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स्टील का बादशाह डॉ. गुणवंत सिंह मोंगिया

डॉ0 गुणवंत सिंह मोंगिया सफल उद्योगपति के साथ-साथ सामाजिक कार्य एवं समरस्ता के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

स्टील का बादशाह डॉ. गुणवंत सिंह मोंगिया
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प्रेम भूषण

संघर्ष ही जीवन को नया आयाम और नई पहचान दिलाता है। जिस व्यक्ति के अंदर अटूट साहस, संघर्ष, दूर दृष्टि एवं मेहनत के बल पर किसी भी प्रतिकूल स्थिति को नये अवसर में बदलने की क्षमता रखता है, वही इंसान इतिहास के पन्नों पर अपना नाम अंकित करा पाता है। झारखण्ड राज्य का एक छोटा सा जिला गिरिडीह आज अपनी पहचान इस्पात नगरी के रूप में न केवल अपने प्रदेश में बल्कि पूरे देश में अपनी पहचान बना रहा है जिसका श्रेय डॉ0 गुणवंत सिंह मोंगिया एवं उनके अभिभावकों को जाता है, जिन्होंने गिरिडीह शहर में लौह उद्योग की शुरूआत की।

वर्तमान में गिरिडीह जिले में लौह उत्पादन के कई फैक्ट्रियाँ स्थापित हो चुकी हैं, जिसमें मोंगिया स्टील लि0 अग्रणीय स्थान रखता है। मोंगिया स्टील लि0 के चेयरमेन डॉ0 गुणवंत सिंह मोंगिया हैं। डॉ0 गुणवंत सिंह मोंगिया सफल उद्योगपति के साथ-साथ सामाजिक कार्य एवं समरस्ता के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। कई सामाजिक कार्यां को एक साथ करते हुए उनकी प्राथमिकता जंगलो में बसे एवं मुख्य धारा के समाज से अलग-थलग पड़े बिरहोर जनजातियों के बच्चों की पढाई के लिए समर्पित है। अपने लौह उद्योग को व्यवस्थित रूप से चलाने एवं समानांतर रूप से समाजिक कार्यों के लिए उन्हें कई पुरस्कार एवं सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

डॉ. गुणवंत सिंह मोंगिया का जन्म 31 अक्टूबर 1962 ई0 को गिरिडीह शहर मे हुआ। इनके पिता सरदार दलजीत सिंह अपने भाई के साथ मिलकर लकड़ी के कारोबार से जुड़े हुए थे जो सलूजा टिम्बर कॉरपोरेशन के नाम से था। उन दिनों गिरिडीह अभ्रक व्यवसाय एवं उसके निर्यात के लिए काफी प्रसिद्ध था और इस व्यवसाय से गिरिडीह के अधिकतर लोग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए थे। सरदार दलजीत सिंह अभ्रक पैकिंग के लिए लकड़ी के बक्से का निर्माण कार्य करते थे।

वर्ष 1974 ई. में दलजीत सिंह ने अपने भाई से अलग होकर लोहे की कील बनाने की फैक्ट्री की शुरूआत की। उस समय डॉ. मोंगिया मात्र 12 वर्ष के थे और उसी उम्र से अपने बड़े भाई अमरजीत सिंह के साथ मिलकर पिता का भरपूर सहयोग करते थे। शुरूआती दौर में फैक्ट्री में प्रतिदिन 60 से 70 किलो ग्राम लोहे के काँटी का निर्माण किया जाता था, परंतु उस समय इतने कम उत्पाद को भी बाजार में बेचने के लिए काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता था। ऐसे में दलजीत सिंह ने निर्मित उत्पाद को बाजारो में बेचने के लिए मार्कंटिग की जिम्मेवारी दोनों भाइयों को सौंप दी। इस जिम्मेवारी को उन्होनें बखूबी संभाला और काँटी निर्माण कार्य में सहायता के साथ-साथ मार्केंट का भी विस्तार किया और स्वयं स्कूटर से एक दिन में 150-200 किमी तक का सफर तय किया करते और दुकानदारों से काँटी का आर्डर लिया करते थे, जिससे बिक्री में काफी वृद्धि होने लगी।

