पटना रैली : ‘महामिलावट’ बनाम ‘महागिरावट’

नजरिया ¦ प्रेम कुमार मणि 

एनडीए की कल पटना में रैली थी. पटना की राजनीतिक रैलियां गाँधी मैदान में होती हैं, और स्वाभाविक था, यह भी वहीं थीं. हप्ते भर से नगर का चप्पा-चप्पा होर्डिंग-पोस्टरों से भरा था. एनडीए सरकार में है और चुनाव बस होने ही जा रहे हैं इसलिए उम्मीद थी कि रैली उल्लेखनीय होगी, लेकिन कुल मिलाकर यह ठीक-ठाक कहने भर ही निकली. न कोई उत्साह न, न कोई जिज्ञासा. ढो-ढाकर और खिला-लाकर लाये जाने के बावजूद बुझे मन से लोग शामिल हुए दीखते थे. सब के मुंह से यही बात निकल रही थी कि मोदी की साढ़े पांच साल पुरानी पटना रैली, जो २७ अक्टूबर २०१३ को हुई थी, के सामने यह बिलकुल फीकी थी. पिछली रैली में कोई आधा दर्जन लोग बमबारी के शिकार हुए थे. बावजूद लोग टस से मस नहीं हुए थे. इस बार बारिश के छींटों ने ही रैली में भगदड़ करा दी. दो तिहाई मैदान चंद मिनटों में खाली हो गया. इसकी प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री के चेहरे पर स्पष्ट दिख रही थी. वह अपने स्वाभाविक उत्साह में नहीं थे. बुझे मन से बोल रहे थे. टीवी से इस भाव को कोई अभी भी देख सकता है.

प्रधानमंत्री का भाषण तो और फीका था. ले-दे कर वही महामिलावट वाला जुमला. भाषण सुन रही जनता आपस में कह रही थी कि यह महामिलावट और महागिरावट की टक्कर है. प्रधानमंत्री को ऐसा नहीं बोलना चाहिए. प्रतिरोधी आवाज आती है राहुल भी तो चौकीदार चोर है कहता है. लोग गुरगुराते हैं वह तो पप्पू है, मोदी भी पप्पू है क्या? प्रधानमंत्री बनने पर राहुल भी नहीं बोलता. मोदी तो प्रधानमंत्री है. इन बतकहियों के बीच सब एकमत हो स्वीकार रहे थे, मोदी की पिछली रैली के मुकाबले यह फ्लॉप रैली है.

फ्लॉप रैली के पीछे के कारणों को देखना बहुत मुश्किल नहीं है. बिहार के एक बहादुर नौजवान पिंटू कुमार सिंह ने सीमा पर लड़ते हुए शहादत प्राप्त की. शहीद का शव पटना हवाई अड्डे पर पड़ा रहा. किसी को उस पर दो फूल चढाने की सुध नहीं आई. सब पीएम मोदी की अभ्यर्थना में लगे रहे. शहादत और राजनीति आमने- सामने थी. शहादत की उपेक्षा की गई, राजनीति को तरजीह मिली. जनता की जुबान पर पीएम मोदी से अधिक शहीद पिंटू की चर्चा सुन कर मुझे तसल्ली हुई कि देश का भविष्य सुरक्षित है. जनता अपने शहीदों का सम्मान करना जानती है. मीडिया उपेक्षा करे, सरकार करे, लेकिन जनता अपने शहीद को नहीं भूल सकती. पटना की यह एनडीए रैली शहीद के कफ़न पर आयोजित थी. प्रकृति भी रो पड़ी. बादल बरस पड़े. यह मैं नहीं कह रहा, जनता बुदबुदा रही थी.

१४ फ़रवरी के पुलवामा दुर्घटना के बाद से ही मुल्क में एक अजीब किस्म की बेचैनी पसरी थी. पूरे देश ने एकजुटता प्रकट की, लेकिन प्रधानमंत्री ने इसका मज़ाक उड़ाया. २६ फ़रवरी को हमारी सेना ने एक हवाई स्ट्राइक पाकिस्तानी भूभाग में किया. इसकी इतनी बढ़ा-चढ़ा कर घोषणा की गई कि पूरी दुनिया में भारत के पक्ष की हँसाई हुई. सेना ने तो कोई घोषणा नहीं की, लेकिन मोदी के पालतू मीडिया ने दावा किया कि तीन सौ के करीब आतंकवादी मारे गए. दुनिया भर के मीडिया घरानों ने इसे गलत पाया. कोई हताहत नहीं हुआ था. दूसरे दौर में जब जवाबी कार्रवाई हुई तब हमारे एक विंग कमांडर अभिनंदन वहां गिर पड़े और गिरफ्तार कर लिए गए. पाकिस्तान ने उन्हें भारत को सौंप दिया. कुल मिला कर मोदी इस पूरे प्रकरण में टांय-टांय फिस्स हो गए. आज की पटना रैली में मोदी के चेहरे पर पसरी इस हताशा को कोई भी देख-पढ़ सकता था.

क्या यह कहा जाना चाहिए कि मोदी के बुरे दिन अब आने ही वाले हैं क्योंकि कभी-कभार नियति बहुत कुछ तय करती दिखती है. २६ फ़रवरी के बाद मोदी का ग्राफ अचानक इतनी तेजी से गिरेगा, यह किसी को उम्मीद नहीं थी. पटना के एक पत्रकार कन्हैया भेलारी के फेसबुक वाल की मानें तो आज की रैली में भाजपा समर्थकों की संख्या मात्र एक चौथाई यानि पचीस फीसद थी. सत्तर फीसद नीतीश और पांच फीसद रामविलास के लोग थे. नीतीश और रामविलास कब तक एनडीए में रहेंगे, कोई नहीं कह सकता. आज की रैली में नीतीश चहक रहे थे. मोदी के गिरते पारे और मुरझाये चेहरे के बरक्श नीतीश की चहक अपने आप में खबर है.

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