Top
Home > शख्सियत > मुन्ना सिंह... भोजपुरी लोक का निर्विकार कर्मयोगी साधक

मुन्ना सिंह... भोजपुरी लोक का निर्विकार कर्मयोगी साधक

मुन्ना सिंह... भोजपुरी लोक का निर्विकार कर्मयोगी साधक
X

देवेंद्र सिंह

साल 2020 पूरे विश्व के लिए एक दुखद और त्रासदी कासाल है। केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए लॉकडाउन का पालन करते हुए मैं भी घर पर था। मुझे याद है 23 अप्रैल को सुबह-सुबह(वीर कुंवर सिंह जयंती के दिन) मैंने पास के घर से एक गाने की आवाज़ सुनी- ‘खउ लत खून बहे नस नस में देख के गुलामी...’, ये गाना सुनकरमुझे एक सुखद आश्चर्य हुआ, क्योंकि जोधारणा मेरे मन में भोजपुरी गानों के लिए बनी थी, ये गाना उस धारणा के बिल्कुल विपरीत था।

गाना खत्म होतेही मैंने इस गाने को यूटयूब पर सर्च किया और कई बार सुना, फिर गायक के बारे में भी उत्सुकता हुई। गायक का नाम मिलामुन्ना सिंह। इनके बारे में मैंने पहले से भी अपने दोस्तों और रिश्तदारों से सुनरखा था, मुझे इनके बारे में और भीजानने की इच्छा हुई।

आज भोजपुरी भाषी प्रवासी मजदूरों का पलायन होता है तो वो अपने पीछे अपना परिवार छोड़कर जाते हैं। इस बहुत बड़े अपेक्षाकृत अशिक्षित समुदाय की दमित इच्छाओं, जुगुप्साओं और यौन कुंठाओं को अमर्यादित भाषा के साथ कुरेदकर जल्द और सस्ती लोप्रियता हासिल करने की दौड़ में मुन्ना सिंह जैसे गायकों की उपस्थिति भोजपुरी भाषा और संगीत के बेहतर भविष्य की उम्मीद है। उनका गायन जेठ की गर्मी के बाद सूखी धरती पर पहली बारिश के गिरने से आती मिट्टी की सोंधी सुगंध है।

चार दशकों से भी अधिक गायन का अनुभव, जिसने भक्ति, प्रणय, चुहल, वीरता, देशप्रेम, सामाजिक समस्याएंऔर भी ना जाने कितने आयाम समेटे हुए मितभाषी और मृदुभाषी मुन्ना सिंह ने भोजपुरीसंगीत को बाल्यावस्था से तरुण होते देखा है। गांव-गांव घूमकर पारंपरिक संगीत से जनको आह्लादित करने के युग से शुरू करके, कैसेट के दौर, फिर सीडी औरडीवीडी का युग और जब डेढ़ जीबी रोज़ के डाटा के दौर में संगीत यूटयूब पर उपलब्ध है,हर युग के साक्षी रहे हैं मुन्ना सिंह।

जब नए-पुरानेसारे गायकों के लिए सफलता तक पहुंचने के लिए कठोर श्रम पुराने दौर की बात हो गई है,और सफलता के लिए बने बनाए फार्मूले पर सब चलनेलगे, तब भी मुन्ना सिंह संगीतको साधना मात्र मानते हैं।

एक शिक्षित और अनुशासित परिवार से आने वाले मुन्ना सिंह के लिए यह कभी भी आसान नहीं था कि वो संगीत को ध्येय बनाते। उनके परिवार में सभी कमोबेश नौकरीपेशा थे और संगीत को 'गाना-बजाना' समझा जाता था, उस दौर में संगीत के लिए परिवार का सामना करना एक क्रांतिकारी कदम ही था। तमाम दुश्वारियों को दरकिनार करते हुए उन्होंने देवलधारी सिंह (मास्टर जी) के सानिध्य और संरक्षण में किया। फिर हर कदम पर अपनी कला और समर्पण से आगे बढ़ते गए।

भोजपुरी संगीत के स्वर्णिम युग में वो बचन मिश्रा, देवेंद्र सिंह, नथुनी सिंह जैसे दिग्गज गायकों के साथ संगत को बहुत याद करते हैं। यदि उनके संगीत और इतिहास को देखें तो एक क्रांतिकारी दीखते हैं। जिस भोजपुरी समाज में पौरुष को लेकर एक आग्रह है, और तथाकथित श्रेष्ठता का एक बोध भी, उस समाज और संस्कृति में भी संगीत को मुन्ना सिंह ने सभी लैंगिकताओं से ऊपर रखा। वो भोजपुरी संगीत में सोहर गाने वाले पहले पुरुष थे। यह एक नवीन प्रयोग था जिसका खतरा मुन्ना जी ने उठाया।

अपनी कला केमाध्यम से कमोबेश अपने सारे स्टेज शो में भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में स्थानदिलवाने की बात करने वाले मुन्ना सिंह जी एक आंदोलनकारी भी हैं और उनकी राजनीतिक समझ और संघर्षशीलता उन्हें अंतर्राष्ट्रीयगायक बॉब डिलन के साथ खड़ा करती है।

आज जब भोजपुरीसंगीत को अश्लीलता का पर्याय माना जाता है और इस पर जब प्रतिक्रिया मांगी जाती हैतो एक दर्द उनकेचेहरे पर तैर जाता है। रुंधे गले से कहते हैं, सब इसी सृष्टि का हिस्सा है, अमृत और विष दोनों यहीं हैं, लेकिन संतुलन बने रहनाचाहिए।

और यही संतुलन कापैरोकार दो-दो बार मृत्यु को छकाकर आने वाला माँ सरस्वती का साधक मुन्ना सिंह इसकेलिए अपनी जिजीविषा से ज़्यादा ईश्वर के आशीर्वाद और लोगों के प्यार को मनाता है।

इनके समर्पण औरस्वर में बसी भोजपुरी मिट्टी के सोंधेपन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नीदरलैंड्स के गिरमिटिया वंशजों के संगीत ग्रुप ने पहचानाऔर अपने नवीनतम गीत "सुन्दर सुभूमि" को अलंकृत करने का अनुरोध किया।इनकी आवाज़ ने साल 2020 में कम-से-कम एक अच्छी चीज़ दी है।

हे भोजपुरी लोक केनिर्विकार कर्मयोगी साधक..... "जीवेत शरदः शतम"।

Updated : 10 Sep 2020 5:49 PM GMT
Tags:    
Next Story
Share it
Top