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खुद को दिल्ली का सबसे यारबाज और दिलफेंक बूढ़ा मानते थे खुशवंत सिंह

भारतीय साहित्य में जब कभी भी बेबाक और बिंदास शख्सियत का जिक्र होता है, वहां खुशवंत सिंह का नाम जरूर लिया जाता है।

खुद को दिल्ली का सबसे यारबाज और दिलफेंक बूढ़ा मानते थे खुशवंत सिंह
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विराज रंजन

जन्मदिन विशेष: भारतीय साहित्य में जब कभी भी बेबाक और बिंदास शख्सियत का जिक्र होता है, वहां खुशवंत सिंह का नाम जरूर लिया जाता है। प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार और इतिहासकार खुशवंत सिंह जीवनभर अपनी शर्तों पर चलते रहे। उन्होने कभी भी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। वह खुद को धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक सिख मानते हैं। यही वजह है कि वह एक तरफ तो खालिस्तान के पैरोकारों की सख्त आलोचना करते हैं तो दूसरी तरफ स्वर्ण मंदिर पर सेना की कार्यवाही का विरोध भी।

1974 में भारत के राष्ट्रपति ने खुशवंत सिंह को 'पद्म भूषण' के अलंकरण से सम्मानित किया था, लेकिन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में केन्द्र सरकार की आज्ञा से सेना की कार्यवाही के विरोध में उन्होंने 1984 में उसे लौटा दिया था।

खुशवंत सिंह का जन्म 2 फरवरी, 1915 को पंजाब के हदाली नामक स्थान (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनकी शिक्षा गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, लंदन में हुई। उन्होंने लंदन से ही कानून की डिग्री ली, उसके बाद तक लाहौर में वकालत करते रहे। उन्होंने 'ट्रेन टू पाकिस्तान' और 'कंपनी ऑफ वूमन' जैसी बेस्ट सेलर किताब दी हैं। खुशवंत ने करीब 80 किताबें लिखीं। खुशवंत 1980 से 1986 तक सांसद भी रहे हैं।

सन 2000 में खुशवंत सिंह को 'वर्ष का ईमानदार व्यक्ति' सम्मान मिला था। 2007 में इन्हें 'पद्म विभूषण' से भी सम्मानित किया गया। मुंबई साहित्य उत्सव 2013 में खुशवंत सिंह को 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित किया गया।

लेखन और भाषा शैली से आम आदमी को जोड़ने की जो क्षमता खुशवंत सिंह के पास थी, वो अंग्रेजी के किसी भी उनके समकालीन लेखक के पास नहीं थी। उन्होंने अपने लेखन और कॉलम में बड़े ही सहजता के साथ आम आदमी के साथ संवाद स्थापित किया। वह 'योजना' के फाउंडर एडिटर और 'इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया', नेशनल हेराल्ड और हिंदुस्तान टाइम्स के एडिटर रहे हैं।

अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। वह 99 साल की उम्र तक भी सुबह चार बजे उठ कर लिखना पंसद करते थे। उन्हें नेचर से बेहद प्यार था...अक्सकर वो घंटों बगीचे में बैठे रहते थे। 2002 में उनकी ऑटोबायोग्राफी 'ट्रुथ, लव एंड अ लिटिल मैलिस' छपकर आई थी। 95 साल की उम्र में उन्होंने 'द सनसेट क्लब' नॉवेल लिखा था। उन्हें तीन चीजों से बेहद प्यार था- पहला दिल्ली, दूसरा लेखन और तीसरा खूबसूरत महिलाएं। वो खुद को दिल्ली का सबसे यारबाज और दिलफेंक बूढ़ा मानते थे।

20 मार्च, 2014 में ह्रदयगति रुक जाने के कारण खुशवंत सिंह का 99 साल की उम्र में निधन हो गया था।

Updated : 2 Feb 2021 9:10 AM GMT
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