1980 ई. तक काँटी के कारोबार में काफी सुधार आ चुका था और डॉ. मोगिया भी लौह उद्योग की बारीकियों को बखूबी समझने लगे थें। इसी क्रम में उनके परिवार ने सन् 1983 में पहला छड़ निर्माण फैक्ट्री गिरिडीह जिले में लगाया और व्यवस्थित रूप से फैक्ट्री को चलाना शुरू किया।

सरिया फैक्ट्री लगाने का लिया गया फैसला गिरिडीह शहर के लिए काफी अनुकूल था, जिसमें दिनों दिन तरक्की होती गई। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था, वर्ष 1984 के दंगे ने उन्हें बुरी तरह प्रभावित किया औैर उन्हें मानसिक एवं आर्थिक रूप से काफी नुकसान पहुँचाया। उस दंगे में जान बचाने के लिए पूरे परिवार को काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा, साथ ही फैक्ट्री को दंगाईयों ने काफी क्षति पहुँचायी जिससे उबरना काफी मुश्किल हो गया था। इस घटना के बाद सामान्य स्थिति आने में काफी समय लग गया, लेकिन बाजार में बेहतरीन गुडविल होने के कारण आर्थिक रूप से पुन: मजबूत होने में खासी दिक्कतो का सामना नहीं करना पड़ा।

उन्होने लुटने के बाद भी सभी कर्जदारो का आना पाई चुकता किया, जिससे महाजनों का इनके प्रति विश्वास और श्रद्धा काफी बढ़ गया और सभी सप्लायर बेखौफ होकर उनके व्यवसाय में इंवेस्टमेंट करने लगे। फलस्वरूप वह अपने व्यापार को और अधिक शक्ति से आगे बढाने में जुट गए और इस प्रकार सरिया का उद्योग लगातार कामयाबी की ओर बढ़ता गया। लौह उद्योग में आगे बढ़ता देख शहर एवं राज्य के अन्य व्यवसायिक लोग निडरता के साथ गिरिडीह शहर में इस्पात के कारोबार से जुड़ने लगे और देखते ही देखते गिरिडीह शहर लौह मंडी के रूप में स्थापित हो गया।

समय बीतने के साथ-साथ भाईयों के बीच सोच में बदलाव आने लगे और डॉ0 गुणवंत सिंह मोंगिया ने सन् 1996 ई0 में मोंगिया स्टील लि0 की स्थापना की और स्वतंत्र होकर अपने उद्योग के विस्तारीकरण में जी - जान से जुट गए जिसके लगातार सकारात्मक परिणाम भी आते गए।

झारखण्ड के लौह उद्योग में आज मोंगिया स्टील लि0 ने अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। 1996 से लेकर आज तक मोंगिया स्टील ने अपने उत्पादों के गुणवत्ता के बल पर हमेशा प्रगति की ओर अग्रसर रहा है। वर्तमान में झारखण्ड एवं बिहार के अलावा देश के अन्य प्रदेशों में भी मोंगिया टीएमटी बार की अच्छी खासी माँग हो चुकी है। प्राइवेट सेक्टर से लेकर सरकारी कामों में बड़े पैमाने पर मोंगिया के उत्पादों का इस्तेमाल भारी मात्रा में किया जा रहा है। डॉ. मोंगिया का मानना है कि वह अपने उत्पाद के गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं करते, साथ ही वह हमेशा चाहते हैं कि उनके अंतिम ग्राहक तक बेहतर उत्पाद पहुँच सकें और इस कार्य के लिए वह हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं। यही वजह है कि देश-विदेश में जहाँ भी टीएमटी सरिया के क्षेत्र में नए तकनीक आते हैं, वह प्रयास करते है कि नए तकनीक से उनकी फैक्ट्री सुसज्जित हो सके।

सरिया की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए डॉ0 मोंगिया ने टीएमटी सरिया क्षेत्र में एक नया प्रयोग किया जिसमें उन्होने स्वयं अपने उत्पाद का प्रचार किया एवं मोंगिया ब्रांड के ब्रांड अम्बेस्डर बन गए। यह प्रयोग काफी कारगर साबित हुआ। बेहतरीन ब्रांडिग एवं मार्केंटिग की वजह से से उन्होंने अपने ब्रांड को झारखण्ड, बिहार ही नहीं बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी 'मोंगिया स्टील' के नाम से स्थापित कर लिया।

