Home > राज्यवार > दिल्ली > श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय में 'साइकोलॉजी ऑफ नेशनल इंटीग्रेशन' पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी

श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय में 'साइकोलॉजी ऑफ नेशनल इंटीग्रेशन' पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी

श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय में साइकोलॉजी ऑफ नेशनल इंटीग्रेशन पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
X

नई दिल्ली (ब्यूरो रिपोर्ट):- नई दिल्ली के श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय के राजीव गांधी सभागार में “साइकोलॉजी ऑफ नेशनल इंटीग्रेशन” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आरंभ हुआ। इसमें अतिथियों के स्वागत, दीप- प्रज्ज्वलन और छात्राओं की संगीतमय प्रस्तुति के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ, जिसमें एप्लाइड साइकोलॉजी विभाग की छात्राओं द्वारा भी मोहक नृत्य की प्रस्तुति भी की गई। इस अवसर पर महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. साधना शर्मा ने अतिथियों के साथ राष्ट्रीय संगोष्ठी पर एक स्मारिका का भी विमोचन किया। डॉ. साधना शर्मा ने अपने स्वागत भाषण में राष्ट्रीय एकता के लिए जन की एकता की आवश्यकता पर बल दिया।संगोष्ठी के संयोजक डॉ. वीरेंद्र प्रताप यादव ने संगोष्ठी के केंद्रीय विषय से परिचित कराने के साथ इस दो दिवसीय संगोष्ठी की रूपरेखा भी प्रस्तुत की। देश के विभिन्न क्षेत्रों से आमंत्रित एवं प्रतिभागी विद्वान द्वारा प्रपत्रों की प्रस्तुति और परिचर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा कि देश की विविधता हमारे समक्ष स्पष्ट है और हमने उसका हर प्रकार से उत्सव मनाया है। इस विविधता को जानने, समझने और अपनाने की दिशा में नई नीतियों एवं रणनीतियों पर परिचर्चा के द्वारा कुछ नया सीखने की आशा व्यक्त की।सम्मानित अतिथि प्रो. आनंद प्रकाश, विभागाध्यक्ष, साइकोलॉजी डिपार्टमेंट, दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने वक्तव्य में संगोष्ठी के विषय को आज के समय के संदर्भ में विवेचना के सबसे मुख्य विषयों में एक माना। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एकता का प्रश्न केवल राजनीतिज्ञों पर छोड़ दिया जाने वाला प्रश्न नहीं है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता से संबंधित विभिन्न प्रश्नों को रखते हुए उसकी आवश्यकता, उसके पहचान के तत्वों, प्रक्रियाओं, परिणामों आदि पर चर्चा की। भारतीय संविधान किस रूप में उसे प्रतिष्ठापित करता है? उनका मानना है कि इसे पाठ्यक्रमों के हिस्सा बनाया जाना चाहिए। राष्ट्रीय एकता के मूर्त-अमूर्त मानकों की चर्चा के क्रम में उसके तत्वों को सामने रखा। भारत मूर्त और वास्तविक लक्षणों को धारण करने वाला देश है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या हमें भारतीयता को समझने के लिए वाह्य ज्ञान की आवश्यकता है? विविधता से सम्पन्न यह देश हमारे लिए एक वरदान है।संगोष्ठी के अन्य आमंत्रित अतिथि श्री सी. पाल सिंह, पूर्व आईजीपी, पंजाब एवं पूर्व आईजीपी, आरएएफ, भारत सरकार ने अपने वक्तव्य का आरंभ इस प्रश्न के साथ किया कि क्या हम एकीकरण या एकता की बजाय विघटन की ओर नहीं बढ़ रहे हैं? उन्होंने कहा कि वास्तव में समस्या यह है कि राष्ट्रीय एकता एक मनोवैज्ञानिक संकल्पना है। मूल मर्म भारत को एक रखना है। जिसके लिए हमारा लक्ष्य अधिकतम लोगों के कल्याण का होना चाहिए। इस संदर्भ में राष्ट्रभक्ति की चर्चा करते हुए इसे अधिक समावेशी माना। राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति के बीच सामंजस्य को उन्होंने अधिक महत्वपूर्ण माना। इसके लिए हमें लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था और संविधान को ध्यान में रखना चाहिए और प्रत्येक स्थिति में इसकी रक्षा की जानी चाहिए।मुख्य अतिथि प्रो. गिरीश्वर मिश्र, पूर्व वाईस चांसलर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को याद करते हुए कहा कि राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। राष्ट्रीय एकता का प्रश्न चुनौतीपूर्ण है। राष्ट्रीय एकता का प्रश्न गंभीर विश्लेषण की मांग करता है। भारत प्राकृतिक एवं सामाजिक सभी दृष्टियों से विविधता वाला देश है। बहुत से बाहरी प्रभावों ने भी हमें बनाया है, जिसका हमारे चिंतन तक पर प्रभाव है। विविधता हमारे जीवन और हमारे चिंतन की पहचान है। चैतन्यता और अपनेपन की भावना ही हमें एकता के सूत्र में बांधता है। हमें विविधताओं और भिन्नताओं का सम्मान करना चाहिए। सही मायनों में समानता के सिद्धान्त को समझ कर ही एकता के विचार को समझा जा सकता है।

Updated : 31 July 2019 5:10 AM GMT
Tags:    
Next Story
Share it
Top