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‘माय’ समीकरण अब 69 गणित तक पहुंचा

‘माय’ समीकरण अब 69 गणित तक पहुंचा
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लालू प्रसाद ने 90 के दशक में बिहार में मुस्लिम-यादव गठजोड़, जिसे ‘माय’ समीकरण कहा गया, के सहारे बिहार की राजनीति बदली और 15 साल तक सत्ता पर काबिज रहे। राजद का यह वोट बैंक कमोबेश आज भी बना हुआ है। यही राजद की ताकत भी है। लेकिन, अब जब पार्टी की बागडोर तेजस्वी के हाथ में है और बिहार में राजद के साथ उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी और विकासशील इंसाफ पार्टी के नेता मुकेश सहनी गठबंधन के तहत जुड़े है, तो बिहार की राजनीति में अब नया समीकरण बनता दिख रहा है। यह नया समीकरण ‘69’ का है, जिससे राजनीतिक पंडित भी परेशान हैं। माना जा रहा है कि गठबंधन का यह समीकरण सफल हो गया, तो भाजपा और जदयू की राजनीति काफी प्रभावित होगी।पूर्व केंद्रीय मंत्री जयनारायण निषाद का निधनबदले राजनीतिक माहौल में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के उपेंद्र कुशवाहा, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के जीतनराम मांझी और विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी अब महागठबंधन के हिस्सा हो गए हैं। इन तीनो नेताओं के अपने वोट बैंक हैं और इस वोट बैंक में राज्य की बड़ी आबादी है। यह आबादी पिछड़े और दलित समाज की है। उपेंद्र कुशवाहा कोयरी जाति से आते हैं। इनकी आबादी बिहार में करीब 6.4 प्रतिशत है। जब-जब कुर्मी (लगभग 4 प्रतिशत) जाति के साथ कोयरी जाति का समीकरण बना, तब-तब बिहार में सत्ता के खेल में बड़ा परिवर्तन हुआ है। 1990 से 2000 तक ये दोनों ही जातियां कमोबेश राजद के साथ ही मानी जाती थीं। हालांकि, 1992 में जब नीतीश कुमार ने समता पार्टी बनाई, तो ’लव-कुश’, यानी कुर्मी और कोयरी एक साथ आते गए और नीतीश कुमार ’लव-कुश’ के सर्वमान्य नेता बन गए। इसी गोलबंदी ने जब भाजपा के साथ मिलकर सवर्णों को साध लिया, तो 2005 में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ। अब तेजस्वी कोयरी समुदाय के 6 प्रतिशत वोटों को साधने की नीति के तहत ही उपेंद्र कुशवाहा को अपने खेमे में कर लिया है।एनडीए में सीटों के बंटवारे का ऐलानपूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी महादलित समुदाय से आते हैं। इसमें 22 जातियां आती हैं, जिनकी आबादी 18 प्रतिशत है। महादलित जातियों में मांझी की अच्छी पैठ मानी जा रही है। जिस मुसहर जाति से वे आते हैं, उसकी आबादी 2.3 प्रतिशत है और मांझी के नाम पर यह पूरा महादलित समुदाय गोलबंद हो सकता है। गौरतलब है कि कुशवाहा और मांझी पहले एनडीए में एक साथ थे, जो जातिगत समीकरण के लिहाज से अच्छी ताकत बन जाती थी। ऐसे में मांझी और कुशवाहा का एनडीए से अलग होकर महागठबंधन में शामिल होना निश्चित ही उसकी ताकत को बढ़ाएगा।मुकेश साहनी खुद को मल्लाह का बेटा, यानी ’सन ऑफ मल्लाह’ कहते हैं। मछुआरा समुदाय के नेता के तौर पर खुद को प्रोजेक्ट करते हुए मुकेश सहनी ने महागठबंधन में शामिल होते समय ये नारा भी दिया कि ’माछ भात खाएंगे-महागठबंधन को जिताएंगे।’ दरअसल, उन्होंने हाल ही में विकासशील इंसान पार्टी बनाई है। वे निषाद विकास संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। निषाद समुदाय में कुल 23 उप-जातियां हैं। इनकी आबादी 14 प्रतिशत है। वहीं, सिर्फ मल्लाह की भी बात करें, तो इनकी संख्या 5.2 प्रतिशत है।तेजस्वी यादव इन तीनों को अपने साथ जोड़ कर खुद को पिछड़े वर्ग के नेता के तौर पर स्थापित करने की कवायद में लगे हैं। वे कई बार खुद को दलितों-पिछड़ों का नेता बता चुके हैं और तमिलनाडु की तर्ज पर बिहार में भी 69 प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहे हैं। यानी, उनके सियासी गणित को देखें तो यादव 14 प्रतिशत, मुस्लिम 17 प्रतिशत, निषाद 14 प्रतिशत, महादलित 18 प्रतिशत और कोयरी 6 प्रतिशत का जोड़ करें, तो यह ’69’ का ही हिसाब बनाता है। जाहिर है जिस सियासी समीकरण पर तेजस्वी चल रहे हैं, अगर इसमें 60 प्रतिशत भी सफल हो गए, तो वे बिहार की राजनीति का चेहरा बनकर उभरेंगे।

Updated : 24 Dec 2018 10:12 AM GMT
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