओं को याद दिलाने का संदेश भेजा चुका है. यह याद दिलाना इसलिए भी जरूरी था कि कई लोगों ने आरएसवीपी तो किया था लेकिन टिकट के पैसे नहीं भेजे थे.कुड़कुड़ाते हुए जब नंदन जी आॅफिस में घुसे तो सामने ही संस्था के सेक्र ेटरी सुशांत को बैठे देखा. आशा की एक किरण नजर आई.‘अरे वाह सुशांत जी, आप जल्दी पहुंच गए! कहिए, क्या अपडेट है? एक ही सप्ताह बचा है अब, कम से कम दो सौ लोग आने चाहिए तभी तो हम अपना खर्चा पूरा कर पाएंगे वरना तो जेब से पैसा भर कर भी नैया तिर नहीं पाएगी.’‘नंदन जी, आप दो सौ की बात कर रहे हैं, पचास भी आ जाएं तो गनीमत होगी. मैं कम से कम तीन सौ लोगों को ई-मेल से रिमाइंडर भेज चुका हूं. सिर्फ दस लोगों ने आने की असमर्थता जताई है और दो ने आने की कोशिश करने का वादा किया है. बाकी ने पैसे भेजना तो दूर जवाब तक नहीं दिया है.’‘प्रयास बढ़ाइए, आग्रह कीजिए, लोगों को समझाइए कि हमारी कितनी मेहनत का फल है यह, खून-पसीना बहाया है हमने इस संस्था को यहां तक लाने में.’‘प्रयास तो किए जा रहे हैं, ई-मेल से, फ्लायर से, फेसबुक से, वॉट्सएप से मगर कुछ खास रिस्पांस नहीं मिल रहा है. अब इससे ज्यादा तो क्या कर सकते हैं. लोगों के घरों में जाकर बुलावा देने से तो रहे. अनर्गल जी के कांड के बाद लोगों का उत्साह न के बराबर है ऐसे कार्यक्र मों में.’‘उत्साह जगाना पड़ेगा, उनकी गलती का खामियाजा हम क्यों भुगतें...’ एक तीखा गुस्सा था अनर्गल जी के लिए जिन्होंने अपनी संस्था के नाम से पचास-पचास प्रति व्यक्ति का टिकट बेचा था एक जाने-माने गायक के लिए और बाद में वह समारोह स्थगित हो गया था. लोगों के पैसे नहीं लौटाए गए थे और वे फोन उठा नहीं रहे थे.‘हम ही क्यों अब तो हर संस्था भुगतेगी, लोगों का संस्थाओं पर से विश्वास ही उठ गया है. ये जनता जनार्दन है. अपने साथ हुए अन्याय को कहीं न कहीं तो जाहिर करेगी ही.’‘लेकिन यह तो हमारी संस्था का समारोह है. हमने अपनी एक इमेज बनाई है. हमारे सारे कामों में पारदर्शिता होती है, ईमानदारी होती है. हमारे कामों को परखा जाए, हमारी समानता की नजर को देखा जाए, हमारे कार्यक्र मों के स्तर को देखा जाए. लोग अनर्गल जी के साथ हमें तराजू में बिठाकर नहीं तौल सकते. कहां राजा भोज कहां गंगू तेली...’‘जी, सही कहा आपने लेकिन दिक्कत यही है कि लोगों तक हर संस्था यही संदेश देती है कि उनके अलावा सभी गंगू तेली हैं. रहा सवाल तराजू का तो तराजू में तो हर किसी को बैठना ही होगा, अब इसमें गलत क्या है. न्याय का पलड़ा आम आदमी के हाथ जाता ही कितनी बार है!’‘चलिए, आप लिस्ट दीजिए मैं जरा फोन घुमाकर देखता हूं.’‘यह लीजिए लिस्ट.’‘अरे विरही जी, नमस्कार, कैसे हैं? देखिए, हम अपना सालाना जलसा मना रहे हैं और आपकी संस्था के सभी सदस्यों को आमंत्रित करना चाहते हैं. जी, जी हां, डिस्काउंट आपकी संस्था को सीधे दे देंगे. जी जी, पचास प्रतिशत तो कुछ ज्यादा है हम औरों के साथ पक्षपात नहीं कर सकते न. चलिए आपके लिए पच्चीस प्रतिशत डिस्काउंट कर देते हैं. जी जी, शुक्रि या.’