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रौशनी चराग़ों की

रौशनी चराग़ों की
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हिंदुस्तान के मुख्तलिफ़ पाकीज़ा-तर त्यौहारों में से एक है दिवाली. यह त्यौहार रौशनी का त्यौहार है. अंधेरे के खिलाफ इंसानियत की एक ईमानदार कोशिश का बायस. दिवाली में दिये तो रौशन होते ही हैं, दिल भी रौशन हो जाते हैं. इंसान गिले-शिकवे भूल इंसानियत और भाईचारे की रौशनी फैलाता है. तमाम शायरों ने अपनी शायरी में इस त्यौहार की पाकीज़ा रौशनी को बड़े सलीके से समेटा है. यहां पेश है ऐसी ही शायरी के कुछ जलते हुए चराग.हर इक मकां में जला फिर दिया दिवाली का,हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का.-नजीर अकबराबादीहम को तो मयस्सर नहीं मिट्टी का दिया भी,घर पीर का बिजली के चराग़ों से है रौशन.-अल्लामा इकबालआज की रात दिवाली है दिये रौशन हैं,आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूं.-अज़्म शाकरीजहां रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा,किसी चराग़ का अपना मकां नहीं होता.-वसीम बरेलवीदिया खामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है,चले आओ जहां तक रौशनी मालूम होती है.-नुशूर वाहिदीइन चराग़ों में तेल ही कम था,क्यूं गिला फिर हमें हवा से रहे.-जावेद अख़्तरशब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को,खुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का.-दाग देहलवीअभी तो जाग रहे हैं चराग़ राहों के,अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो.-अहमद फ़राज़ये कहके उसने गुल किया शम-ए-मज़ार को,जब सो गए तो क्या है ज़रूरत चराग़ की.-अब्दुल अजीज़ अम्बरबीस बरस से इक तारे पर मन की जोत जगाता हूं,दीवाली की रात को तू भी कोई दिया जलाया कर.-माजिद-अल-बाक़रीहोने दो चराग़ां महलों में क्या हम को अगर दीवाली है,मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम मज़दूर की दुनिया काली है.-जमील मज़हरीजो सुनते हैं कि तिरे शहर में दसहरा है,हम अपने घर में दिवाली सजाने लगते हैं.-जमुना प्रसाद राहीखिड़कियों से झांकती है रौशनी,बत्तियां जलती हैं घर-घर रात में.-मोहम्मद अलवीमेले में गर नज़र न आता रूप किसी मतवाली का,फीका फीका रह जाता त्यौहार भी इस दिवाली का.-मुमताज़ गुर्मानीराहों में जान घर में चराग़ों से शान है,दीपावली से आज ज़मीन आसमान है.-ओबैद आज़म आज़मीसभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या,उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या.-हफ़ीज़ बनारसीथा इंतिज़ार मनाएंगे मिल के दिवाली,न तुम ही लौट के आए न वक्त-ए-शाम हुआ.-आनिस मुईनअंधेरी रात को मैं रोज़-ए-इश्क़ समझा था,चराग़ तू ने जलाया तो दिल बुझा मेरा.-अब्दुल रहमान एहसान देहलवीइस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं,आने वाले बरसों बाद भी आते हैं.-ज़ेहरा निगाह

Updated : 16 Nov 2018 5:01 AM GMT
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