Top
Home > प्रमुख ख़बरें > परंपरा और आस्था का मिलाजुला रूप है सोनपुर मेला, 21 नवंबर से शुरु हो गया मेला

परंपरा और आस्था का मिलाजुला रूप है सोनपुर मेला, 21 नवंबर से शुरु हो गया मेला

परंपरा और आस्था का मिलाजुला रूप है सोनपुर मेला, 21 नवंबर से शुरु हो गया मेला
X

सोनपुर मेला केवल पशुओं के कारोबार का बाजार ही नहीं, बल्कि परंपरा और आस्था का भी मिलाजुला स्वरूप है। इस साल पशु मेले को पारंपरिक एवं साहसिक खेलों एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ ज्यादा नवोन्मेषी बनाया गया है।

-21 नवंबर से 22 दिसंबर तक चलेगा सोनपुर मेला

-20 स्विस कॉटेज बनाए गए हैं। कॉटेज का आरक्षण ऑनलाइन कराया जा सकता है।

बिहार के के सारण और वैशाली जिले की सीमा पर अवस्थित सोनपुर में गंडक के तट पर हर साल लगने वाला एक विश्वप्रसिद्ध मेला है सोनपुर मेला। बड़ी बात यह कि मॉल कल्चर के इस दौर में बदलते वक्त के साथ इस मेले के स्वरूप और रंग-ढंग में बदलाव जरूर आया है लेकिन इसकी सार्थकता आज भी बनी हुई है। 5-6 किलोमीटर के वृहद क्षेत्रफल में फैला यह मेला हरिहरक्षेत्र मेला और छत्तर मेला के नाम से भी जाना जाता है। हर साल कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के साथ यह मेला शुरू हो जाता है और एक महीने तक चलता है। इस मेले में कभी अफगान, इरान, इराक जैसे देशों के लोग पशुओं की खरीदारी करने आया करते थे। कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने भी इसी मेले से बैल, घोड़े, हाथी और हथियारों की खरीदारी की थी। 1857 की लड़ाई के लिए बाबू वीर कुंवर सिंह ने भी यहीं से अरबी घोड़े, हाथी और हथियारों का संग्रह किया था। अब भी यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है। देश-विदेश के लोग अब भी इसके आकर्षण से बच नहीं पाते हैं और यहां खिंचे चले आते हैं।

विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला का शुभारंभ हो गया है। इसके साथ ही हरिहरक्षेत्र की पावन भूमि हरि व हर के जयघोष से गुंजायमान हो उठी है। देश के विभिन्न हिस्सों से साधु-संतो का यहां जमावड़ा शुरु हो गया है।

