Top
Home > नजरिया > समस्या मुग़लों से या मुसलमानों से?

समस्या मुग़लों से या मुसलमानों से?

समस्या मुग़लों से या मुसलमानों से?
X

रुमान हाशमी

उत्तर प्रदेश सरकार नेआगरा में निर्माणाधीन मुग़ल म्यूजियम का नाम बदलकर शिवाजी म्यूजियम कर दिया है।आदेश जारी करते हुए सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘‘मुग़ल हमारे हीरो नहीं हो सकते, उत्तर प्रदेश में हम गुलामी की किसी यादगार को रहने नहींदेंगे।’’

यूपी में नामपरिवर्तन का यह पहला मामला नहीं है। भाजपा सरकार बनने के बाद ही मुगलों और इस्लामीनामों को बदलने का सिलसिला जारी है। इससे पहले योगी हुकूमत इलाहाबाद को प्रयागराज,फैजाबाद को अयोध्या, मुगलसराय जंक्शन को दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन में बदल चुकीहै। शहरों के नामों से जी नहीं भरा तो मुहल्लों का नाम बदलने पर उतर आए। इस कड़ीमें गोरखपुर के अलीनगर को आर्यनगर, उर्दू बाजार को हिंदीबाजार, हुमायूं नगर को हनुमाननगर और मीना बाजार को माया बाजार कर दिया गया और अब ताजा-ताजा मुग़ल म्यूजियम कानाम बदल दिया गया।

नाम बदलने का यहसिलसिला इस्लाम विरोधी भावना को दर्शाता है। ब्रिटिश इंडिया में मुस्लिम बादशाहोंको बदनाम करने का षडयंत्र शुरू हुआ। अंग्रेज चले गए मगर नफरत आज तक बाकी है। इसीनफरत का असर है कि हमारे देश में आज एक ऐसा बड़ा तबका तैयार हो चुका है जो मुस्लिमबादशाहों के दौर को गुलामी का दौर कहता है।

ऐतिहासिक तौर परयह बात सही है कि मुगल सल्तनत के संस्थापक ज़हीर उद्दीन मोहम्मद बाबर(1530 ईसवी) बाहर से आए, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बाबर किसी हिंदू राजा से नहींबल्कि एक मुस्लिम शासक इब्राहिम शाह लोदी से लड़ने हिंदुस्तान आए थे। उससे भी मजेदार बात यह है किबाबर को हिंदुस्तान बुलाने वाला कोई मुस्लिम राजा नहीं बल्कि एक हिंदू राजा राणासांगा थे। राणा सांगा के बुलाने पर बाबर भारत आया और अपनी सैन्य क्षमता की बदौलत बड़ाहिस्सा जीत कर मुग़ल सल्तनत की बुनियाद डाली।

बाबर की औलादेंभारत में पैदा हुईं और उन्होंने इंसाफ के साथ भारत पर अपनी हुकूमत कायम की।टुकड़ों में बंटे हुए देश को एक व्यवस्था का हिस्सा बनाया। सुंदर इमारतें बनवाईं,बड़े-बड़े रास्ते, शैक्षिक संस्थान, सराय, मुसाफिर खाने, कारोबारी मंडियाँ और कृषि व्यवस्था को मज़बूत बनाकर भारत कोसोने की चिड़िया बनाया। अमेरिकी शोधकर्ता Cris Mathew "TimeMagazine" में लिखते हैं:"मुगलों के समय में भारतकी जीडीपी दुनिया की कुल जीडीपी का एक चौथाई % थी। (जबकि आज आजादी के 70 वर्षों के बाद भारत की जीडीपी माइनस में पहुंच चुकी है)

जेफरी विलियमसनऔर डेविड कलिंग स्मिथ अपनी किताब India Di-industrialization in 18th and19th century मैं लिखते हैं: "मुगलों का भारत उत्पाद और निर्माण में विश्वगुरु था...उस समय भारत की प्रति व्यक्ति आय आज के ब्रिटेन और फ्रांस के बराबर थी।इसी आर्थिक समृद्धि ने यूरोपियन लोगों को भारत की तरफ आने को मजबूर किया।"

मुगलों के दौरमें भारत की समृद्धि इस कदर थी कि जब अंग्रेज पहली बार भारत आए तो उन्होंने रात कोदिल्ली की सड़कों पर बड़े-बड़े चिराग़, मशालें जलते हुए देखीं। यह देखकर उन्होंने हैरत से दांतों तले उंगलियां दबालीं, क्योंकि उस वक्त तक लंदन में रात होते ही सन्नाटा छा जाता था। लंदन कीसड़कें इस लायक नहीं थी कि उन पर रात को टहला जाए। न वहां की सरकारों के पास ऐसीकोई योजना थी और न ही चिराग जलाने के पैसे! लेकिन मुग़लों के भारत में दिल्ली कीसड़कें रात में भी दिन का नजारा पेश करती थीं।