डॉ. मोंगिया का कहना है कि गलोब्लाइजेशन के इस दौर में स्थिर रहकर आज हम बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, जबकि पूराने तकनीक से नए तकनीक तक आने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लेकिन इसके बावजूद वह वर्तमान दौर में इसे करना अनिवार्य समझते हैं। मोंगिया स्टील पर्यावरण का भी पूरा ध्यान रखता है जिसके लिए डॉ. मोंगिया ने कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए अपने फैक्ट्री में अनेक महंगे उपकर्ण लगवाए है।

इस कार्य पर अर्थात कार्बन उत्सर्जन रोकने और एनर्जी बचाने के लिए मोंगिया स्टील लि. को भारत सरकार के स्टील मंत्रालय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्था युएनडीपी द्वारा पूरे क्षेत्र में मॉडल युनिट के रूप में चुना गया जो कि एक बड़ी उपलब्धि है। साथ ही पिछले वर्षों में मोंगिया स्टील लि. को भारतीय उद्योग रत्न पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा डॉ. मोंगिया के नाम कई पुरस्कार एवं सम्मान शामिल है। वर्तमान में मोंगिया स्टील लि0 के चेयरमेन डॉ. गुणवंत सिंह मोंगिया की पहचान न केवल झारखण्ड प्रदेश में है बल्कि पूरे पूर्वी क्षेत्र के स्टील जगत के खासी मायने रखती है।

मोंगिया स्टील टीएमटी बार्स की गुणवत्ता हो या फिर सामाजिक सरोकार डॉ. मोंगिया ने हमेशा अपना दायित्व बखूबी निभाया है जिसमें आदिम जनजातियों के बच्चों की पढ़ाई उनकी प्राथमिकता में शामिल है। इन जनजातियों के हालात को देखकर और उनके रहने खाने की स्थिति को देखकर गिरिडीह की तत्कालिन उपायुक्त वंदना डाडेल के संरक्षण में बिरहोर विकास समिति का गठन किया गया और उनके बच्चो के खाने-पीने से लेकर उनके पढाई तक पूरी जिम्मेवारी समिति की अध्यक्ष डॉ. मोंगिया को दे दी गई।

जिम्मेवारी मिलने के बाद डॉ0 मोंगिया एवं उनकी टीम ने व्यवस्थित तरीके से बिरहोर बच्चों के विकास के लिए उपायुक्त वंदना डाडेल के सहयोग से एक छात्रावास खोला गया, जिसमें पढाई एवं खाने-पीने से लेकर उनके बच्चों को रहने तक की पूरी व्यवस्था की गई। वर्तमान में छात्रावास में लगभग 125 बच्चे है। डॉ. मोंगिया कई ऐसे जरुरतमंद एवं मेधावी छात्र-छात्राओं को आर्थिक मदद भी करते रहे हैं साथ ही वह उच्च शिक्षा तक का खर्च भी वहन करते है, जिसमे नंदनी नाम की छात्रा डॉ0 मोंगिया के सहयोग से एक बेहतर मुकाम को हासिल कर चुकी है। इन सब के अलावा डॉ0 मोंगिया अन्य कई सामाजिक कार्य में रुचि के साथ अपना कर्तव्य निभा रहे है। मोंगिया स्टील ने झारखण्ड और बिहार राज्य के लगभग सभी जिलों में बैरिकेड, पुलिस पोस्ट और कई जिलो में सौंदर्यकरण का कार्य व्यवस्थित रुप से किया है।

गुणवंत सिंह की ख्याति इस बात से भी आंकी जा सकती है कि हिन्दुस्तान की नामी-गिरामी मैनेजमेंट शिक्षा प्रतिष्ठानों में उन्हें कई बार व्याखयान के लिए बुलाया जाता है, जिसमें आई.एस.एम धनबाद, विनोबा भावे युनिवर्सिटी, हजारीबाग एवं आईएफआईएम बिजनेस स्कूल बेंगलुरु आदि जैसे संस्थान शामिल हैं।

Updated : 25 Jan 2021 11:12 AM GMT
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