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सुबह की गज़ब सैर का अजब दर्शन

सुबह का अलार्म उनके लिए उतना ही ज़रूरी है जितना किसी लेखक के लिए आलोचक, क्योंकि दोनों ही इसके बिना सुप्तावस्था में रहते हैं।

सुबह की गज़ब सैर का अजब दर्शन
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(व्यंग्य)

अलंकार रस्तोगी

सुबह का अलार्म उनके लिए उतना ही ज़रूरी है जितना किसी लेखक के लिए आलोचक, क्योंकि दोनों ही इसके बिना सुप्तावस्था में रहते हैं। इसलिए उन्होंने अब उस नींद से जागने का फैसला कर लिया है जो उन्हें फिट के साथ हिट भी बनाएगी। उन्होंने न चाहते हुए भी हमेशा की तरह इस बार भी सुबह पांच बजे का अलार्म लगाया। कुछ दिनों तक तो अलार्म की आवाज़ उन्हें किसी आपदा से कम नही लगी । लेकिन समय के साथ ढोलक को भी थाप झेलने की आदत पड़ जाती है। उनकी भी पड़ गयी थी। अलार्म ने उन्हें आज उस मीठी नींद से जगाया जो उन्हें बड़ी मुश्किल से आई थी। वह नींद से उठ तो गए लेकिन उन्हें इस बात का मलाल था कि वह नींद जो न जाने कितने लोगों को दवाइयाँ खाने के बाद आ पाती है। उन्हें लगा कि ज़ल्दी उठकर वह उसी नींद की भ्रूण हत्या करने का प्रयास कर रहे हैं।

नित्यकर्म करने के बाद वह सुबह की सैर को उसी तरह कूच कर गए जैसे सिकंदर अपने विजयी अभियान पर निकला हो। सुबह उठकर वह जनाब अपने ऊपर असीम गर्व की अनुभूति कर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि इस माया रूपी संसार में मात्र वही इकलौते प्राणी है जिन्हें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना आता है। हालांकि इसमें शर्ते लागू होती हैं यह दर्शन वह उस दिन नही लागू करते हैं जिस दिन वह सैर को नही जा पाते है। खैर उस दिन उन्होंने पूरे पांच किलोमीटर का लक्ष्य तय किया। उन्होंने सुन रखा था कि लक्ष्य हमेशा बड़े रखने चाहिए। कलाम साहब ने भी कहा था कि सूरज बनने का लक्ष्य रखो तो एक तारा तो बन ही जाओगे। तो उस पंच किलोमीटरीय योजना के अन्तर्गत वह कम से कम दो किलोमीटर का लक्ष्य अवश्य पा लेने का जुगाड़ लगाए हुए थे।

सैर के दौरान वह उन लोगों को लानत भेजना नही भूलते जो उनकी स्पीड के आगे समर्पण करते हुए दिखाई देते है। इसके साथ ही वह उन लोगों को मानसिक रूप से हटे हुए की संज्ञा देने से भी नही चूकते जो उनकी स्पीड को ओवर टेक करते हुए आगे निकल जाते हैं। वह अपनी स्पीड के मामले में फ्लेक्सिबल हैं । मौका और दस्तूर देखकर वह अपनी गति नियंत्रित कर लेते हैं। यदि कोई विपरीत लिंगी उनको स्पर्धा दे रहा होता है तो वह अपनी स्पीड कम कर उसे ससम्मान आगे जाने का मौका दे देते हैं। और अगर कहीं कोई पुरुष उन्हें पीछे से हार्न देकर आगे निकलने का प्रयास करता है तो मजाल है कि वह उसे आगे निकल जाने दें। अब यह प्रक्रिया उनका स्त्री सशक्तिकरण का प्रयास होता है या उनका मंतव्य कुछ और ही होता है यह शोध का विषय है।

किसी दिन उनकी सुबह की सैर में अगर कोई साथी मिल जाये जिसे वह स्पीड में पछाड़ नही पाते हैं तो उसे वह अपनी बातों से पछाड़ देते हैं। राजनीति के वह पैनल स्पेशलिस्ट है। किसी पार्टी प्रवक्ता की तरह वह लगभग मुंह नोचने के स्तर तक जाकर उसे स्तरहीन कर देते हैं। इस तरह सुबह की सैर को वह बहुउद्देश्यीय बनाकर फिट इंडिया मूमेंट को गति प्रदान करते हैं।

Updated : 21 Oct 2020 12:14 PM GMT
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