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जिंदगी तमाशा है लोग तमाशाई

जिंदगी तमाशा है लोग तमाशाई
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नई दिल्ली से ¦ जीनत सिद्दीकीबुराड़ी में एक युवक ने जिस तरह दिनदहाड़े बीच सड़क कैंची से ताबड़तोड़ वार कर एक लड़की की हत्या कर दी, उससे यही लगता है कि हमारी इंसानियत वाकई कहीं खो गई है। ताजुब्ब होता है कि कोई लड़की मार रहा है और लोग उसे बचाने के बजाय बच कर निकल जाते हैं।


पूर्वोत्तर दिल्ली के पुराने और रईस इलाके मॉडल टाउन से कुछ ही दूरी पर बसा विधानसभा क्षेत्र है बुराड़ी। ठीक-ठाक आबादी, बेहतरीन सड़कें, कोई दूर-दराज का देहात नहीं, जिसके बारे में लोग जानते न हों लेकिन इस बुराड़ी में जो हुआ उसकी कल्पना कर लेने भर से रूह कांप उठती है। मन कचोटता है, बेबसी महसूस होती है, तड़प होती है, घिन आती है, गुस्सा आता है, रोना आता है, एक पल के लिए सांस रुक जाती है। यकीन और सब्र नहीं होता।21 साल की लड़की की जिस निर्मम तरीके से हत्या की गई, उसने समाज के गिरते चरित्र का एक वीभत्स और डरावना उदाहरण हमारे सामने पेश किया है। जो भी उस सड़क पर हो रहा था वो कोई सिनेमा का सीन नहीं था कि देखा, एंजॉय किया और चलते बने। वहां कोई जानवरों की लड़ाई नहीं चल रही थी (अच्छे, नेक और सभ्य लोग तो जानवरों की लड़ाई को भी छुड़ाने की कोशिश करते हैं लेकिन लगता है सीसीटीवी कैमरा जिन लोगों को उस सड़क से उस पल गुजरते दिखा रहा है वे इंसान जैसे दिखते जरूर हैं मगर हैं यह मैं नहीं कह सकती!) वहां एक जीती जागती होनहार अध्यापिका की जान ली जा रही थी। हैरानी की बात यह है कि मारने वाला शख्स कोई फन्ने खान नहीं था, न ही वह कोई बाहुबली किस्म का कोई बड़ा ताकतवर शख्स था। वह एक साधारण इंसान था जिसके हाथ में एक कैंची थी जिससे वो लड़की पर वार पर वार किए जा रहा था, उसे गोदता जा रहा था किसी रूई की गठरी की तरह।यहां दिल्ली के निर्भया गैंग रेपकांड की तरह लोग यह नहीं कह सकते कि अजी जो हुआ वो बस में हुआ और पता नहीं चल सका। बुराड़ी की सड़कों पर जो हो रहा था, वो तो सरेआम था, सरेराह था। अगर लोग चाहते तो हमला करने वाले को रोक सकते थे। लड़की पर एक-दो नहीं, 24 से ज्यादा वार किए गए, लेकिन किसी ने भी उसे बचाने की कोशिश नहीं की। अंतत: कुछ का जमीर जागा और उन्होंने उस वहशी इंसान को पकड़ लिया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। लड़की दम तोड़ चुकी थी या बस उसके कगार पर थी। बुराड़ी की घटना से अगर कोई शर्मसार है तो वो है वह सड़क, जिसके कलेजे पर एक मासूम को छलनी किया गया, जिसके कलेजे पर एक मासूम ने लहुलुहान होकर दम तोड़ दिया। वो शर्मसार है कि उसके सीने पर एक मासूम की सांसे थम गर्इं, वो शर्मिदा रहेगी कि उसके सीने पर वे दहशत के दाग हमेशा मौजूद रहेंगे। वह तो शर्मिदा इस बात से भी है कि उसके सीने से होकर कायर लोग अपने सफर को पूरा करते हैं वही लोग जो तमाशबीन हैं। हां, कोई और भी शर्मिदा है तो वो कैमरा जिसके अंदर ये बर्बरता कैद हुई और वो चाह कर भी कुछ नहीं कर पाया।हमारा दोगला, कायर और तमाशबीन समाज बहुत कुछ कर सकता था, लेकिन उसने नहीं किया। दो दर्जन से ज्यादा लोग उस सड़क से गुजर गए मगर हमले के वक्त किसी को अपने इंसान होने का ख्याल न आया। ये वही समाज है, जिसके सामने दिल्ली में गैंगरेप के बाद एक लड़की को नंगा करके जख्मी हालत में सड़क पर फेंक दिया गया था। लोगों ने बाद में कहा कि उस समय रात का अंधेरा था, नहीं तो वह उसे बचा लेते, लेकिन बुराड़ी की घटना के बारे में वे क्या कहेंगे? दरअसल ये तमाशाई हैं और इससे ज्यादा कुछ नहीं।