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जानिये केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की विशेषता, कैसे देश के लिए समर्पित है ये सेना

जानिये केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की विशेषता, कैसे देश के लिए समर्पित है ये सेना
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रिपोर्ट ¦ शशांक शंकर

केंद्रीय सुरक्षा बल या फिर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल जिनको अर्धसैनिक बल भी कहा जाता है भारतीय लोकतंत्र की नींव में लगे वो अभिन्न निष्ठा के पत्थर है जिनका लोहा खुद लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल सरीखे इस देश की कई महान हस्तियां मान चुकी हैं। परंतु अपने राष्ट्र और लोगों के प्रति अपार निष्ठा व कर्तव्यपथ की बलिवेदी पर हंस कर जान न्यौछावर करने वाले इन बलों को आज भी दोयम दर्जे का व्यवहार झेलना पड़ रहा है। विभिन्न नेता,मंत्री व चर्चित लोग इन बलों की चर्चा समय समय पर करते हैं और फिर कहीं अपनी अतिव्यस्त ज़िन्दगी में खो जाते हैं। सामान्य जन आज़ाद भारत के 70 साल से ज्यादा वक्त बीतने के बाद भी इन्हें भारतीय सेना या फिर न्याय व कानून व्यस्था की ड्यूटियों में सम्मिलित होने के कारण पुलिस मानते हैं। यह तथ्य आज तक भी उजागर नहीं हो पाया कि इन् बलों को पुलिस के कानून व न्याय व्यवस्था को लागू करने में असमर्थ या नाकाम होने की हालत में बुलाया जाता है। इससे भी अचंभित करने वाली बात पाठकों को यह लग सकती है कि इन बलों को केंद्र के अतिरिक्त सशस्त्र बलों की संज्ञा दी गयी है जिसका रहस्योद्घाटन आर.टी.आई. के माध्यम से भी किया जा सकता है। साथ ही सुरक्षा बलों के विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA)के अनुभाग-2 (क) के तहत इन बलों को केंद्र के अतिरिक्त सशस्त्र बल मानते हुए ये विशेष अधिकार दिए गए जिनमें जम्मू-कश्मीर व पूर्वोत्तर के कई राज्य शामिल हैं। पंजाब का आतंकवाद हो, कश्मीर की 1990 से अशांत वादियां हो,पूर्वोत्तर के सभी राज्यों का विद्रोह हो या फिर माओवाद और नक्सलवाद का खूनी संघर्ष हो,भारत-पाकिस्तान की रक्तरंजीत सीमा , भारत-बांग्लादेश, भारत-तिब्बत(चीन), भारत-नेपाल व भारत-भूटान की सीमा या फिर भारत-म्यांमार सीमा की रखवाली करने का पूर्णरूपेण ज़िम्मा इन अर्धसैनिक बलों का है।

अब भले ही आप इन्हें सी.आर.पी.एफ., बी.एस.एफ., आई.टी.बी.पी., एस.एस.बी., सी.आई.एस.एफ. या किसी और नाम से जानते हों या फिर नहीं। कुम्भ मेला, अमरनाथजी यात्रा या फिर लोकतंत्र का महोत्सव जो आम चुनाव के माध्यम से यह विशाल देश मनाता आया है, बिना इन सुरक्षा बलों के अभूतपूर्व योगदान के इतिहास में सफलता के प्रतिमान के तौर पर दर्ज नहीं हो पाते। भारत के विभिन्न विशेष महत्व के स्थान एयरपोर्ट, रेलवे यातायात,परमाणु संयंत्र,अंतरिक्ष संयंत्र, रिफाइनरीज़ व अन्य महत्वपूर्ण स्थान इनकी सुरक्षा में हैं। इतने पर भी बात रुकती तो ठीक था ये बल बाढ़, सूखा, भूकंप,इत्यादि किसी भी प्राकृतिक आपदा के समय आपको टी.वी. स्क्रीन पर सर पर,कंधों पर आम जनता को लादे मिल जाएंगे। यहां तक भी होता तो ठीक, कानून और न्याय व्यवस्था की धज़्ज़ियाँ उड़ती ही जा रही है और इन बलों को आये दिन जानवरों की भांति कभी गाड़ियों में तो कभी रेल की बोगियों में भरकर यहां से वहां फेंका जा रहा है। बलों का हाल इस प्रकार बयान किया जा सकता है कि साल में ढाई महीने की सरकारी देय छुट्टी भी उपभोग करने का समय नहीं है उल्टे गर्दन तक ज़िम्मेदारी का बोझ लादे ये कार्मिक भारतवर्ष के हर कोने में भटक रहे हैं। इन कार्मिकों से सहानुभूति कम और खिलवाड़ ज्यादा किया गया है। 6 दसक बीत जाने के बाद भी इन बलों को सामान्य सुविधाओं व पहचान के अभाव से गुजरना पड़ रहा है। वह भी तब जब आज इन बलों को कभी सी.बी.आई. कि रेड में सहयोग के लिए याद किया जाता है तो कभी डरी हुई व अपराध में संलिप्त अपराधी या बाहुबली के साथ खड़ी पुलिस व्यवस्था पीड़ित को सुरक्षा देने में असमर्थ साबित होती है। आश्चर्य यह भी है कि अपनी सड़ी-गली पुलिस व्यवस्था जो कि हिंदुस्तानियों का खून चूसने व अपना साम्राज्य अनंतकाल तक बनाये रखने की मंसा से अंग्रेजों ने शुरू की उसे आजतक पुनः सृजित क्यों नहीं किया गया अपितु उनके भ्रस्टाचार व नाकाबिलियत को प्रमाणपत्र देकर इन अर्धसैनिक बलों को उनके भी कामों का ज़िम्मा सौंप दिया गया। सिर्फ इतना भी होता तो शायद कम होता परंतु यह भी विसंगति जन्म दी गयी कि जिन लोगों व संस्थाओं की नकारेपन व असफलता पर इन्हें बुलाया गया वे ही राज्य में तैनाती के दौरान इनके करता-धर्ता व मार्गदर्शक की भूमिका में रहेंगे। इससे और ज्यादा हास्यस्पद और कुछ नहीं हो सकता था। एक और महान उपलब्धि यह है कि इन् बलों का चरित्र विषुद्ध तरीके से सशस्त्र होने के बावजूद इनमे उच्चपदों पर आयातित भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों को पदस्थ किया गया जोकि इन् बलों व राज्य पुलिस में बेहतर सामंजस्य रखने के नाम पर इन् बलों में प्रतिनियुक्तियों पर आते रहे। इस योजना का लाभ यह हुआ कि सालों अपने राज्य पुलिस के कार्यकाल में जरूरत से कहीं उत्कृष्ट सेवाएं जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारी पुलिस व्यवस्था है देने के उपरांत ये विशिष्ट वर्ग के अधिकारीगण इन बलों में थकान मिटाने व विशेष सेवाएं देने आते रहे जिसका मुख्य फायदा यह हुआ कि समय भी अच्छा गुज़रा और कोई खास जिम्मेदारी भी नहीं लेनी पड़ी। बड़ी से बड़ी घटना में भी ये अफसर "एस0ओ0पी0 का उल्लंघन बताकर" क्षणभर में समस्या को खत्म कर देने की योग्यता रखते हैं। यहाँ इन बातों को इंगित करने का ध्येय ये बताना बिल्कुल नहीं है की पूर्व के किसी प्रतिनियुक्ति पर अधिकार ने कुछ नहीं किया अपितु यह जरूर है कि वह इन बलों की नब्ज़ को छूने में असफल रहे हैं।

