कृष्णा सोबती : मर के भी हमेशा रहेंगी ‘मित्रो’ के दिल में

कृष्णा सोबती : मर के भी हमेशा रहेंगी ‘मित्रो’ के दिल में

नई दिल्ली (उदय सर्वोदय डेस्क) : प्रसिद्ध साहित्यकार और ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित कृष्णा सोबती का शुक्रवार को निधन हो गया. 18 फरवरी 1925 को वर्तमान पाकिस्तान के एक कस्बे में सोबती का जन्म हुआ था. उन्होंने अपनी रचनाओं में महिला सशक्तिकरण और स्त्री जीवन की जटिलताओं का जिक्र किया था. सोबती को राजनीति-सामाजिक मुद्दों पर अपनी मुखर राय के लिए भी जाना जाता है.

उनके उपन्यास मित्रो मरजानी को हिंदी साहित्य में महिला मन के अनुसार लिखी गई बोल्ड रचनाओं में गिना जाता है. 2015 में देश में असहिष्णुता के माहौल से नाराज होकर उन्होंने अपना साहित्य अकादमी अवॉर्ड वापस लौटा दिया था. उनके एक और उपन्यास “जिंदगीनामा” को हिंदी साहित्य की कालजयी रचनाओं में से माना जाता है. उन्हें पद्म भूषण की भी पेशकश की गई थी, लेकिन उसे उन्होंने ठुकरा दिया था. एक नजर उनके रचना संसार पर…

कहानी संग्रह : बादलों के घेरे (1980)

लम्बी कहानी (आख्यायिका/उपन्यासिका) : डार से बिछुड़ी (1958), मित्रो मरजानी (1967), यारों के यार (1968), तिन पहाड़ (1968), ऐ लड़की (1991), जैनी मेहरबान सिंह (2007) (चल-चित्रीय पटकथा; ‘मित्रो मरजानी’ की रचना के बाद ही रचित, परन्तु चार दशक बाद 2007 में प्रकाशित)

उपन्यास : सूरजमुखी अँधेरे के (1972), ज़िन्दगी़नामा (1979), दिलोदानिश (1993), समय सरगम (2000), गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान (2017) (निजी जीवन को स्पर्श करती औपन्यासिक रचना)

विचार-संवाद-संस्मरण : हम हशमत (तीन भागों में), सोबती एक सोहबत, शब्दों के आलोक में, सोबती वैद संवाद, मुक्तिबोध : एक व्यक्तित्व सही की तलाश में (2017), लेखक का जनतंत्र (2018), मार्फ़त दिल्ली (2018)

यात्रा-आख्यान : बुद्ध का कमण्डल : लद्दाख़

Ravi Prakash

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