बाबर के अलावासारे मुग़ल बादशाह इसी देश में पैदा हुए और यहीं की मिट्टी में दफन हुए। मुग़लोंने जो किया भारत के लिए किया, इसे अपना घर समझालेकिन अंग्रेजों के लिए भारत सिर्फ एक सोने की मंडी था, जिसे उन्होंने जी भर कर लूटा और सब कुछ लूट-लाट कर वापसअपने देश भाग गए। भारत का कोहिनूर हीरा अंग्रेजी लूट का सबसे बड़ा सबूत है, जो आज भी इंग्लैंड में मौजूद है। लेकिन घृणित सोच वालेमुग़लों के दौर को गुलामी का दौर कहते हैं और अंग्रेजी गोरों से प्यार करते हैं।

मुगलों की तरहअंग्रेज भी विदेशी थे, मुगलों ने इंसाफ के साथहुकूमत चलाई लेकिन अंग्रेजों ने छल कपट के साथ भारत पर कब्ज़ा जमाया। मुग़लों नेसब कुछ भारत के लिए किया और अंग्रेज सब कुछ लूट कर इंग्लैंड वापस चले गए। लेकिन आजजितनी नफरत मुग़लों से की जाती है उसका 0.1 हिस्सा भी अंग्रेजों से नहीं किया जाता। मुग़लों की बनाई इमारतों और नामों कोबदला जाता है, उन्हें खत्म करने कीबातें होती हैं मगर न अंग्रेजी इमारतों को गुलामी की यादगार बताया जाता है और न हीउनके ख़िलाफ मुहिम चलाई जाती है। लखनऊ से लेकर दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई तक अंग्रेजी इमारतें अपने असली नामों के साथ मौजूदहै मगर मजाल है जो आज तक किसी चरमपंथी ने इन्हें गुलामी की यादगार कहा हो?

लखनऊ का किंगजॉर्ज मेडिकल कॉलेज, इलाहाबाद का मेयोमेमोरियल हॉल, कोलकाता कीराइटर्स बिल्डिंग, दिल्ली का कनॉट प्लेस, कोलकाता का विक्टोरिया मेमोरियल और सेंट पॉल कैथेड्रलचर्च, गेटवे ऑफ़ इंडिया मुंबई,इंडिया गेट दिल्ली, सेंट मैरी चर्च चेन्नई, मुंबई का विक्टोरिया स्टेशन (VT) आदि अंग्रेजों की निर्मित इमारतें हैं और अपने अंग्रेजीनामों के साथ मौजूद हैं, लेकिन मुग़ल इमारतोंऔर इस्लामी नामों को दिन-रात कोसने वाले कट्टरपंथी अंग्रेजी इमारतों और अंग्रेजीनामों पर एक शब्द भी बोलने तैयार नहीं हैं।

आक्रांता औरहमलावर बताकर हिंदुस्तान के रिहाइशी बादशाहों को गालियां देने वाले भक्त गोरेअंग्रेजों को एक लफ्ज़ भी बोलने को तैयार नहीं हैं, जो वास्तव में आक्रांता और आक्रमणकारी थेजिन्होंने लगभग 200 वर्षों तक भारतको लूटा और सारी धन संपदा लूटकर इंग्लैंडले गए!!

कट्टरपंथी एक तरफअखंड भारत का दावा करते हैं और दूसरी तरफ मुग़लों को विदेशी कहते हैं अफगानिस्तानसे आने वाले मुगल तो उसी अखंड भारत का हिस्सा हैं फिर विदेशी कैसे? इस पाखंड से ही पता चलता है कि परेशानी मुगलोंसे नहीं मुसलमानों से है। उन्हें सिर्फ उन्हीं इमारतों और नामों से दिक्कत है, जो उन्हें मुसलमानों के गौरव की याद दिलाएं, उन्हें उसी नाम से दिक्कत है जिससे इस्लामीपहचान जाहिर हो। इसलिए उनकी नफरत सिर्फ मुग़लों की इमारतों और इस्लामी नामों पर हीनिकलती है, लेकिन उन लोगों को येप्राकृतिक नियम याद रखना चाहिए कि सत्ता का वजूद न्याय पर टिका है। न्याय नहींकिया गया तो सत्ता भी नहीं रहेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Updated : 26 Sep 2020 11:37 AM GMT
Tags:    
Next Story
Share it
Top