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सुरक्षा वापसी के साथ अलगाववादियों के खिलाफ अन्य कदम भी उठाए जाएं

सुरक्षा वापसी के साथ अलगाववादियों के खिलाफ अन्य कदम भी उठाए जाएं
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लेख ¦ अवधेश कुमार सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस लिए जाने के निर्णय का जिस तरह देश भर में स्वागत हुआ, उससे समझा जा सकता है कि इनको लेकर लोगों की भावनाएं क्या हैं.जम्मू-कश्मीर प्रशासन का बयान है कि जिनकी सुरक्षा हटाई गई है उसके अलावा भी अगर किसी अलगाववादी को किसी तरह की पुलिस सुरक्षा है तो पता लगने के बाद उन्हें भी वापस लिया जाएगा, साथ ही अगर उन्हें सरकार के द्वारा कोई दूसरी सुविधाएं मिल रही हैं तो वे भी तत्काल हटा ली जाएंगी. इस आदेश के बाद अलगाववादी मौलवी मीरवाइज उमर फारुक, अब्दुल गनी भट, बिलाल लोन, हाशिम कुरैशी और शब्बीर शाह की सुरक्षा और सरकारी वाहनों की सुविधाएं खत्म हो गई हैं. हालांकि आदेश में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी तहरीए-ए-हुर्रियत के नेता सैयद अली शाह गिलानी और यासिन मलिक का नाम नहीं होने को लेकर प्रश्न उठाए जा रहे हैं. यासिन मलिक को सरकारी सुरक्षा प्राप्त नहीं है तथा गिलानी घर में नजरबंद हैं. प्रशासन के बयान को देखें तो किसी और अलगावादी को सरकारी सुरक्षा या सुविधाएं हासिल है, तो राज्य पुलिस मुख्यालय इसकी समीक्षा करेगा और इसे तुरंत वापस ले लिया जाएगा.पूरे देश से यह मांग लंबे समय से थी कि जो नेता भारत को तोड़ने के लिए अभियान चलाते हैं, अपने को भारत का नागरिक तक नहीं कहते, कुछ स्वयं विवादास्पद क्षेत्र का नागरिक कहते हैं तो कुछ स्वयं को पाकिस्तानी, उनको भारत की ओर से मिलने वाली हर तरह की सुरक्षा और सुविधा समाप्त करनी चाहिए. इन जवानों की शहादत के बाद जिस तरह का गुस्सा देश में है, उसको देखते हुए यह कदम लाजिमी हो गया था. यह समय ऐसा है जब इसका सार्वजनिक विरोध करना उनके लिए भी आसान नहीं जो हुर्रियत नेताओं के प्रति सहानुभूति रखते हैं. इनके जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला और उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला भी शामिल हैं.हालांकि कांग्रेस के नेता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री सैफुद्दीन सोज इस कदम के खिलाफ आ ही गए. उन्होंने कहा है कि इनकी सुरक्षा हटाने की नकारात्मक प्रतिक्रिया होगी. सोज ने तो उन्हें प्रमाण पत्र भी दे दिया कि हुर्रियत के नेताओं ने कभी हिंसा का पक्ष नहीं लिया. पूरा देश जानता है कि हुर्रियत नेता खुलकर आतंकवादियों के पक्ष में बयान नहीं देते, पर किसी आतंकवादी हिंसा की निंदा करते हुए उन्हें नहीं सुना गया. उल्टे वे सुरक्षा बलों को खलनायक साबित करते हैं. वे आतंकवादियों के खिलाफ सुरक्षा बलों की कार्रवाई का हमेशा विरोध करते हैं. आतंकवादियों के जनाजे में वे शामिल होते हैं और भारत विरोधी नारे लगवाते हैं. इन्होंने कभी