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इंसानियत और मुहब्बत के मैकेनिक शरीफ चचा

इंसानियत और मुहब्बत के मैकेनिक शरीफ चचा
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कृष्ण कांत

इंसानियत को कुचलने के लिए भीड़ की जरूरत है। इंसानियत को बचाने के लिए आपको अकेले चलनाहोता है। भीड़ आपको अकेला छोड़ देती है। अकेले पड़ने के बाद आप जो करते हैं,उसी से आपकी शख्सियत तय होती है।

फरवरी,1992... अयोध्या का मोहल्ला खिड़की अली बेग। यहां रहने वाले मोहम्मदशरीफ का बेटा रईस सुल्तानपुर गया था। वह दवाएं बेचने का काम करता था। रईस गया तोलेकिन वापस नहीं लौटा। शरीफ चचा अपने बेटे को एक महीने तक ढूंढते रहे। एक दिनपुलिस ने उन्हें उनके बेटे के कपड़े लौटाए। साथ में यह खबर भी दी कि उनका बेटामारा जा चुका है। उसकी लाश सड़ गई थी, जिसका निपटान कर दिया गया है।

शरीफ चचा के पैरोंतले जमीन खिसक गई। उनके मन में टीस रह गई कि वे अपने बेटे का ढंग से अंतिम संस्कारभी नहीं कर पाए। यह सोच कर बेटे का दुख और बढ़ गया कि जिस बेटे का बाप जिंदा है,उसकी लाश लावारिस पड़ी रहे और मिट्टी न नसीबहो!

एक दिन उन्होंनेदेखा कि कुछ पुलिस वाले नदी में एक लाश फेंक रहे हैं। शरीफ चचा को बेटे की याद आई।'इसी तरह उन्होंने मेरेबेटे की लाश भी नदी में फेंक दी होगी'।

इसी रोज शरीफ चचाने प्रण किया कि 'आज से मैं किसीलाश को लावारिश नहीं होने दूंगा। मेरे बेटे को मिट्टी नसीब नहीं हुई, पर मैं किसी और के साथ ऐसा नहीं होने दूंगा'। यहां से जोसिलसिला शुरू हुआ, उसने मानवता कीबेहद खूबसूरत कहानी लिखी। शरीफ तबसे चुपचाप तमाम हिंदुओं और मुसलमानों को कंधा देरहे हैं।

शरीफ चचा पेशे सेसाइकिल मैकेनिक थे, लेकिन वेइंसानियत और मुहब्बत के मैकेनिक बन बैठे। उस दिन से अस्पतालों में, सड़कों पर, थाने में, मेले में... जहां कहीं कोई लावारिस लाश पाई जाती, शरीफ चचा के हवाले कर दी जाती है। वे उसे अपनेकंधे पर उठाते हैं, नहलाते-धुलातेहैं और बाइज्जत उसे धरती मां के हवाले कर देते हैं। मरने वाला हिंदू है तो हिंदूरीति से, मरने वाला मुस्लिम है तोमुस्लिम रीति से।

शरीफ चचा पिछले 28 सालों से लावारिसों मुर्दों के मसीहा बने हुएहैं और अब तक करीब 25000 लाशों कोसुपुर्द-ए-खाक कर चुके हैं।

शरीफ चचा ने कभीकिसी लावारिस के साथ कोई भेदभाव नहीं किया। उन्होंने जितने लोगों का अंतिम संस्कारकिया, उनमें हिंदुओं की संख्याज्यादा है। उन्होंने हमेशा सुनिश्चित किया कि मरने वाले को उसके धर्म और परंपरा केमुताबिक पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाए।

शरीफ चचा का कहनाहै कि दुनिया में न कोई हिंदू होता है, न कोई मुसलमान होता है, इंसान बस इंसानहोता है। वे कहते हैं कि 'हर मनुष्य का खूनएक जैसा होता है, मैं मनुष्यों केबीच खून के इस रिश्ते में आस्था रखता हूं। इसी वजह से मैं जब तक जिंदा हूं। किसीभी इंसान के शरीर को कुत्तों के लिए या अस्पताल में सड़ने नहीं दूंगा'।

शरीफ चचा भीबरसों से अकेले ही चले जा रहे हैं। उनके आसपास के लोगों ने उनसे दूरी बना ली,लोग उनके पास आने से घबराने लगे। लोग उन्हेंछूने से बचने लगे, लोगों नेकरीब-करीब उनका बहिष्कार कर दिया। परिवार ने कहा तुम पागल हो गए हो। शरीफ चचा नेहार नहीं मानी।

इस साल भारतसरकार ने उन्हें ‘पद्म श्री’ पुरस्कार से नवाजा है। ऐसे समय में जब राजसिंहासन जहरउगलता घूम रहा है, आपको शरीफ चचा केबारे में जानने और वैसी इंसानियत को अपने अंदर उतारने की जरूरत है। जब नफरत कीराजनीति अपने उरूज पर है, शरीफ चचा लावारिसहिंदुओं और मुसलमानों को समान भाव से कंधा दे रहे हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Updated : 14 Sep 2020 5:14 AM GMT
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