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हेमंत की विनम्रता से पस्त प्रतिपक्ष

हेमंत सोरेन ने कम समय में ही ये साबित कर दिया है कि उनमें दम है और वे जननेता बनने की दिशा में काफी ताकत के साथ अग्रसर हैं।

हेमंत की विनम्रता से पस्त प्रतिपक्ष
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राजीव रंजन

तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुबर दास ने वर्ष 2017 में आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के लिए विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन को आमंत्रित किया था। हेमंत ने शिखर सम्मेलन को भूमि हड़पने वालों का महाचिंतन शिविर कह कर इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया। दावा किया कि यह सम्मेलन आदिवासियों, मूलवासियों और राज्य के किसानों की भूमि को लूटने के लिए आयोजित किया जा रहा है। इस एकमात्र वाक्य के बयान का परिणाम रहा कि सम्मेलन असफल साबित हुआ। आमलोगों से लेकर खास लोगों तक स्पष्ट संदेश गया कि सरकार अपनी ही जनता से अन्याय करने पर उतारू है।

हेमंत सोरेन का यह तेवर नया नहीं था। राजनीति में उनकी आमद भले ही पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण बेहद आसान रही हो लेकिन सफलता पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की और सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे। हेमंत सोरेन, चाहे विपक्ष में बैठे रहे हों या सत्ता की ऊंचाई पर, हमेशा उनके इरादे जनहित के मामले को संबल प्रदान करने वाले रहे हैं। इसके लिए उन्होंने कोई समझौता नहीं किया और कई अवसरों पर जनता तक यह स्पष्ट संदेश पहुंचाने में सफल रहे कि वर्तमान समय में वे झारखंड की राजनीति की धूरी हैं। हेमंत सोरेन ने कम ही समय में अपनी पहचान स्पष्ट सोच-दृष्टि रखने वाले नेता के रूप में बनाने में सफलता हासिल की है। इतना तो तय है कि वर्तमान में हेमंत सोरेन की ऊंचाई बुलंद है। वे लंबी रेस के घोड़े हैं, जिसपर भविष्य के लिए आसानी से दांव लगाया जा सकता है।



10 अगस्त, 1975 को जन्मे हेमंत सोरेन झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं। इससे पहले, उन्होंने जुलाई 2013 से दिसंबर 2014 तक भी झारखंड के मुख्यमंत्री का पद संभाला था। वर्तमान में वह झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं। हेमंत सोरेन का जन्म रामगढ़ जिले के नेमारा में रूपी किस्कू और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के घर में हुआ था। हेमंत के 2 भाई और 1 बहन हैं। उन्होंने पटना हाई स्कूल, पटना से इंटरमीडिएट की शिक्षा हासिल की है। चुनाव आयोग के समक्ष दायर हलफनामे के अनुसार, हेमंत ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीआइटी मेसरा, रांची में दाखिला लिया लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं की। इस बारे में उन्होंने कई अवसरों पर बताया है कि अचानक से बड़े भाई दुर्गा सोरेन की मृत्यु के बाद उन्हें राजनीतिक रिक्तता को भरने के लिए पिता के साथ आना पड़ा। हेमंत सोरेन की शादी कल्पना सोरेन से हुई और उनके 2 बेटे हैं। उनका एक छोटा भाई, बसंत सोरेन और एक बहन, अंजलि है। वह 19वीं सदी के आदिवासी योद्धा बिरसा मुंडा के एक उत्साही अनुयायी हैं और उनके साहस और वीरता से प्रेरणा लेते हैं।

राजनीति

वर्ष 2000 में राजनीति में कदम रखने वाले हेमंत सोरेन पहली बार निरसा विधानसभा उपचुनाव में उतरे थे। हालांकि बाद में उन्होंने एमसीसी (मार्क्सवादी समन्वय समिति) प्रत्याशी के समर्थन में अपना नामांकन वापस ले लिया था। उसके बाद वर्ष 2004 के विधानसभा चुनाव में वो झामुमो की परंपरागत सीट दुमका से चुनाव लड़े लेकिन अपने ही पार्टी के बागी उम्मीदवार स्टीफन मरांडी के खिलाफ हार गये थे। बड़े भाई दुर्गा सोरेन के असमय मौत के बाद हेमंत वर्ष 2009 में पहली बार दुमका विधानसभा सीट पर जीत हासिल करने में सफल रहे। हेमंत सोरेन 24 जून 2009 से 4 जनवरी 2010 तक राज्यसभा के सदस्य थे। वर्ष 2010 में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की अगुवाई वाली भाजपा-झामुमो गंठबंधन सरकार में हेमंत सोरेन पहली बार राज्य के उप मुख्यमंत्री बने। 8 जनवरी 2013 तक वे इस पद पर आसीन रहे।

हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्री बनने की कहानी भी दिलचस्प है। दरअसल वर्ष 2010 में जब वे अर्जुन मुंडा के साथ सरकार में शामिल हुए तो भाजपा और झामुमो के बीच एक समझौता हुआ था। इसके मुताबिक दोनों आधी-आधी अवधि तक मुख्यमंत्री रहने वाले थे। पहले आधे कार्यकाल में अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने और हेमंत उप मुख्यमंत्री, लेकिन बात बीच में ही बिगड़ गयी। 2 वर्ष 4 महीने 7 दिन के बाद यह साझा सरकार गिर गयी। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा। हेमंत सोरेन को 15 जुलाई 2013 को झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलायी गयी। कांग्रेस और राजद के समर्थन से उन्होंने सरकार बनायी थी। झामुमो-राजद-कांग्रेस के साथ मिलकर हेमंत सोरेन ने 1 वर्ष 5 महीने 15 दिनों तक सरकार चलायी।



मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने पहले कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये। इसमें सबसे महत्वपूर्ण था सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने का फैसला। हालांकि उन्हें आसन्न विधानसभा चुनाव 2014 में सफलता नहीं मिल पायी। बावजूद इसके वे विरासत में मिली आंदोलक की भूमिका निभाते रहे। राजनीतिक संगठन में सुधार से लेकर बतौर प्रतिपक्ष के नेता वे हमेशा मुखर रहे। इसी का परिणाम रहा कि वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव के समय उन्हें कांग्रेस और राजद ने निर्विरोध नेता के रूप में स्वीकार किया। चुनाव के दौरान जनता ने भी उनके पक्ष में फैसला सुनाया। बिना किसी संदेह के उनके नेतृत्व वाले गंठबंधन को जनता ने स्पष्ट बहुमत दिया। 29 दिसंबर 2019 को फिर से हेमंत सोरेन ने झारखंड के मुख्यमंत्री का पदभार संभाला।

सफलता

विपक्ष के नेता के रूप में हेमंत सोरेन ने जनहित के मुद्दों को लेकर जमकर संघर्ष किया। उन्होंने बताया कि राजनीतिक रूप से विपक्ष के नेता की क्या भूमिका होनी चाहिए। वर्ष 2016 में झारखंड में भाजपा सरकार ने छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट (सीएनटीए) और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट (एसपीटीए) में संशोधन करने की कोशिश की जो आदिवासी भूमि के मालिकों और किरायेदारों को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए इसका उपयोग करने की अनुमति देता। इसमें सड़कों के निर्माण के साथ ही नहरों, शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल और अन्य सरकारी उद्देश्य के लिए भी आदिवासी भूमि के हस्तांतरण की अनुमति मिलनी थी। इन प्रस्तावित संशोधनों का हेमंत सोरेन ने कड़ा विरोध करते हुए आदिवासियों का मुखर समर्थन और उनके पक्ष में आंदोलन किया। राज्य में भारी विरोध हुआ और सरकार को अंतत: अपने कदम पीछे करने पड़े।

अक्टूबर 2017 में हेमंत सोरेन ने 11 वर्षीय लड़की संतोषी कुमारी की मौत की सीबीआई जांच की मांग की थी, जिसकी कथित तौर पर सिमडेगा में भुखमरी से मृत्यु हो गयी थी। आरोप है कि जुलाई से संतोषी के परिवार को राशन नहीं दिया गया था, क्योंकि उनके बैंक खाते से आधार लिंक नहीं था। सोरेन ने इस मुद्दे को एक जनांदोलन बनाने में बड़ी भूमिका निभायी। उन्होंने मुख्य सचिव राजबाला वर्मा के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि, राशन कार्डों को आधार नंबर से लिंक नहीं कराने वाले परिवारों के नाम जनवितरण प्रणाली (पीडीएस) की सूची से हटाने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से एक आदेश पारित किया गया था। हेमंत सोरेन पीडीएस में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के एक मुखर रक्षक रहे हैं और इस योजना में जबर्दस्त अन्याय कैसे हुआ, इस पर अपनी चिंता व्यक्त की।



सम्मान

हेमंत सोरेन को झारखंड राज्य में दुमका और बरहेट निर्वाचन क्षेत्र में उनके असाधारण काम के लिए वर्ष 2019 में 'चैंपियंस ऑफ चेंज अवार्ड' से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा विज्ञान भवन नयी दिल्ली में 20 जनवरी 2020 को प्रदान किया गया था।

रास्ता अभी लंबा है

इन सबसे पृथक, राजनीतिक टिप्पणीकार हेमंत सोरेन को लेकर कड़ी राय भी रखते हैं। मानना है कि हेमंत का राजनीतिक उत्थान झारखंड में वंशवादी राजनीति की शुरूआत है। तथ्य यह भी है कि हेमंत सोरेन खुद को अपने पिता गुरुजी अर्थात शिबू सोरेन की तरह आमजन तक पहुंच वाले नेता के रूप में स्थापित नहीं कर पाये हैं। इन्हें इस मुकाम तक पहुंचने के लिए अभी कठिन परिश्रम करना पड़ेगा। बावजूद इसके, तथ्य यह भी है कि उन्होंने कम समय में ही ये साबित कर दिया है कि उनमें दम है और वे जननेता बनने की दिशा में काफी ताकत के साथ अग्रसर हैं। हेमंत को यह साबित करना होगा कि वह उस राजनीतिक रिक्त स्थान को भरने में सक्षम हैं जो शिबू सोरेन के राजनीति से हटने पर बनेगा, और यह कि पार्टी का भविष्य उनके साथ सुरक्षित है।

Updated : 22 Jan 2021 4:41 PM GMT
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