एक महीने तक चलने वाले इस मेले की पहचान ऐसे तो सबसे बड़े पशु मेले की रही है, परंतु मेले में आमतौर पर सभी प्रकार के सामान मिलते हैं। मेले में जहां देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग पशुओं के क्रय-विक्रय के लिए पहुंचते हैं, वहीं विदेशी सैलानी भी यहां खिंचे चले आते हैं। मेला प्रारंभ होते ही देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग पशुओं की खरीद-बिक्री के लिए पहुंचते हैं। पूरा मेला परिसर सज-धज कर तैयार है। मेले के इतिहास के विषय में बताया जाता है कि इस मेले का प्रारंभ मौर्य काल के समय हुआ था। चंद्रगुप्त मौर्य सेना के लिए हाथी खरीदने के लिए यहां आते थे। स्वतंत्रता आंदोलन में भी सोनपुर मेला क्रांतिकारियों के लिए पशुओं की खरीदारी के लिए पहली पसंद रही। सोनपुर के बुजुर्गो के अनुसार वीर कुंवर सिंह जनता को अंग्रेजी हुकूमत से संघर्ष के लिए जागरुक करने के लिए और अपनी सेना की बहाली के लिए यहां आए व यहां से घोड़ों की खरीदारी भी की थी। इस मेले में हाथी, घोड़े, ऊंट, कुत्ते, बिल्लियां और विभिन्न प्रकार के पक्षियों सहित कई दूसरे प्रजातियों के पशु-पक्षियों का बाजार सजता है। यह मेला केवल पशुओं के कारोबार का बाजार ही नहीं, बल्कि परंपरा और आस्था का भी मिलाजला स्वरूप है। इस साल पशु मेले को पारंपरिक एवं साहसिक खेलों एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ ज्यादा नवोन्मेषी बनाया गया है। दर्शक हाथी, घोड़ा और अन्य पालतू पशुओं को देखने के अलावा कबड्डी, क्रिकेट, फुटबॉल, कुश्ती जैसे खेलों में हिस्सा भी ले सकेंगे। सोनपुर मेला बड़े पैमाने पर पशुओं की खरीद-फरोख्त के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इसे अब इससे भी ज्यादा थिएटरों के फूहड़ कैबरे जैसे डांस के लिए जाना जाता है। टिकटों के लिए लगने वाली लंबी लाइन को अगर कोई संकेत मानें तो इन थिएटरों के मालिक अच्छी कमाई कर रहे हैं। सबसे आगे की पंक्ति का टिकट 500 से 750 रु. तक का होता है। डांस स्टेज से दूरी जैसे-जैसे बढ़ती है, टिकट के दाम घटते जाते हैं यानी जो जितनी दूर बैठेगा, उसको उतनी कम कीमत चुकानी पड़ेगी। ऐसे ही खिली धूप वाली जाड़े की एक दोपहर, जब हमने उनसे मुलाकात की और यह पाया कि अपने धुंधले लक्ष्यों के झुरमुट के बावजूद सोनपुर के थिएटरों में डांस करने वाली ये लड़कियां काफी अलग हैं। उनमें से कई यहां इसलिए आई हैं क्योंकि उन्हें अब कोई उम्मीद नहीं है, जबकि कई ने अभी उम्मीद करनी शुरू ही की है। इनमें से हर लड़की के लिए यहां रहने की अलग-अलग वजहें हैं।

NJWSS टीम का सफाई अभियान

दिन गुलजार रहता है पशुओं, गरम कपड़ों और रोजाना की चीजों की खरीद-बिक्री करने वाले लोगों से। लेकिन शाम ढलते ही मेले का माहौल गरमा जाता है. रात का नजारा कुछ और ही बयाँ करता है। रात में यहां नर्तकियों के घुंघरुओं की आवाज नहीं गूंजती. बल्कि रात जवान होता है कानफाडू संगीत पर कमर लचकाती बार बालाओं के ठुमके के साथ. मि. बबली शर्मा, मि. दिव्या, मि. भाव्या आदि कुछ ऐसे ही नाम हैं जिसका दीदार करने बड़े, बूढ़े और बच्चे सभी आते हैं। रात की चमकती बहुरंगी रोशनियों की जगमगाहट में उम्र की सीमाएं टूटने लगती हैं और टूटती है वो सारी हदें जिसे देखने रोजाना एक हुजूम उमड़ती है रात को। चांदनी, गुलाब विकास, शोभा सम्राट आदि कुछ ऐसे ही प्रदर्शन मंच हैं जहां रोजाना 25-30 डांसरों के अश्लील डांस देखने जुटते हैं पटनिया युवा। सोनपुर मेले में चल रहे थियेटर का गतिशास्त्र भी कुछ अजीबो-गरीब है। थिएटर में एक शो देखने पर 500 रुपए देना पड़ रहा है जबकि मॉल में ये रेट 200 है। न्यूड डांस को लेकर महज कुछ देर में ही थियेटर के सारे टिकट बिक जा रहे हैं। मेले में आने वाले लोगों के लिए थिएटर सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। थियेटरों में होने वाले अश्लील डांस के कारण शाम होने के साथ ही इन थिएटर के सामने भीड़ जमा हो जाती है। सोनपुर के थिएटरों को संगीत और नृत्य करने के लिए लाइसेंस मिले हैं। लेकिन प्रशासन के सारे गाइड लाइन को दर किनार करते हुए थिएटर मालिक अपनी मन मानी करते रहे हैं। लाठी और डंडों के बल पर थियेटरों में न्यूड डांस करवाते हैं। इनके इस कार्य में ऐसा करने से रोकने के लिए तैनात पुलिसकर्मी ही मदद कर रहे हैं। थिएटर में इस डांस का रेट मॉल में चलने वाले सिनेमा से कई गुना ज्यादा होने के बावजूद भीड़ है। ये लड़कियां एक-दूसरे को पहले से नहीं जानतीं-सच तो यह है कि इनमें से कई पहली बार बिहार आई हैं-लेकिन ऐसा लगता है कि जीवन की लंबी तनी डोर ने उन सबको एक गांठ में बांध रखा है क्योंकि ये सभी कमोबेश एक ही तरह का जीवन जी रही हैं और अपने परिवार के लिए कमाने का उन पर एक जैसा ही दबाव है।