यमुनानगर में एक शख्स को दिनदहाड़े पेचकस से घायल कर दिया जाता है। वह लड़खड़ाता हुआ अस्पताल जाता है लेकिन उसका इलाज नहीं किया जाता। खून ज्यादा बह जाने की वजह से उसकी मौत हो जाती है, लेकिन ये समाज तब भी तमाशाई ही बना रहता है। चंडीगढ़ में एक नाबालिग पर सरे बाजार हथियारों से वार होता है, वो मौके पर ही दम तोड़ देता है, ये फिर भी तमाशाई ही बना रहता है। बिहार में गाड़ी ओवरटेक कर लेने भर से 19 साल के लड़के को मार दिया जाता है, लेकिन ये तब भी तमाशाई बना रहता है और इस बार भी ये तमाशाई ही बना रहा। फितरत जो है। कहते हैं कि फितरत कभी नहीं बदलती। निजामी कानपुरी साहब का शेर है-साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर,अफसोस तो करते हैं, इम्दाद नहीं करतेसमाज की फितरत में ही कायरता है। यह वही समाज है जो हवाई बातों के बड़े-बड़े गुब्बारे छोड़ता है, नुक्ता-चीनी करता है, ज्ञान बघारता है, सिस्टम व सरकार को कोसते नहीं थकता, मामूली-मामूली बातों पर अपना ईमान खराब कर लेता है।वैसे एक हकीकत ये भी है कि ‘तमाशाई लोग खुद तमाशा भी बन जाते हैं’ और हकीकत ये भी है कि यह हमारे समाज का सबसे गिरता स्तर है और यकीन मानिए हालात और बद से बदतर होने वाले हैं।‘पिंक’ फिल्म एक स्त्री के न कहने के इसी हक को ही तो रेखांकित करती है- ‘न सुनने की आदत डालनी होगी।’ लड़की को उस जुनूनी ने बेदर्दी से इसलिए मारा क्योंकि उसने उसके प्यार के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था यानी न कह दिया था। उसने न कहा था उसके साथ कोई रिश्ता गांठने के लिए, उसने न कहा था उसके झूठे गुरूर को, झूठी शान को, मोहब्बत के नाम पर जाहिर की गई हवस को। उसे हक था न कहने का (जैसे सबको है) लेकिन जैसी कि हकीकत है कि हमारे दोगले समाज को न सुनने की आदत नहीं हैं। दरअसल इसके लिए मां-बाप की परवरिश, समाज का ताना-बाना हमारा मर्दाना सिस्टम सब जिम्मेदार हैं, जो हमेशा लड़की को भोग्या की नजर से ही देखता है। इस घटना में भी एक ‘न’ ही तो कहा था लड़की ने और उसकी सजा मिली मौत, वो भी बेरहमी और बर्बरता से भरी।अब बात जरा हमारे सियासतदानों की भी कर लेते हैं। आप को क्या लगता है? क्या होगा? राज्य सरकार केंद्र सरकार को कोसेगी, केंद्र राज्य को, दिल्ली पुलिस को कोसा जाएगा, महिला आयोग अपनी बेबसी दिखाएगा, लेकिन किसी में इतनी गैरत नहीं होगी कि अपनी जिम्मेदारी कबूल कर ले और निभाए। वैसे मुझे बहुत अच्छी तरह याद है कि निर्भया गैंगरेप की घटना के दौरान जब देश इंडिया गेट पर इंसाफ की गुहार लगा रहा था तब अपने आपको कत्ल हुई इस अध्यापिका जैसे आम लोगों का नेता कहने वाले अरविंद केजरीवाल लाव-लश्कर के साथ इंडिया गेट पर पहुंचे थे, निर्भया के लिए इंसाफ मांगने। तब बीजेपी के भी कई बड़े नेता चल दिए थे हालातों को कैश करने लेकिन बदला कुछ नहीं क्योंकि हमारे सियासतदानों के दिमाग को वोट बैंक की दीमक लग गई है। उन्हें दर्द उसी घटना से होता है जब कहीं मुनाफा दिखता है और यही रहा तो तस्वीर कभी नहीं बदलेगी।आरोपी को सजा हो जाएगी, लेकिन उससे क्या होगा? क्या वो अध्यापिका हमारे बीच वापस आ पाएगी? क्या वो दर्द खत्म हो जाएगा जो उस मासूम ने सहा? क्या वो सड़क अपने आप को शर्मसार महसूस नहीं करेगी जिसका कलेजा छलनी हुआ? क्या वो कैमरा खुद को कोसना बंद कर देगा कि सब-कुछ देखते हुए भी वह बेजान कुछ नहीं कर पाया? क्या वो दहशत जो वहां फैली है खत्म हो जाएगी?खालिद मलिक साहिल साहब के एक शेर के साथ जवाब आप पर छोड़ती हूं, एक बार इंसान होने के नाते कलेजे पर हाथ रख कर सोचिएगा जरूर...मैं तमाशा हूं तमाशाई हैं चारों जानिबशर्म है शर्म के मारे नहीं रो सकता मैं।

Updated : 1 Oct 2016 2:43 PM GMT
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