यहां यह भी बताना आवश्यक होगा कि इन्ही बलों में अपने अधिकारी भर्ती करने का भी प्रावधान है परंतु उनके पदोन्नति के सीमित क्षेत्र है कारण की विशिष्ट वर्ग व सेवा के अतियोग्य अधिकारी जिन्होंने कभी इन बलों के आखरी व्यक्ति की दिनचर्या नहीं देखी,कभी अपने साथियों के साथ जमीन पर जंगल मे नहीं सोये और नाहीं कभी गोलियों की गड़गड़ाहट में सहमे हुए अपने साथी को ये हौसला दिया कि हम सब सही सलामत घर लौटेंगे,उनको प्रतिनियुक्ति के पर्याप्त मौके मिलने चाहिए। ऐसा ही एक चर्चित प्रकरण आप सभी के इर्दगिर्द चल रहा है जिसमे पहली बार इन बलों को देश की न्याय व्यवस्था के सिरमौर माननीय उच्छतम न्यायालय ने संगठित सेवा का दर्जा देते हुए उससे संबंधित सभी लाभ इन बलों के अधिकारियों के लिए देय किये। सरकार भी सालों न्यायालय में वरिष्ठ अधिकारियों के एक समूह के साथ इन् बलों के विपक्ष लड़ते हुए केस को हार गई उसके उपरांत संगठित सेवा व उससे संबंधित लाभ देने की घोषणा कर दी। अपने स्वाभिमान को सर उठाकर आकाश की तरफ उत्कर्ष करते देख बल के सभी अधिकारी सालों से चली आरही न्यायिक लड़ाई की खटास को भी भूल गए। भूल गए यही सरकार और यही वरिष्ठ अधिकारियों का संगठन इनके विपक्ष में पिछले सात वर्षों से न्यायालय में लड़ रहे थे। तदोपरांत भी व्यवस्था में दबी हुई साम्राज्यवादी सोच के कीटाणु अपना दम तोड़ने को तैयार नहीं,जो उनका नहीं उसपर अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं,तो मुझे भी आज यह कहते कोई संकोच नहीं कि इन् बलों की इस दशा, जिसमे निचले से निचले कार्मिकों के सामान्य जीवन संबंधी हालात हो या फिर परिचालन में उठाये गए नुकसान के कारण बल के कार्मिकों की हतास मनोदशा हो, इनके लिए यह वरिष्ठ पदों पर पदस्थ हमारे नर के रूप में व्यवस्था में नारायण बने अवतारों को मुख्य ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए और इनकी जिम्मेदारी है। जो कुछ अच्छा या लाभदायक सरकार द्वारा या माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा जारी आदेश के माध्यम से किया जा रहा है उसमें अपनी साम्राज्यवादी सोच के वसीभूत हो जो अड़चने इस समूह द्वारा डाली जा रही हैं उनसे आपने इन बलों के कार्मिकों की नज़रों में अपनी बची हुई इज़्ज़त भी ख़ाक में मिला दी है। अंततः यही सत्य है कि हार तो आप सब चुके हैं अब इंतज़ार है विनम्रतापूर्वक आपके द्वारा अपनी हार स्वीकार किये जाने का और सही उत्तराधिकारियों को उनका अधिकार सौंप अपनी सच्चे कर्तव्यों का पालन करने जोकि आपका इंतेज़ार कहीं और संभवतः आपके महकमें में कर रहे हैं। यकीन मानिए इतना पानी बह जाने के बाद भी आपके ऐसा करने पर इन् बलों की महान परंपराओं के अनुरूप आपको आदर ही समर्पित किया जाएगा।

(लेखक केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल में सहायक कमांडेंट हैं व राष्ट्रपति द्वारा पुलिस वीरता चक्र से सम्मानित किए जा चुके हैं।)

Updated : 8 Sep 2019 11:06 AM GMT
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