पत्थरबाजों की आलोचना नहीं की, लेकिन सुरक्षा बल जब इनके विरुद्ध पैलेट गन या आंसू गैस का इस्तेमाल करते हैं तब ये जरूर आसमान सिर पर उठा लेते हैं. अगर सोज को इसमें हिंसा का समर्थन नहीं दिखता तो उनको अपना चश्मा बदल लेना चाहिए. कांग्रेस को उनसे पूछना चाहिए कि हुर्रियत के प्रति उनके प्रेम का कारण क्या है? वैसे भी एनआईए द्वारा आतंकवाद को वित्त पोषण करने के आरोप में हुर्रियत नेताओं के गिरफ्तार होने के बाद इस तरह का बयान आपत्तिजनक है.हालांकि सुरक्षा हटाने के फैसले के बाद मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले हुर्रियत कांफ्रेस ने कहा है कि सरकार ने खुद ही उन सबको सुरक्षा मुहैया कराने का फैसला किया था, जिसकी कभी मांग नहीं की गई.उमर फारूक और प्रो अब्दुल गनी बट तो आरोप लगा रहे हैं कि इस सुरक्षा को भारतीय एजेंसियां कश्मीर की आजादी पसंद तंजीमों और उनके नेताओं को बदनाम करने के लिए ही इस्तेमाल करती रहीं हैं. इसके जरिए हमारी गतिविधियों की निगरानी की जाती थी.अब्दुल गनी बट ने कहा कि उन्हें राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सुरक्षा की कोई जरूरत नहीं है. बहुत अच्छा, आपकी चाहत सरकार ने पूरी कर दी है, लेकिन कुरैशी का कहना है कि सुरक्षा हटाने के बाद आईएसआई मुझे निशाना बनाएगी, क्योंकि मैं कश्मीर की आजादी की बात करता हूं, पाकिस्तान में मिलाने का नहीं. कुरैशी का बयान यह साबित करता है कि फारुख या बट जो बोल रहे हैं, वह सच नहीं है. इस कदम से हुर्रियत नेता परेशान है, उनकी चिंता बढ़ी है. यह स्वाभाविक भी है. मीरवायज का ही उदाहरण लीजिए. उनको जेड प्लस सुरक्षा मिली हुई थी. उन्हें बुलेट प्रूफ वाहन भी दिया गया, लेकिन वर्ष 2017 में जामिया मस्जिद में ईद से कुछ दिन पहले एक डीएसपी को जब भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला तो उनकी सुरक्षा में कटौती कर दी गई. डीएसपी को हटाकर सुरक्षा की कमान एक इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी को दी गई. इसी तरह अन्यों को भी अलग-अलग श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त थी.यह प्रश्न भी लंबे समय से उठ रहा था कि आखिर जनता का धन इन भारत विरोधियों पर क्यों खर्च किया जाना चाहिए? इनकी सुरक्षा पर होने वाले खर्च के अलग-अलग आंकड़े आए हैं और इसका बड़ा कारण यह है कि राज्य सरकारें हर वर्ष इसका ऐसा आंकड़ा बनाती थी ताकि ऐसा लगे कि काफी बड़ी राशि इन पर खर्च हो रही है.पिछले वर्ष फरवरी में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पेश रिपोर्ट के अनुसार अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा पर 10.88 करोड़ रुपये सलाना खर्च किए गए. उमर फारूख की सुरक्षा पर एक दशक में 6 करोड़ से ज्यादा खर्च की जानकारी सरकार ने दी. प्रो. अब्दुल गनी बट की सुरक्षा पर एक दशक में 2.34 करोड, बिलाल गनी लोन पर इस 1.65 करोड़ और हाशिम कुरेशी की सुरक्षा पर भी करीब डेढ़ करोड़ खर्च किए गए. कोई भी समझ सकता है ये आंकड़े सच नहीं हो सकते. वैसे अन्य अलगाववादियों या उनसे जुड़े कई लोगों को सुरक्षा प्राप्त है. इनमें सज्जाद लोन तो अब राजनीति की मुख्यधारा में आ चुके हैं, किंतु उनकी बहन शबनम लोन, आगा हसन, मौलाना अब्बास अंसारी आदि की सुरक्षा की समीक्षा होनी चाहिए.