भेज दिए गए टिकट लेकिन पैसे तो एक के भी नहीं आए. पैसे भी चाहिए और आदमी भी वरना कार्यक्र म की धज्जियां उड़ जाएंगी. सामान्यत: व्यस्तता का यह आलम होता है कि समय कहां से आए, यह सोचना सबसे बड़ा काम हो जाता है लेकिन इस समय गंगा उल्टी दिशा से बह रही थी. इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोगों को कैसे बुलाया जाए.इसी ऊहापोह में अगला नंबर डायल हो जाता है.‘जी, मैं नंदन, सर जी कैसे हैं आप. हमारा सालाना समारोह है सर. जरा अपने लोगों को आने के लिए प्रोत्साहित कीजिए, आपका आभार होगा.’‘बात यह है नंदन जी कि आपकी टाइमिंग जरा गलत फंस गई है. सच्चाई तो यह है कि कोशिश की जा सकती है पर किसी पर दबाव नहीं डाल सकते. हमारे जैसे रचनाकारों पर विश्वास करने में तो जमाना लग जाता है, मगर विश्वास उठने में एक पल भी नहीं लगता. पलक झपकी नहीं कि बना-बनाया रिश्ता खत्म. आप जरा टाइमिंग का मसला हल कीजिए. चार-छ: महीने बाद यही कार्यक्र म होगा तो हमारे कुछ लोग तो आ ही जाएंगे.’‘वह तो मुश्किल ही नहीं असंभव है सर, क्योंकि एक तो सालाना तारीख पक्की है, हम हर साल इसी महीने के दूसरे रविवार को करते हैं यह कार्यक्र म. दूसरा, अब तो सारे परचे बंट चुके हैं, निमंत्रण पत्र भेजे जा चुके हैं, ई-मेल थोक में जा चुके हैं, हाल बुक हो गया है.’‘ये सब तो छोटी-छोटी बातें हैं नंदन जी, बड़ी बात तो यह है कि लोगों के बिना किसी भी कार्यक्र म का क्या मजा! कई बार तो शादियों के कार्ड बंट जाते हैं और कई झमेलों के कारण तारीख आगे बढ़ा दी जाती है तो यह तो फिर भी एक सालाना कार्यक्र म है. मैंने तो आपको एक सुझाव दिया था बस, बाकी तो आपकी इच्छा है.’‘जी धन्यवाद सर. आपसे फिर बात करता हूं.’ फोन मेज पर पटक कर गुस्से में लाल चेहरा सुशांत की ओर मुखातिब हुआ.‘सुना आपने सुशांत जी, आर्गेनाइजर का दिमाग न हुआ लोगों के सुझावों को ग्रहण करने का केंद्र हो गया. हर कोई अपनी वाली हांकता रहता है. बेचारे संस्था चलाने वाले को तो तन-मन-धन से लगे रहने के बाद भी गालियां ही मिलती हैं.’‘जाने दीजिए नंदन जी, ओखली में सिर तो दे ही दिया है अब मूसल की चोट से क्या डरना.’‘और कोई विकल्प भी तो नहीं है. अनुभव लेते जाएंगे तभी तो अपनी संस्था का नाम रोशन कर पाएंगे. धूप में तो बाल सफेद होते नहीं हैं.’ नंदन जी सफेदी लिए उभर आए बचे-खुचे बालों को अनायास ही हाथ से संवारने लगे.सुशांत सदा गंभीर बातें करने के आदी हैं बिल्कुल मुद्दे की बात - ‘हमारा यह कार्यक्र म फुस्स इसलिए भी होगा नंदन जी कि हमने प्रमुख वक्ता के रूप में विशेष जी को बुलाया है. और यह सबसे बड़ी गलती थी क्योंकि इस वजह से उनके विरोधी आएंगे नहीं... जिनमें सबसे खास है जिंदल संस्था, उनका पूरा का पूरा सौ लोगों का समूह कट गया.’‘पर करते क्या, विशेष जी को नहीं बुलाते तो जो हजार का चंदा मिला था उसका धन्यवाद कैसे कर पाते. पच्चीस-पचास के कितने ही टिकट बिकते तब कहीं जाकर इतनी राशि इकट्ठी होती. अगर भीड़ न हो पाई तो बाद में कुछ लोगों को नि:शुल्क बुला लेंगे. इसके अलावा कर भी क्या सकते हैं.’ नंदन जी जैसे भरे हुए थे अपनी भड़ास से. पैसों की मारा-मारी और लोगों को बुलाने की रस्साकशी से एक साथ निपटना था.