सोनपुर के लिए 500 अलग तरह की लड़कियों का रूप-रंग ही उनकी पहचान है, जो कि उनके खुले बालों, भड़कीले मेकअप, गहरे लाल रंग की नेलपॉलिश और चेहरे पर क्रीम की मोटी परत से दिख जाता है। सोनपुर के किसी थिएटर में काम के घंटे शाम चार बजे से शुरू होते हैं, जब जाड़े के मौसम में बाकी दुनिया अपना काम समेटने की तैयारी कर रही होती है। शो सीधे-सादे देशभक्ति के गानों और कॉमेडी रचनाओं से शुरू होता है, जिसके बाद ग्रुप डांस का प्रदर्शन होता है। चमड़ी दिखाने का असल खेल तब शुरू होता है, जब रात का अंधेरा गहराता है। तीन घंटे के चौथे शो के खत्म होने के बाद अगले दिन तड़के चार बजे परदा गिर जाता है। लड़कियां सोने चली जाती हैं और सूरज अगले दिन के लिए उग आता है, शायद यह उनके दुर्भाग्यपूर्ण करियर की याद दिलाने का ही एक प्रतीक है। इस मेले से एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भगवान विष्णु के भक्त हाथी (गज) और मगरमच्छ (ग्राह) के बीच कोनहारा घाट पर संग्राम हुआ था। जब गज कमजोर पड़ने लगा तो उसने अपने अराध्य को पुकारा और भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुदर्शन चक्र चलाकर दोनों के बीच युद्ध का अंत किया था। इसी स्थान पर हरि (विष्णु) और हर (शिव) का हरिहर मंदिर भी है जहां प्रतिदिन सैकड़ों भक्त श्रद्धा से पहुंचते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान राम ने सीता स्वयंवर में जाते समय किया था। पूर्व में मध्य एशिया से व्यापारी पर्शियन नस्ल के घोड़ों, हाथी और ऊंट के साथ यहां आते थे। इस मेले की विशेषता है कि यहां सभी पशुओं का अलग-अलग बाजार लगता है।

धीरे-धीरे इस मेले में पशुओं की संख्या कम होती जा रही है। सोनपुर मेले में पशुओं की संख्या कम होना चिंता का विषय है। पशुओं के प्रति लोगों की दिलचस्पी कम होती जा रही है। इस वजह से पशुओं की संख्या बढ़ाने के लिए प्रशासन भी अपने स्तर से बहुत कुछ नहीं कर पा रहा है। मेले के इतिहास को जीवित रखने के लिए विभाग ने असम, पश्चिम बंगाल समेत दूसरे राज्यों से पशुओं को मंगवाने की कोशिश की है। मेले के परंपरागत और ग्रामीण स्वरूप बनाए रखते हुए हर साल इसे आधुनिक और आकर्षक रूप प्रदान करने के प्रयास किए जाते हैं। मेले की धार्मिक, एतिहासिक और पौराणिक महता को देखते हुए और इसे पर्यटन एवं दुनिया के मानचित्र पर लाने के लिए वेबसाइट के साथ-साथ अन्य प्रचार माध्यमों से प्रचार-प्रसार करवाया जा रहा है। इस मेले में नौटंकी, पारंपरिक संगीत, नाटक, जादू, सर्कस जैसी चीजें भी लोगों के मनोरंजन के लिए होती हैं।

Updated : 21 Nov 2018 3:10 PM GMT
Tags:    
Next Story
Share it
Top