गौरतलब है कि राज्य में 25 लोगों को जेड प्लस तथा करीब 1200 लोगों के पास अलग-अलग श्रेणी की सुरक्षा है. इन सबकी गहन समीक्षा की जाएगी, तो कई अलगाववादी की श्रेणी में आ जाएंगे.ऐसा न हो कि सुरक्षा वापसी का कदम यही तक सीमित रह जाए. इसके अलावा सरकार इनके महंगे इलाज से लेकर बाहर जाने पर होटलों में ठहरने का तक व्यय वहन करती रही हैं. जब ये दिल्ली आते हैं तो नामी महंगे होटलों में ठहरते हैं. कश्मीर के कई होटलों में इनके लिए स्थायी रूप से कमरा बुक रहता है. पता नहीं, इतनी सुविधा इनको क्यों मिली हुईं थीं?वास्तव में हुर्रियत नेता जिस तरह भारत विरोधी गतिविधियां चलाते हुए सुख-वैभव और सुविधाओं के साथ सुरक्षित रहते हैं, वह हर भारतवासी की छाती में शूल की तरह चुभता है. सात लोग तो इनके बड़े चेहरे हैं. पाकिस्तान से हवाला के जरिए आतंक को बढ़ावा देने के लिए धन लेने का प्रमाण मिलने के बाद एनआईए ने दस को गिरफ्तार किया है. यह बात अलग है कि इनमें शब्बीर शाह को छोड़कर कोई बहुत बड़ा नाम नहीं है. इनकी स्थिति तो ऐसी बना दी जानी चाहिए थी कि ये भारत विरोध का शब्द मुंह से निकालने के पहले सौ बार सोचते. सुरक्षा कवच हटाना सही है, पर यह मात्र एक कदम है. उनके खिलाफ बहुस्तरीय जांच हो जिनमें उनकी गतिविधियों से लेकर संपत्तियां भी शामिल हों. क्या पाकिस्तान से आने वाली राशि का उपयोग केवल वे लोग ही करते थे, जिन्हें एनआईए ने गिरफ्तार किया? ये अलगावादी इतने शान-ओ-शौकत में रहते कैसे हैं? इनके पास अकूत संपत्ति है जिनमें स्कूल, होटल, मकान-प्लॉट सब कुछ है.यासीन मलिक 1990 के आसपास रेहड़ी चलाकर गुजारा चलाता था. आज वह श्रीनगर के सबसे महंगे बाजार लालचौक इलाके की दो तिहाई से भी ज्यादा संपत्ति का मालिक है. इसकी कीमत 150 करोड़ से ज्यादा है. यहां रेजीडेंसी होटल भी इसी का है.शब्बीर शाह का पहलगाम में होटल है. एनआईए ने डोजियर में अलगाववादी नेताओं की उन नामी-बेनामी संपत्तियों का विवरण दिया है, जो इसकी पकड़ में आए. इसके अनुसार शब्बीर शाह के पास करीब 19 प्रॉपर्टीज हैं.सैयद अली शाह गिलानी की अधिकांश संपत्ति इसके दो बेटों के नाम है. इसमें प्लॉट, स्कूल, मकान आदि हैं. बड़े 20 अलगाववादी नेताओं के पास करीब 200 प्रॉपर्टी बेनामी भी हैं. अलगाववादियों की भारत विरोधी गतिविधयों पर आघात करना है, तो सबकी संपत्तियों की एक बार जांच कराकर बेनामी संपत्ति कानून के तहत इनको जब्त किया जाए, आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा दर्ज हो और धनशोधन का मामला तो अपने आप बन ही जाता है.(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Updated : 23 Feb 2019 6:07 AM GMT
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