‘अब नगर की एक और संस्था बची है कोहिनूर, जिससे थोड़ी उम्मीद है. उनके साथ परेशानी यह है कि हर कोई माइक पकड़कर रखना चाहता है लेकिन उनसे बात करते हुए मैंने स्पष्ट कर दिया था कि सभी लोगों को अधिकतम चार मिनट देने का वादा है एक सेकंड भी ज्यादा नहीं. ऐसा इसलिए भी कि वह सबसे बड़ी संस्था है. आधे लोग भी पैसे न दें तो भी कम से कम पच्चीस प्रतिशत तो काम हो ही जाएगा. कुछ आश्वासन हैं और कुछ प्रयास हैं, इसी भरोसे पर हमारे इस सालाना कार्यक्र म का भाग्य लिखा है.’ सुशांत अपनी संस्थाई कला से तर्क-वितर्क करके स्थिति से जैसे-तैसे निपटने की चेष्टा में थे.नंदन जी भी एक के बाद एक कारणों को ढूंढ़ते हुए निराशा में डूब रहे थे- ‘सबसे ज्यादा दु:ख की बात तो यह है कि नगर के वरिष्ठ कवि अचिंत्य जी ने बहिष्कार किया है यह कह कर कि आपने नियमों का पालन नहीं किया है. हालांकि वे किसी संस्था से ताल्लुक नहीं रखते, तटस्थ हैं पर अच्छे कवि हैं. अपनी कविताओं को गाकर सुनाते हैं तो समां बांध देते हैं.’नंदन जी और सुशांत जी दोनों एक-दूसरे को देखते, सिर हिलाते हुए अपने-अपने ईमेल के संदेशों को खंगाल रहे थे.गीत-संगीत है, भाषण है, चाटुकारिता है, सम्मान समारोह है. किसे सम्मान देना है यह भी तय करना कठिन था, क्योंकि एक को दिया जाता तो दूसरा नाराज होता. सभी को दे नहीं सकते. एक विचार तो यही आया था कि सभी को सम्मान देकर अपनी जान बचा ली जाए. कम से कम इस बहाने लोग तो आएंगे मगर ऐसा कर नहीं पाए थे.सारे पासे फेंके जा चुके थे. अधिक से अधिक लोगों तक यह बात फैले, ऐसे प्रयास किए गए. आने वाले संभावित लोगों की संख्या कम थी. कम क्या थी न के बराबर थी. क्या चूक हो गई कुछ कहा नहीं जा सकता. ये अपनी संस्था चलाते हैं. संस्था के लिए समर्पण चाहिए, वह है. शातिरता चाहिए, वह है. तिकड़मबाजी चाहिए, वह है. फिर भी जो चाहिए वह शायद नहीं है.आज कार्यक्र म है. कुछ ऐसा हुआ है कि हाल खाली पड़ा है. मुख्य वक्ता हैं और संस्था के पदाधिकारीगण हैं. कुल मिलाकर दस लोग हैं. वक्ता के साथ फोटो खींच लिया गया है, क्योंकि वक्तव्य देने का तो कोई औचित्य ही नहीं था. सबने खड़े होकर फोटो खिंचवा लिए हैं, फेसबुक पर डालने के लिए. सबको पता चल गया है कि कार्यक्र म हो गया है. फोटो अच्छे हैं.नंदन जी और पूरी टीम समोसों के कई राउंड पूरे करके बचे हुए सौ से अधिक समोसों का बंटवारा करके सामान समेट रहे हैं. वहां उड़ाई जाने वाली कतरनें लाल-पीली-हरी-सुनहरी चमकीली वैसी की वैसी पैकेट में रखी हुई थीं। नंदन जी की नजर पड़ी तो थोड़ी बिखेरने का मन किया, अपने ऊपर और अपनी टीम के ऊपर. सब मुस्कुराने लगे नंदन जी की इस खुशी पर, स्वयं वे भी खिलखिलाकर हंस पड़े अपने ऊपर बरसती रंग-बिरंगी कतरनों को देखकर- ‘यदि लोग होते तो कितना स्वागत होता उनका, नहीं आए तो उनकी किस्मत, हम अपना ही स्वागत कर लेते हैं.’अब उन्हीं बिखरी, सुनहरी-चमकीली कतरनों को बटोरते समय ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि चूहों ने गंदे कपड़ों को कुतर-कुतर कर डाल दिया हो और बिल्लियों को मजबूर कर दिया हो इस कुतरन को समेटने के लिए.

Updated : 11 Oct 2018 2:57 PM GMT
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